शनिवार, 25 अप्रैल 2009

उत्तररामचरित में शम्बूक-वध की मिथक का पुनर्निर्माण

उत्तररामचरित ’ में शम्बूक–वध की मिथक का पुनर्निर्माण
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वसन्तकुमार म. भट्ट
निदेशक, भाषासाहित्यभवन
गुजरात विश्वविद्यालय, अहमदाबाद – 9
bhattvasant@yahoo.co.in
( भवभूति समारोह, फरवरी 2008, ग्वालियर में प्रस्तुत किया गया शोध-लेख )

1.0 प्राचीनतम धार्मिक मान्यताओं को व्यक्त करनेवाली अतिमानवीय कथाओं को ‘पुराकथा या पुराकल्पन’(अर्थात् Myth) ‘मिथक’ कहते है । कर्मफल के सिद्धान्त को विशद करने के लिए भी कदाचित् ‘मिथक’ का निर्माण किया जाता है । ऐसे मिथक प्रथम दृष्टि में तो नितान्त अवैज्ञानिक (या अर्धवैज्ञानिक) जैसे ही प्रतीत होते हैं । परन्तु ऐसे मिथकों के पीछे कोई संस्कृतिविशेष के लोगों की एक तिर्यक् दार्शनिक दृष्टि भी कार्यरत होती है । क्रान्तद्रष्टा कवि जब कोई काव्य का प्रणयन करते है तब वे प्रायः ऐतिहासिक ख्यात-इतिवृत्त का ही आश्रयण करते है, या तो कदाचित् अपूर्व-कल्पना मण्डित कथावस्तु लेकर सामने आते हैं । परन्तु जब ऐतिहासिक कथावस्तु का आश्रयण करके उसमें मूलतः उपनिबद्ध कोई मिथकीय तत्त्व का, अपनी निजी कविदृष्टि से, कोई अपूर्व अर्थघटन करके दिखलाते हैं तब वे मर्त्य कवि-व्यक्तित्व से उपर उठकर अमर महाकवि बन जाते है । ख्यात-इतिवृत्त का आश्रयण करनेवाले कवि से हम जो “कवि-न्याय” की उम्मीद रखते है उसमें भी मिथकीय अर्थघटन का समावेश किया जा सकता है ।

2.0 भवभूति की कविदृष्टि में राम के उत्तरजीवन में एक नहीं, दो घटनायें प्रमुख है -1. लोकापवाद से राम के द्वारा सीता का त्याग, एवं 2. अकालमृत्यु को प्राप्त हुए किसी ब्राह्मण के बालकपुत्र को पुनरुज्जीवित करने के लिए रामने किया हुआ शूद्र तापस – ‘शम्बूक’– का वध । इन दोनों घटनाओं को लेकर भवभूतिने ‘उत्तररामचरित’ की रचना की है । यहाँ पर (सीता-त्याग का) प्रथम घटनाचक्र तो पूरा ऐतिहासिक है, परन्तु जो दूसरी ( शूद्रतापस के वध द्वारा मृतपुत्र को पुनरुज्जीवित करने की ) घटना है, वह एक अवैज्ञानिक मिथक ही है । क्योंकि किसी शूद्र के तप करने से कोई ब्राह्मणपुत्र का अकाल मृत्यु हो जाय, या एक शूद्र-तापस का वध करने से वह बालक पुनरुज्जीवित हो जाय – यह दोनों बातें(मान्यतायें) आज के विज्ञानप्रधान युग में ग्राह्य नहीं हो सकती है । परन्तु महाकवि भवभूति ने सीतात्याग की ऐतिहासिक घटना को प्रथम अङ्क में रखी है, और शम्बूकबध की मिथकीय घटना दूसरे अङ्क में रखी है । तत्पश्चाद् अनुगामी (3 एवं 4-6) अङ्कों में इन दोनों घटनाओं के परिणाम क्रमशः दिखलाये हैं । जैसे कि– सीतात्याग की (प्रथमाङ्क की) घटना का परिणाम तृतीय अङ्क में साकार होता है । यहाँ पर सीता के निरवधि विरह एवं तज्जन्य-शोक से करुणरसमण्डित नाट्यसृष्टि प्रस्तुत की जाती है । तत्पश्चात् दूसरे अंक में घटी शम्बूकवध की घटना के परिणाम स्वरूप “ मृतपुत्रों के सजीवन होने ” का घटनाचक्र 4-5-6 अंकों में आकारित किया गया है । अर्थात् शूद्रतापस शम्बूक का वध करने से यदि मृत ब्राह्मणपुत्र सजीवन हो सकता है तो यही मिथकीय सत्य राम के व्यक्तिगत जीवन में भी कैसे शनैः शनैः मूर्तिमन्त होता है; यह 4-5-6 अङ्क में दिखलाया जाता है । शम्बूकवध के बाद उसी दिन राम अपनी वापसी यात्रा में ही माता सहित के दो पुत्रों को लेकर ही अयोध्या वापस लौटते हैं – यह नाट्यगत सत्य है । सीतात्याग के साथ ही जो गर्भस्थ संतानो का प्रसव भी संशयग्रस्त हो गया था, वह दोनों (कुश एवं लव) नाटक के उत्तरार्द्ध में (अङ्क 4 से 7) फिर से अपने मातापिता को मिलते हैं । इस तरह भवभूतिने ‘उत्तररामचरित’ नामक नाटक की जो रचना की है, वह करुणरसप्रधान होते हुए भी करुणान्त नहीं है । बल्कि स्वाभाविकरूप से ही शम्बूकवध रूपी कर्मका परिपाक दिखलानेवाली और सुखान्त में परिणत होनेवाली एक अनुपम नाट्यसृष्टि हमारे सामने रखी गई है ।।
3.0 वाल्मीकीय रामायण के उत्तरकाण्ड में जो शम्बूकवध की पुराकथा (Myth) प्रस्तुत हुई है, उसके अन्तस्तल में जाकर भवभूति ने राम के उत्तरचरित को बारिकी से देखा है । दूसरे शब्दों में कहें तो – भवभूतिने शम्बूकवध के फलितार्थ के रूप में राम के उत्तरजीवन को परिणत होता हुआ निरूपित किया है । अब हम यह देखेंगे कि शम्बूकवध के साथ सम्बद्ध घटनाचक्र को चार भाग में विभक्त करके भवभूतिने उसका एक तरह से रूपकात्मक अर्थघटन करके, उसे किस तरह ‘रूपक’ के रूप में प्रस्तुत किया है ।
3.1 शम्बूक की मिथक में कहा गया है कि शूद्र व्यक्ति को तप में अधिकार नहीं है । किन्तु प्रश्न होता है कि – यहाँ कौन से शूद्र की बात है ? अर्थात् यहाँ शूद्र कौन है ? विचार करने से ऐसा प्रतीत होता है कि राम के उत्तर जीवन में प्रजाजन ने ही शूद्र के रूप में एक अनधिकृत दुष्कर्म किया है । जैसा कि अयोध्यावासी प्रजा ने किसीके व्यक्तिगत जीवन में झाँख कर जो निंदाकर्म शूरु किया [सीताविषयक अपवाद प्रचारित किया], वही शूद्रत्व था । परगृहवास करनेवाली स्त्री को, राजा को अपने घर में नहीं रखना चाहिए, सीता के उदर में किस के पुत्र पल रहे होंगे ? – इत्यादि दुर्वचन बोलकर प्रजा ने राजकर्तव्य में जो अनधिकृत हिस्सा लिया –वह था “शूद्र का तप में अनधिकार”। ऐसे शूद्रत्व का तो वध ही करना चाहिए । अन्यथा किसी द्विज का शिशु अवश्य ही अकाल मृत्यु को प्राप्त होगा । जो इस नाटक में भी हुआ है । जैसा कि – राम ने अपनी प्रजा को सीताविषयक गलत निंदा प्रसारित करते हुए नहीं रोकी, नहीं टोकी । तो उसके परिणाम स्वरूप, इनकी दोनों संतानों का प्रसव ही आशंकाग्रस्त हो गया । सीतात्याग के कारण राम की पैदा होनेवाली संतान, प्रसव होने से पहले ही, गर्भावस्था में ही मर जाय, ऐसी दारुण दशा का निर्माण होता है ।
3.2 अनधिकृत रूप से तप कर रहे शूद्र का राम ने वध कर दिया – इस मिथकीय घटनाक्रम के द्वितीय सोपान को, कविने नाटक में कैसे साकार होता हुआ दिखलाया है ? वह देखा जाय तो, तीन बातें ध्यानास्पद होती है । जैसी कि – राम ने प्रजानुरञ्जन के लिए सीता का त्याग कर दिया; और द्वादश वर्ष पर्यन्त मूक बनकर, राजकार्य में सदैव सन्नद्ध रहे । राजकर्तव्य का पालन करते समय वे कभी भी सीता के लिए जाहिर में, या एकान्त में, क्षण भरके लिये भी विलाप नहीं करते है ।। किन्तु जब अश्वमेध-याग करने का प्रसङ्ग आता है तब राम ने धर्मकार्यार्थ भी दूसरा विवाह नहीं किया; और सीता की ही हिरण्मयी प्रतिकृति बनवा कर अपनी ‘वामाङ्गी’ के रूप में सीता को ही (जाहिर में)पुनः प्रतिष्ठित करके, राम ने एक तरह से शूद्रत्व को प्राप्त हुई प्रजा के गाल पर थप्पड ही मार दी है । दूसरे विवाह के लिए राम की असम्मति रूप निर्णय से, राम ने जाहिर में यह सूचित कर दिया कि उनकी दृष्टि में तो सीता पवित्र ही है; और राम ने अपने हृदय से तो सीताजी का त्याग किया ही नहीं है । इस तरह से, राम ने जो हिरण्मयी सीता की प्रतिकृति की स्थापना की थी, वह सीताविषयक प्रजा की मान्यता का सीधा वध ही था ।।
राजा के व्यक्तिगत जीवन में झांखने कि चेष्टा एक तरह से प्रजा की शूद्रता ही थी । हमें किसी के व्यक्तिगत जीवन के बारे में जाहिर में बोलने की, निंदा करने की अनधिकृत चेष्टा नहीं करनी चाहिए । ऐसी शूद्रता सदैव वध्य होती है । राजा राम ने ऐसी शूद्रता का वध सीता की हिरण्मयी प्रतिकृति के द्वारा सूक्ष्म रूप में किया है ।।
3.3 शम्बूकवध प्रसङ्ग में, (तृतीयचरण में) राम के खड्गप्रहार के बाद शूद्र शम्बूक का दिव्य पुरूष के रूप में रूपान्तरण होता है । अब वह “अन्वेष्टव्यो यदसि भुवने भूतनाथः शरण्यः.........।” इत्यादि बोलता हुआ राम को प्रणाम करता हुआ, उनके सामने नतमस्तक खडा रहता है । बस, वही ढंग से, सप्तम अङ्क में गर्भाङ्क पूर्ण होने के बाद, अरुन्धती नगरजनों को पूछती है कि वैश्वानर अग्नि ने जिसके पुण्यशाली चारित्र्य का निर्णय किया है, और देवों ने जिसकी संस्तुति की है; तथा जो देवयजनभूमि से प्रादुर्भूत हुई है, ऐसी इस सीतादेवी का स्वीकार किया जाय या नहीं ? – इस विषय में आप सब की क्या राय है ? तब लक्ष्मण कहता है कि अरुन्धती के द्वारा उलाहना दिये गये यह पौरजानपद और सकल भूतसमूह आर्या सीता के सामने नतमस्तक खडा है; और सीता देवी को प्रणाम कर रहा है । - एक तरह से सीता देवी की क्षमायाचना कर रहे है ।
इस तरह से, अयोध्यावासीओं की सीता-विषयक मान्यता बदल गई; उनमें से शूद्रता चली गई । अयोध्या की प्रजा का यह ऊर्ध्वीकरण था । शूद्रत्व का वध होने पर प्रजामानस का यह दिव्यरूपान्तरण ही था । जिस तरह से अनधिकृत तप को रोकने के लिए राम ने शम्बूक का वध किया और शम्बूक का दिव्य पुरूष के रूप में जो परिवर्तन हुआ था, बस वैसे ही, यहाँ पर – नाटक के अन्त में सीता –विषयक लोकापवाद प्रसारित करने वाले प्रजामानस का लज्जित होकर, अन्त में दिव्यता में परिणमन किया गया है ।।
3.4 शम्बूकवध की मिथक में, राम ने किसी द्विज के मृत शिशु को पुनरुज्जीवित करने के लिए ( जीवातवे ) शम्बूक का वध किया; और उसके परिणाम स्वरूप मृतशिशु पुनर्जीवन प्राप्त करता भी है । तो इस ‘उत्तररामचरित’ नाटक में भी, प्रजामानस में परिवर्तन आने से जो कुश-लव ‘वाल्मीकि के अन्तेवासी’ के रूप में पहले प्रसिद्ध हुए थे, वही बाद में राम-सीता के संतान के रूप में नया-सही-अभिज्ञान प्राप्त करते है । दूसरे शब्दों में कहें तो – कुश-लव “ द्विजत्व” को प्राप्त करते है ।
करुणामय बनकर राम ने यदि किसी द्विज के मृतशिशु को पुनर्जीवित करने के लिए शम्बूक वध रूप कठोर पुण्यकर्म किया हो तो, राम के पुत्र, जो सीता के गर्भ में ही थे – और जन्म प्राप्त करने से पहेले ही अन्धेरे में तिरोहित हो गये थे – वह भी पुनःप्रादुर्भूत होने ही चाहिए । ऐसी कर्मफल के सिद्धान्त की अपेक्षा है ( या कवि-न्याय की अपेक्षा है ) - जो भवभूतिने इस प्रकार पूर्ण की है ।
4.0 नाटक के आरम्भ में कुलगुरु वसिष्ठने जो संदेश भेजा है, उसमें कहा गया है कि-
जामातृयज्ञेन वयं निरुद्धास्त्वं बाल एवासि नवं च राज्यम् ।
युक्तः प्रजानाम् अनुरञ्जने स्यास्तस्माद्यशो यत्परमं धनं वः ।। (1.11)
“ राम नये राजा है और प्रजाराधन रूप कर्तव्यपालन से जो यश अर्जित किया जाय वही उसके लिये परम धन होगा । ” वसिष्ठ की ऐसी आज्ञा से प्रेरित होकर राम ने प्रजाराधन का एक (सीतात्याग रूप एक) ही कार्य नहीं किया था, परन्तु दो कार्य किये है । राम के उत्तर जीवन में सीतात्याग के साथ साथ शम्बूक-वध प्रसङ्ग भी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण घटना है- ऐसा भवभूति का उपक्रम है । यदि यह दूसरी घटना का सही मायने में मूल्याङ्कन न किया जाय तो वह नाट्यविवेचन के लिए शोभास्पद बात नहीं होगी । क्योंकि नाटक जैसी समय की पाबन्दी स्वीकार ने वाली कला का जब कोई कवि अपने कथयितव्य को मूर्तिमन्त करने के लिए अवलम्बन लेता है तब, वह कुछ भी अनावश्यक चीज अपने नाटक में नहीं रख सकता है; और यह बात एक सिद्धान्त के रूप में सभी विवेचकों ने मानी है । तथापि दुर्भाग्य से शम्बूकवध प्रसङ्ग को अद्यावधि गंभीरता से नहीं देखा गया है । एवमेव, इसी प्रसङ्ग के सन्दर्भ में उत्तर रामचरित के संविधान की कतिपय क्षतियाँ भी उद्भावित की गई है । जैसा कि – डो. एस. के. बेलवालकरजी और डो. जी. के. भट ने कहा है कि - 1. शम्बूकवध प्रसंग के लिये एक पूरे स्वतन्त्र अंक की आवश्यकता नहीं थी, इस को विष्कम्भक में सूचित किया जा सकता था । 2. दो कुमारों के अभिज्ञान के लिये चार,पाँच और षष्ट अंक की भी आवश्यकता नहीं थी । उत्तररामचरित के 2, 4, 5, एवं 6 अंकों की आवश्यकता को नहीं समझने के कारण, सभी विद्वान् भावकों ने मिलकर भवभूति को बडा अन्याय किया है । क्योंकि राम को अपने उत्तर जीवन में सीतात्याग का जो कठोर निर्णय लेना पडा, वह यदि राजकर्म है; तो उनके द्वारा किया गया शम्बूकवध भी दूसरे एक राजकर्म का ही अंश था । सीता भी जब सुनती है कि – “आज राम शम्बूकवध के लिए पञ्चवटी में आये हैं” तब तुरंत वह बोलती है कि – दिष्ट्या अपरिहीन-राजधर्मः खलु स राजा ।(3-8 के उपर) । इस तरह सीताने ‘शम्बूकवध’ के कर्म को राम के एक राजकर्म के रूप में ही देखा है, और उसके लिए राम को अभिनन्दन भी दिया है ।
इसी तरह से, चतुर्थ अंक के आरम्भ में भी सौधातकि ने वसिष्ठ पर कटाक्ष करते हुये कहा है कि –“ इसने आते ही बछडेवाली कपिला गाय मडमडायिता ” (उदरस्थ) करली है, - इसका मतलब भी यही हो सकता है कि सीता-त्याग के लिये यही कुलगुरु जिम्मेदार है । ( चतुर्थांक का विष्कम्भक हास्यपूर्ण है, तथा रसान्तर के लिये प्रयुक्त है – ऐसा माना जाता है , परन्तु वह भी व्यंजनापूर्ण है । कपिला गाय से सीता की मौत ही व्यंजित की जा रही है । )
इस तरह राम के उत्तर जीवन में एक नहीं, दो घटनाओं को केन्द्र में रखकर नाटक का मूल्यांकन करना चाहिए । जिस तरह से सीतात्याग और तज्जन्य विरह, या शोक- यह नाटक का एक विषय बना है; उसी तरह से शम्बूकवध रूप राजकर्म और तज्जन्य पुण्य के बल पर राम को माता सहित के पुत्रों की प्राप्ति होती है (और नाटक सुखान्त में परिणत होता है) – यह भी इस नाटक का विषय मानना चाहिये । हमारे नाट्यकवि भवभूति उत्तररामचरित के सातों अंकों में जो प्रदर्शित कर रहे है उसका प्रयोजन ढूँढना ही चाहिये है ।
4.1 शम्बूकवध की मिथक का जो मार्मिक बिन्दु है, वह है – “मृतशिशु का पुनर्जीवन ।” अतः अब हमें यह देखना होगा कि क्या यह विषय ‘उत्तररामचरित’ के सातों अङ्कों में साद्यन्त-सुव्याप्त है या नहीं ?
‘उत्तररमाचरित’ नाटक के आरम्भ में सीतात्याग एक महत्त्वपूर्ण घटना के रूप में उभरकर सामने जरूर आती है, परन्तु अन्ततक जाते वही एक घटना का प्राधान्य नहीं बना रहता है । सीतात्याग के साथ साथ शूरु से ही, बल्कि उससे भी पेहले –चित्रवीथिका प्रसंग में ही प्रथम चित्र के रूप में जृम्भकास्त्रों को जब प्रणाम किया जाता है तब से, कथा के अन्तस्तल में चलने वाला दूसरा एक कथांश भी है; वह है मृतप्रायः शिशुओं का पुनर्जीवन एवं राम-सीता के पुत्रों के रूप में उन दोनों का अभिज्ञान । अन्तस्तल में प्रवाहमान यह दूसरे विषय का प्राधान्य क्रमशः बढता जाता है; जो नाटक के उत्तरार्द्ध में मुखरित होकर – जृम्भकास्त्र के प्रयोग के साथ हि मानों कि अज्ञातवास कि जृम्भा से मुक्त होकर 4-6 अङ्क की रङ्गभूमि उपर आकारित होता जाता है । सूक्ष्मता से देखा जाय तो कुश-लव का पुनर्जीवन एवं सीता-राम के पुत्रों के रूप में अभिज्ञान – यही एक घटनाचक्र ‘उत्तररामचरित’ के सातो अङ्कों मे साद्यन्त एवं सुग्रथित रूप से सुव्याप्त है ।
4.2 प्रथम अङ्क में वसिष्ठ के सन्देशवाहक अष्टावक्र जो आशीर्वाद देते है कि – तत् किम् अन्यद् आशास्महे ? केवलं वीरप्रसवा भूयाः ।। और तत्पश्चात् चित्रवीथिका प्रसङ्ग में, सबसे पहले ही चित्र में जृम्भकास्त्र को देखकर राम कहते हैं कि – सर्वथेदानीं त्वत् प्रसूतिम् उपस्थास्यन्ति । “यह जृम्भकास्त्र अब तेरी संतति की सेवा में उपस्थित रहेंगे ।” इस तरह से सीता-राम की संतति के पास जृम्भकास्त्र का स्वतःसिद्ध होना, एक प्रमाण के रूप में प्रथमाङ्क में ही कहा गया है ।
4.3 यही बात द्वितीय अङ्क के शुद्ध विष्कम्भक में अङ्कुरित हो उठती है । आत्रेयी वनदेवता वासन्ती से कहती है कि – किसी देवता ने आकर वाल्मीकि को कुश-लव नाम के दो शिशु समर्पित किये है; और उन दोनों को जृम्भकास्त्र तो आजन्मसिद्ध है । वे दोनों पढने में इतने तेज है कि मैं उन के साथ बैठकर पढ नहीं पाती हूँ । अतः मैं अगस्त्य-लोपामुद्रा का आश्रम ढूंढती हुई यहाँ तह आयी हूँ ।।
4.4 तृतीयाङ्क के विष्कम्भक में भी सीता को दो पुत्र होने की यही बात दूसरे शब्दों में पुनरावृत्त हुई है । तमसा-मूरला के संवाद से हमें ज्ञात होता है कि लक्ष्मण के चले जाने के बाद, प्राप्तप्रसववेदना सीता गङ्गाप्रवाह में गिरती है । लेकिन वहाँ पर ही उसने दो पुत्रों को जन्म दिया । और गङ्गाजी ने सीता की, एवं दो पुत्रों की भी रक्षा करते हुए बिगडती बाजी सम्हाली है ।
तृतीयाङ्क की प्रमुख दृश्यावली में करिकलभ का एवं मयूरनर्तन का जो प्रसङ्ग है, वह दोनों बडे सूचक है । तृतीयाङ्क में दो तरह के प्रमुख कार्य दिखाई पडते है –(1) बारह वर्षों से राम ने जो सीता को ‘नियतं विलुप्ता’ मानी है; और पञ्चवटी को देख कर वे जो बार बार मूर्च्छित हो रहे हैं उसको सीता के संजीवनी समान करस्पर्श से स-भानावस्था(शुद्धि) में लाया जाता है । और ऐसा करके “सीता कदाचित्/कुत्रचित् जीवित हो सकती है” ऐसी एक आशङ्का राम के चित्त में डाली जाती है । (2) तथा आर्यपुत्र राम की उपस्थिति में, करिकलभ एवं मयूरनर्तन के प्रसङ्ग द्वारा सीता के चित्त में अपने पुत्रों की स्मृति पुनः सञ्चारित करने का द्वितीय नाट्यकार्य भी सम्पन्न किया जाता है ।
4.5 उत्तररामचरित के चतुर्थ अङ्क में, वाल्मीकि के आश्रम में जनक और कौसल्या का मिलन होता है । लेकिन यहाँ पर वे सीता-राम के पुत्र लव को ‘आश्रमबटु’ के रूप में ही देखते है । परन्तु कौसल्या के मन में तो साश्चर्य प्रश्न होता ही है कि रामभद्र की आकृति को मिलनेवाला यह किशोर कौन है? उसी क्षण अरुन्धती भी एक ‘अपवार्य’ उक्ति में बोलती है कि – इदं नाम तद्भागीरथीनिवेदितरहस्यं कर्णामृतम् । न त्वेवं विद्मः कतरोડयम् आयुष्मतोः कुशलवयोरिति ।। - इस तरह चतुर्थ अङ्क में भी सीता के संतानो की बात पल्लवित होने लगती है ।
4.6 पञ्चम अङ्क में सीतापुत्र लव के साथ, अश्वमेध यज्ञ के अश्व को लेकर, लक्ष्मणपुत्र चन्द्रकेतु का युद्ध होने का संरम्भ शूरु हो जाता है । लव की बाणवृष्टि देखकर सारथि सुमन्त्र को बाल रघुनन्दन की स्मृति हो आती है । “धृतधनुषं रघुनन्दनं स्मरामि ।।” (5.4) इस युद्ध के दौरान लव ने तो जृम्भकास्त्र का प्रयोग भी कर दिया; और सब चकित हो ऊठे । यहाँ पर भी तिरोहित हुए राम-सीता के संतान क्रमशः आविर्भूत होते दिखाई पडते है । मानों शम्बूकवध के द्वारा एक अयोध्यावासी मृत द्विजशिशु को पुनः सजीवन करवाने का जो पुण्य होगा उसके ही फल-स्वरूप राम-सीता के तिरोहित संतान अब पुनःप्रादुर्भूत हो रहे है ।
4.7 षष्ठ अङ्क में लव एवं चन्द्रकेतु के युद्ध को आकाशमार्ग से अयाध्या की और वापस जा रहे श्रीराम देखते हैं । जृम्भकास्त्र के प्रभाव से राम की सेना तो निश्चेष्ट पडी है; परन्तु दो कुमारों का भयानक युद्ध देखकर, राम वाल्मीकि के आश्रम में नीचे उतर आते है । और वहाँ पर ही अपने पुत्रों को - लव एवं कुश को - क्रमशः देखने का सौभाग्य प्राप्त करते है । परन्तु यहाँ पर राम को दोनों कुमारों का कोई निश्चित अभिज्ञान नहीं होता है । क्योंकि “हम तो वाल्मीकि के हैं” “हमें हमारी माता का नाम भी ज्ञात नहीं है” इत्यादि वाक्यों को लव-कुश से सूनकर राम गुमराह हो जाते है । यद्यपि राम को अनेक कारणों से शङ्का तो हो ही रही थी कि यह दोनों मेरी ही संतति होगी । क्योंकि उन्होंने ही पहले सीता का गर्भ द्विधा ग्रन्थीभाव वाला है ऐसा जाना था ।
4.8 सप्तम अङ्क के गर्भाङ्क को देखने के बाद राम यह जान पाते हैं कि उनकी अलग-बगल में बैठे लव एवं कुश ही उनके दो पुत्र हैं । शम्बूकवध रूप एक विडम्बनापूर्ण राजकार्य से राम ने जो पुण्य अर्जित किया था, उसका प्रकटीकरण यहाँ होता है । (राम के उत्तर जीवन की एक विडम्बना यह थी कि जो अयोध्यावासी प्रजा ने राम की सन्तति को सकुशल प्रसूत नहीं होने दी, वही प्रजा के एक मृतशिशु को पुनर्जीवित करने के लिए राम को शम्बूक का वध करने के लिए जाना पडा था । अतः शम्बूकवध के बाद राम की जो वापसी यात्रा शूरु होती है उसमें ही राम को अपने दोनों पुत्र , उनकी माता (सीता) के साथ वापस मिल जाते है – यह ध्यानास्पद बात है । )

5.0 उपसंहार-
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राम ने अपने उत्तर जीवन में वसिष्ठ की आज्ञा के अनुसार मुख्य रूप से दो
राजकार्य (प्रथम दो अङ्कों में) किये है- (1) सीतात्याग एवं (2) शम्बूकवध । कवि भवभूति ने इन दोनों घटनाओं के नाट्यात्मक परिणाम, जैसे कि – (1) सीता का विरह एवं तज्जन्य शोक से करुणमण्डित तृतीय अङ्क; तथा (2) अनधिकृत तपश्चर्या कर रहे शूद्र का वध एवं तज्जन्य पुण्य से अपने ही मृतप्रायः शिशुओं को पुनर्जीवन प्राप्त होना – द्विजत्व प्राप्त होना – इन बातों को बडी कलात्मकता के साथ प्रस्तुत किया है । और इस तरह उत्तररामचरित के द्वितीय एवं चतुर्थ, पञ्चम तथा षष्ठ अङ्क की जिस में सार्थकता बनी रहे ऐसी एक अनुपम नाट्यसृष्टि का निर्माण करके दिखलाया है ।।
भवभूति को शम्बूकवध की कथा एक मिथक के रूप में, वाल्मीकीय रामायण से प्राप्त हुई थी । परन्तु उसे सही अर्थ में राम के ही वर्तमान जीवन में साकार होती हुई दिखलाने का सफल कविकर्म केवल भवभूतिने ही किया है । इस तरह से उन्होंने अपना महाकवित्व सिद्ध किया है ।।
‘उत्तररामचरित’ का सुखान्त कोई नाट्यशास्त्रीय आज्ञा का कृत्रिम परिणाम नहीं है । परन्तु एक मिथकीय सत्य ही राम के जीवन में साकार होता है, इसीलिए वह सुखान्त बना है ऐसा दिखलाकर भवभूति ने राम के दुष्कर राजकर्म का सुफल इसी जन्म में परिणत होता हुआ सिद्ध किया है । “उत्तरे रामचरिते भवभूतिर्विशिष्यते” यह उक्ति का मर्म भी उसके सुखान्त होने में ढूँढना चाहिये ।।

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7 टिप्‍पणियां:

  1. हिन्दी ब्लागरी में आप का स्वागत है।
    उत्तररामचरित की सुंदर व्याख्या की गई है!
    सारी गड़बड़ साहित्यिक कृतियों को इतिहास मान लेने पर आरंभ होती है। यही रामकथा के साथ भी हुआ है।
    अपने ब्लाग से (वर्ड वेरीफिकेशन) शब्द पुष्टिकरण हटाएँ। टिप्पणियाँ करने में परेशानी है।

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  2. हिन्दी ब्लागजगत में आपका स्वागत है। आपके चिट्ठे का उद्देश्य पढकर मन को विशेष सुख हुआ। ऐसे सोद्देश्य लेखन से हिन्दी ब्लागिंग की गरिमा बढ़ेगी।

    इसी के साथ आपसे अनुरोध है कि हिन्दी विकिपेडिया (hi.wikipedia.org) पर और संस्कृत विकिपेडिया (sa.wikipedia.org) पर भी कुछ महत्व के विषयों पर लेख लिखें।

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  3. बहुत स्तरीय और ज्ञानवर्धक ब्लाग।
    यहाँ आकर हमारा ज्ञान बढ़ेगा। अनुरोध है कि आलेख को दो या तीन हिस्सों में देंगे तो पढ़ने में सुविधा रहेगी।
    आभार

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  4. आदरणीय महोदय,
    सादर चरण स्पर्श.अत्र कुशलं तत्रास्तु.
    मुझे आपके आलेख से पाठालोचन संबंधी नयी दृष्टि मिली.एतदर्थ शताधिक धन्यवाद.
    यदि मुझे आचार्य विश्वनाथ प्रसाद मिश्र जी की संपादन प्रविधि पर कुछ सुझाव दे सकें तो आभारी रहूँगा.

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  5. सनातन धर्म कॉलेज (लाहौर) अम्बाला छावनी
    एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी
    'संस्कृत साहित्य में दलित चेतना'
    (विकृति से संस्कृति की ओर)
    प्रायोजक : हरियाणा संस्कृत अकादमी, पंचकूला
    अकादमिक सहयोग : सेन्टर फॉर डॉ. बी. आर. अम्बेडकर स्टडीज़, कु.वि.कु.
    डी.के.के. सनातन धर्म आदर्श संस्कृत कॉलेज, अम्बाला छावनी
    आयोजक : संस्कृत विभाग, सनातन धर्म कॉलेज, अम्बाला छावनी
    दिनाँक - 22 फरवरी, 2011 दिन मंगलवार
    समय : 9.30 बजे प्रात: स्थान : कॉलेज सभागार
    मान्यवर,
    संस्कृत की पुन:संरचना योजना के अधीन संस्कृत विभाग, सनातन धर्म कॉलेज, अम्बाला छावनी तथा हरियाणा संस्कृत अकादमी, पंचकूला संयुक्त रूप से आयोजित संगोष्ठी में सहभागिता के लिए सादर साग्रह आमन्त्रित है।
    भारतीय सन्दर्भ में दलित एक सांस्कृतिक और सामाजिक यथार्थ है। जिसके अनेक ऐतिहासिक कारण हैं। दलित शब्द का अप-प्रयोग और अप-व्याख्या कर भारतीयता का मूल भावना को निन्दित और तिरस्कृत तथाकथित बु(जिीवियों और स्वार्थ साधक नेताओं द्वारा किया जाता रहा है। संस्कृत साहित्य में शूद्र शब्द निन्दावाचक नहीं है परन्तु उसका दलित के रूप में प्रयोग ऐतिहासिक विवशताओं के कारण उत्पन्न सांस्कृतिक विकृति के रूप में दृष्टिगोचर होता है। संस्कृत साहित्य में दलित चेतना का स्वरूप पौराणिक काल में दो रूपों में दिखाई देता है-एक शक्ति की अधिकता के कारण दूसरों का दमन या उन पर अत्याचार करने के रूप में। और दूसरा दरिद्रता या हीन-भावना के रूप में जहाँ पर व्यक्ति स्वनिन्दा के द्वारा अपने को दलित रूप में प्रस्तुत करता है। अत: संस्कृत साहित्य में जैसा दलित विमर्श उपलब्ध है - क्या उसके आधार पर वर्तमान-कालिक आख्रथक और सामाजिक दृष्टि से दलित समस्या का विश्लेषण और समाधान करना सम्भव है या नहीं। इस उद्देश्य को ध्यान में रखकर इस संगोष्ठी में विचार विर्मश के लिए आप सादर आमंत्रित हैं।
    विशेष : 1. संगोष्ठी में कोई पत्र नहीं पढ़ा जायेगा केवल चर्चा होगी। संगोष्ठी का लक्ष्य विवाद नहीं सम्वाद है।
    2. सामान्य श्रेणी का मार्ग व्यय अकादमी द्वारा नियमानुसार दिया जायेगा।
    3. कृपया समय का सम्मान करें।

    आशुतोष आंगिरस डॉ. रामेश्वर दत्ता डॉ. आर. बी. लांग्यान डॉ. देशबन्धु
    संयोजक निदेशक निदेशक प्राचार्य
    संस्कृत विभाग हरियाणा संस्कृत अकादमी, सेन्टर फॉर अम्बेडकर स्टडीज़ सनातन धर्म कॉलेज,
    पंचकूला अ.छावनी
    098963-94569 0172-2570979 094166-38032 098120-53283

    विशिष्ट सहयोग : डॉ. विष्णु दत्त, प्राचार्य 098963-56235 डी.के.के. सनातन धर्म आदर्श संस्कृत कॉलेज, अम्बाला छावनी

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  6. श्री‌भट्ट जी
    आपका लेख भवभूति के नाटक उत्तर रामचरित पर शोधपरक समीक्षा है जो विद्वत्ता पूर्ण है। आपने इस लेख में भवभूति के द्वारा प्रतुत दोनों घटनाओं को तर्क देकर उन की विश्वसनीयता बढ़ाई है। और रामायण के उत्तर काण्ड को भी‌विश्वसनीय सिद्ध किया है।

    मेरी दृष्टि में रामायण में उत्तर काण्ड प्रक्षेप है। जिसे मैने अपने लेख इस उत्तर काण्ड ने हिन्दुओं के आदर्श श्री राम पर घातक प्रहार किया है। इसने हमारे समाज में विघहटन पैदा किया है और आपसी द्वेष फ़ैलाया है।

    मेरी दृष्टि देखने के लिये मेरा (विश्व मोहन तिवारी) लेख hindi.kalkion.com पर 'राम ने न तो सीता जी को वनवास दिया और न शम्बूक का वध किया'देखने की कृपा करें; और उचित समझें तब टिप्पणी भी‌करें।
    धन्यवाद्

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