मंगलवार, 15 दिसंबर 2009

हिन्दु धर्म में अहिंसा - एक अवलोकन

हिन्दु-धर्म में अहिंसा – एक अवलोकन
वसन्तकुमार म. भट्ट
निदेशक, भाषासाहित्यभवन, गुजरात विश्वविद्यालय,
अहमदावाद – 380009
www.vasantbhatt@blogspot.com
E-mail : bhattvasant@yahoo.co.in

हिन्दु-धर्म का इतिहास 5000 वर्षों से भी अधिक पुराना है । अतः हिन्दुधर्म में अहिंसा के विचार को लेकर कोई चिन्तन प्रस्तुत करना एक साहस ही सिद्ध हो सकता है । फिर भी, कुछ मुख्य एवं विशेष सीमा चिह्नरूप सन्दर्भों को लेकर, ब्राह्मण-संस्कृति के विस्तृत फलक पर विकसित हुये अहिंसा के विचार को परिमित शब्दों में कहने का प्रयास किया जाता हैः—
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ब्राह्मण-संस्कृति में ऋग्वेद के मन्त्रों में वैसे तो प्राधान्येन विविध देवताओं की स्तुतियाँ आयी हुई है । लेकिन इन्द्र, अग्नि आदि देवों की स्तुतिओं के साथ साथ
“ पुमान् पुमांसम् परिपातु विश्वतः ” ( एक पुरुष दूसरे पुरुष का सभी तरह से रक्षण करे ), और “ वसुधैव कुटुम्बकम् ” के विचार भी वेदमन्त्रों में प्रस्तुत हुए है । एवमेव, ऐसे ही सर्वात्मभाव को बढावा देने के लिये, अर्थात् सब जीव एक है - इस विचार से “ यह मामकीन है और दूसरा व्यक्ति परकीय है” ऐसे भेदभाव को हटाने के लिये, वेदों में यह भी कहा गया है कि “ यत्र भवति विश्वम् एक-नीडम् । ” ( जहाँ सारा विश्व चीडियों का एक घोंसला बनके रहे ) । धार्मिक कट्टरता के कारण होनेवाली हिंसा पर लगाम डालने के लिये ऋग्वेद में “ एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति ” ( एक ही सत्य को बुद्धिमानों ने अनेक तरह से कहा है ) ऐसा भी स्पष्ट शब्दों में कहा गया है । इसका सूचितार्थ यही है कि ऋग्वेद में भले ही अहिंसा जैसे शब्द का सीधा प्रयोग नहीं दिखाई देता है, परन्तु किसी भी मनुष्य या पशु की हिंसा करने का तो नहीं कहा गया है - यह निश्चित है ।।
कालान्तर में जब यजुर्वेद की रचना हुई तब विविध प्रकार के यज्ञ-यागादि की स्पष्ट संकल्पनायें आविर्भूत हुई । जिसमें अनेक नित्य एवं नैमित्तिक यज्ञों का निरूपण हुआ और उसी परंपरा में अश्वमेध यागादि का विधान हुआ । जिससे पशु-बलि का कुरिवाज चल पडा । आदमी का कमजोर दिमाग पशुबलि से विरत तो हुआ नहीं, बल्कि नरमेध-याग की पराकाष्ठा तक पहुँचा । और वित्तैषणा, पुत्रैषणा एवं लोकैषणा से पीडित समाज ने यज्ञीय हिंसा हिंसा नहीं कहलाती, तथा यज्ञ के लिये मारे गये प्राणी को तो स्वर्ग ही मिलता है – ऐसा कपटी वाक्य भी प्रचार में रख दिया । ऋग्वेद एवं उपनिषदों के बीच में जो ब्राह्मण-ग्रन्थ लिखे गये, तथा बाद में जो पूर्वमीमांसा दर्शन विकसित हुआ उसमें ऐसी मान्यता ने स्थान लिया था । परन्तु ऋग्वेद की तरह उपनिषदों ने भी सर्वात्मभाव की ही बात पुकार के साथ कही थी और बहुविध उक्तिओं में उसे दोहराई थी । जीवात्मा और ब्रह्माण्ड की कोई भी हस्ती परस्पर से भिन्न नहीं है, सर्वत्र अभेद ही है, ऐसा कहनेवाले उपनिषदों का अद्वैतवाद तो शब्दान्तर से अहिंसा के विचार का ही सर्वथा दृढीकरण करनेवाला था – यह कहने की जरूरत नहीं है ।।

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फिर भी, कुछ कालावधि तक प्रवर्तित ब्राह्मण-संस्कृति की यज्ञक्रियाओं में जो पशु-हिंसा हो रही थी उसको रोकने के लिये, भगवान् बुद्ध ने करुणा का उपदेश दिया और भगवान् महावीर ने अहिंसा का उपदेश दिया । ब्राह्मण-संस्कृति में सुधार लाने का श्रेयः निःशङ्क रूप से श्रमण-संस्कृति को जाता है । और, चूँकि ब्राह्मण-संस्कृति में एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति – का विचार पूर्वप्रस्थापित था ही, बुद्ध और महावीर की वाणी का स्वीकार करने में ब्राह्मण-संस्कृति को ज्यादा कठिनाई नहीं हुई ।
परन्तु महाभारत में भगवद्गीता के नाम से जो श्रीकृष्ण एवं अर्जुन का संवाद निरूपित हुआ है उस में, राष्ट्रधर्म के उद्देश को लक्षित करके युद्ध की अनिवार्यता को स्पष्ट रूप से स्वीकारा भी गया है । अर्जुन ने जब घोर हिंसा की सम्भावना देखी तो उसने युद्ध नहीं करने का और संन्यास लेने का ही सोचना शूरु किया । परन्तु युगपुरुष श्रीकृष्ण ने कहा की इन आततायी ( आतंकवादीओं ) कौरवों को तुं नहीं मारेगा तो, आज जो हाल एक द्रौपदी का हुआ है वही हाल समाज की अन्य स्त्रीओं का भी होगा । अधर्म का फैलावा होने पर समाज और राष्ट्र की सुरक्षा पर खतरा पैदा हो सकता है । अतः श्रीकृष्ण की दृष्टि में धर्मयुद्ध तो अनिवार्य है ही । वह कहते हैः- क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ, नैतत् त्वयि उपपद्यते । अर्थात् हे अर्जुन ! तुम नपुँसकता को धारण न करो, यह तुम्हें शोभा नहीं देता है । इस तरह भगवद्गीता में राष्ट्रधर्म प्रेरित हिंसा को मान्यता दी गई है ।।
परन्तु उसी भगवद्गीता में, वैदिक यज्ञों की निन्दा भी की गई है और यज्ञ की विभावना ही बदल दी गई है – यह भी नितान्त सत्य है । अब निर्दोष पशु के बलि को किसी भी रूप में मान्यता नहीं थी । युगपुरुष श्रीकृष्ण की नयी सोच में स्वार्पण एवं कृतज्ञता बुद्धि से किया हुआ कर्म ही यज्ञ था । एवं लोकसङ्ग्रह की मंगलकारिणी बुद्धि से और अनासक्तिपूर्वक किया हुआ कर्म यज्ञ था । सीता या द्रौपदी की तरह समाज की अन्य स्त्रियाँ भी संरक्षणीय है – यह सोचना एक तरह का लोकसङ्ग्रह ही था । ऐसे लोकसङ्ग्रह के उद्देश्य से किया हुआ कोई भी युद्ध हिंसक नहीं माना गया है । क्योंकि आततायीओं को नहीं मार कर जो हिंसा को टाली जाती है, उससे कहीं अधिक हिंसा उन लोगों को जीन्दा छोडने से होती है । अतः युगपुरुष श्रीकृष्ण की यह सोच साम्प्रत भारत में अतीव ध्यानार्ह एवं प्रस्तुत है ।।

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भगवद्गीता में न केवल यज्ञ की विभावना ही बदली गई है, परन्तु उसमें सम्भवामि युगे युगे – जैसे शब्दों से जो अवतारवाद का शंख फूंका गया है, उसने भी हिन्दुस्तान में धार्मिक सहिष्णुता को बलिष्ठ बनायी है । यज्ञीय पशु-हिंसा की निन्दा करनेवाले बुद्ध को भी ब्राह्मण-संस्कृति ने, केशव धृतबुद्धशरीर....जय जगदीश हरे – ( गीतगोविन्द के ) इन शब्दों से भगवान् विष्णु के दश अवतारों में स्थान दिया है । कवि जयदेव के इन शब्दों को पुराणकारों ने भी सम्मान के साथ दृढीभूत कर दिया । एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति – तो वेदों में कहा ही गया था, इस लिये बुद्ध के करुणापूर्ण वचन ग्रहण करने में या महावीर के दयाप्रेरित जीव-अहिंसा के विचार को अपनाने में ब्राह्मण-संस्कृति को कोई बाधा ही नहीं थी ।
साथ में, अहिंसा के विचार पर तात्त्विक विचार करते हुये योगमहर्षि पतञ्जलि को अहिंसा में क्या बल है यह भी अनुभूत हो गया । उन्हों ने लिख दिया कि – अहिंसाप्रतिष्ठायाम् सर्व-प्राणिनाम् वैरत्यागः ( भवति ) ।। जो आदमी ने सम्पूर्णतया अहिंसा सिद्ध करली है उसकी ओर अन्य सभी प्राणी भी वैर का त्याग करके रहते है ।
इस तरह से, हिन्दुधर्म में वेदकाल से अन्य शब्दों में अभिव्यक्त हुआ अहिंसा का विचार, कुछ कालावधि में प्रकट शब्दों में बद्धमूल हो गया ।।

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धार्मिक ग्रन्थों के सन्दर्भों के अलावा संस्कृत-साहित्य में यदि दृष्टिपात् किया जाय तो भी हिन्दुधर्मियों में अहिंसा की भावना जिस रूप में प्रवहमान थी उसका अन्दाजा मिल जायेगा । सब से पहेले कविकुलगुरु कालिदास के द्वारा अभिज्ञानशाकुन्तल नाटक में मानव और प्रकृति का जो सम्बन्ध चित्रित किया गया है उसे ही देखना उपयुक्त रहेगा । कवि ने कहा है कि नायिका शकुन्तला को शरीर-सुशोभन करना पसंद था, परन्तु आश्रम के हरेक पौधे पर इनके मन में इतना स्नेह था कि वह एक पर्ण-पुष्प भी तोडती नहीं थी । वह अपनी सहेलियों से कहती है कि – अस्ति मम एतेषु सोदरस्नेहः । अर्थात् शकुन्तला को सभी वनस्पति के उपर सहोदर जैसा स्नेह था । और वन-उपवन में विचरण करनेवाले मृगों पर भी अपार दयाभाव था । जिसके कारण वह घास खाते समय मृगों के मुँह में लगे कण्टक के घाव को मिटाने के लिये उनके मुँह पर इङ्गुदीफल का तैल लगा देती थी । यह वह प्रकृति के सब सदस्य है जिसने शकुन्तला को जन्म से ले कर सुरक्षित रखी थी । माता मेनका ने तो शकुन्तला को जन्म दे कर ही जंगल में अनाथ छोड दी थी, परन्तु शकुन्तों ( पक्षिओं ) ने उसे पहेले दिन पाला था, इसी लिये वह शकुन्तला कहलाई थी । यहाँ महाकवि ने मानव और प्रकृति का अभिन्न सम्बन्ध दिखाया है । जो सारे विश्व भर के साहित्य में बेजोड है । अन्यत्र ( युरोपिय देशों में ) तो पृथिवी के केन्द्र में मानव है, और पूरी प्रकृति मानव के उपभोग के लिये है – ऐसी मान्यता प्रवर्तित की गई है । लेकिन भारतीय नायिका – शकुन्तला अपने सुशोभन के लिये भी एक पर्ण भी तोडना पसंद नहीं करती है, और वन के मृगों तक की देखभाल रखती है, क्योंकि वह प्रकृति को अपना अङ्ग ही समझती है । ऐसी माता शकुन्तला का पुत्र आगे चल कर एक बडा चक्रवर्ती राजा बनता है । इस पुत्र का नाम हैः- भरत । अर्थात् सब का भरण-पोषण करनेवाला । और इस भरत के नाम से यह देश भारत कहलाया । ( जो सब का भरण करनेवाला है, जो किसीका विनाश करना नहीं चाहता है । )

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इस प्रसंग में संस्कृत साहित्य का एक अप्रकट और अज्ञात चिन्तन भी बताना अत्यन्त आवश्यक है । इस अमर साहित्य में, आदिकवि वाल्मीकि के समय से ही एक शब्द बार बार प्रयुक्त होता रहा हैः- अनुक्रोश । जिसका अर्थ होता है – परदुःखदुःखिता । = दूसरे के दुःख को देख कर स्वयं दुःखी हो जाना । इस शब्द से व्यक्त होनेवाला जो अर्थ है वह करुणा और दया के बीच का है । करुणा और दया बडे महनीय मानव-धर्म है, परन्तु इस धर्म की ओर ले जानेवाला जो मानवीय तत्त्व है वह है – अनुक्रोशत्व । संस्कृत-साहित्य में बार बार उल्लिखित हुआ यह अनुक्रोशत्व ही अहिंसा का बीजभूत तत्त्व है । रावण ने सीताजी को, अपहरण करके ले जाने के बाद, उसको वशीभूत करने के अनेक बार प्रयास किया । परन्तु वह कभी सफल नहीं हुआ था । यहाँ प्रश्न होता है कि – ऐसी स्थिति में रावण ने सीताजी को क्यूं नहीं मार डाला ? तब वाल्मीकि कहते है कि रावण हंमेशा यही सोचता था कि शस्त्राघात करने पर उसको कितनी वेदना होगी ? – यह थी अनुक्रोश-बुद्धि, जिसके कारण रावण ने सीता को अन्त तक जीवित रखी थी । दूसरी ओर कुन्दमाला नामक नाटक में कवि कहते है कि लव और कुश जब आश्रम में कोई शरारत करते थे तो सीता उन दोनों को “ निरनुक्रोशपिता के पुत्र ” कहे कर उन को पुकारती थी । यहाँ लव-कुश के लिये सीताजी ने जो संज्ञा का प्रयोग किया है वह बडी मार्मिक है । इस में सीताजी की एक शिकायत छीपी हुई हैः— एक सगर्भा स्त्री को घर से नीकाल देते समय किसी भी पुरुष को सोचना चाहिये कि उसे क्या पीडा भुगतनी होगी । कोई भी सामान्य पुरुष जिस पीडा को समझ सकता है वह पुरुषोत्तम राम नहीं समझ सके । जब राम में इस प्रकार का अनुक्रोशत्व ही नहीं है ऐसा सीता को अनुभूत होता है तब वह राम के लिये निरनुक्रोश शब्द का प्रयोग कर रही है । ( यद्यपि यहाँ एक स्पष्टता करनी अत्यंत आवश्यक भी है कि राम यदि पुरुषोत्तम थे उन्होंने ऐसा क्यूं किया । राम ने सीता के प्रति निरतिशय स्नेहभाव होते हुये भी लोकाराधन के व्रत को अपना सर्वोच्च धर्म माना था, उस लिये वह वज्र से कठोर हो कर सीता के प्रति निरनुक्रोश बन सके थे । यह कोई अन्य पामर मनुष्य के वश की बात नहीं थी ।। - यह बात भी कुन्दमाला नाटक लिखनेवाले दिङ्नाग कवि को अनजान नहीं थी । )
संस्कृतकविओं का समुदाय इस अनुक्रोशत्व को एक मानवीय तत्त्व के रूप में प्रस्थापित करते रहे है । महाकवि कालिदास का यक्ष भी मेघदूत के अन्त में बादल से कहता है कि हे मेघ, तुम मुझ पर अनुक्रोश-बुद्धि से देखो और मुझे साहाय्य करो । मेरा सन्देश मेरी प्रियतमा के पास ले जाओ । यदि तुम भी अपनी प्रिया से वियुक्त हो गया होतो तुम कितने दुःखी रहोंगे – यह सोच कर तुम मेरी मदद करो । इसी को अनुक्रोशत्व कहते है । एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति को गीरते हुए देख कर ही तुरंत उसको उठाने के लिये दौड जाता है – यह अनुक्रोश है । जो एक मानव-सहज संवेदना है, और यही सच्चा मानवीय तत्त्व है ।
कालिदास की तरह, नाट्यकार भास ने भी इस अनुक्रोशत्व नामक गुण की अनेक स्थानों पर प्रशंसा की है । अविमारक नामक नाटक में कुरंगी नाम की राजकुमारी पर मदोन्मत्त हस्ती का आक्रमण होने जा रहा था और सभी नगरजन तितर-भीतर हो गये थे, तब केवल एक अज्ञात युवक ने तुरंत वहाँ आकर हस्ती को मार भगाया, और राजकुमारी को जीवनदान दिया । यहाँ कवि भास ने कुरंगी की माता से कहलाया है कि यह युवक भले ही अज्ञात-कुल हो, परन्तु उस युवक ने निश्चित ही अपने आपको ( ईश्वर के अपार ) कारुण्य के ऋण से मुक्त करवा लिया है । संस्कृतसाहित्य के कविलोग यह मानते है कि ईश्वर की अपार करुणा के बिना हमें न सूरज की रोशनी मिल सकती है, आकाश से न जल की वृष्टि होती, न श्वास लेने को प्राणवायु मिलती । हम सब पर ईश्वर की करुणा का अनहद ऋण है और इस ऋण से मुक्त होने के लिये हमें सभी प्राणिओं के प्रति अनुक्रोश रखना चाहिये ।।
संस्कृत कविओं की सोच है कि ईश्वर द्वारा हम पर प्रदर्शित की गई करुणा को ध्यान में लेते हुये हमें भी अन्य जीवों के प्रति अनुक्रोश-बुद्धि रखते हुये जीवन जीना चाहिये । क्योंकि, यदि हमारा जीवन ही किसी की करुणा पर निर्भर है । तो अनुक्रोशत्व का पालन करना हमारा धर्म बन जाता है । इस अनुक्रोश में से ही दया का उदय होता है । भूत मात्र पर जब दया पैदा होती है तो अहिंसा अपने आप हमारे आचार का अभिन्न अङ्ग बन जायेगी ।।

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