बुधवार, 10 मार्च 2010

श्रीमद् भागवतपुराण में वैदिक देवता सृष्टि का तिरोधान

श्रीमद्भागवत महापुराण में वैदिक देवतासृष्टि का तिरोधान*
वसन्तकुमार म. भट्ट
निदेशक, भाषासाहित्यभवन,गुजरात विश्वविद्यालय,
अहमदाबाद-380 009
bhattvasant@yahoo.co.in
(1)
यह सुविदित है कि मन्त्रसंहिताओं में अग्नि, इन्द्र, वरुण, यम, प्रजापति, मरुदादि बहुविध देवताओं की स्तुतियाँ प्रस्तुत है । इन सभी देवताओं के द्वारा ही इस सृष्टि का आविर्भाव हुआ है, और उसका सञ्चालन भी इन के द्वारा होता है । प्रस्तुत आलेख में वैदिक-देवतासृष्टि का पुराणकाल में कैसे क्रमशः तिरोधान होता जाता है, यह बताने की कोशिश की है । विशेष रूपसे श्रीमद्भागवत पुराण को लेकर उस में इन्द्र देवता का वेदोक्त प्रधानभाव कैसे गौणत्व को प्राप्त करके, अन्ततोगत्वा सम्पूर्ण तिरोहित हो जाता है- इस की सोदाहरण चर्चा करनी अपेक्षित है ।
हम जानते है कि वेदसाहित्य में इन्द्रदेवता का प्राधान्य सर्वोपरि है, ओर इस देवता का वृत्रासुर के साथ बार बार युद्ध होता है । और इन्द्र की विजय होती है । इस युद्ध में कदाचित् इन्द्र को मरुद्गण की या विष्णु की साहाय्य भी मिलती है । वैदिक पुराकथाओं में यह बात भी कही जाती है कि वैदिक देवगण आदितः अजर एवं अमर नहीं थे । लेकिन कालान्तर में उन्होंने तप या सोमपान से अमरत्व प्राप्त किया था । तत्पश्चाद् उपनिषत्काल में इन्हीं इन्द्रादि देवों का सर्वोपरित्व या स्वामित्व अमान्य भी किया गया है । केनोनिषद् में सर्वोपरि सत्ता के रूप में ‘ब्रह्मन्’ तत्त्व को प्रस्थापित किया गया है ।।
इन वेदोक्त पुराकथाओं (Myths) का विविध पुराणों में, उपबृंहण करने के साथ साथ स्थानान्तरण, रूपान्तरणादि करते करते, वेदोक्त सृष्टिविद्या के मूलभूत तत्त्वों का संरक्षण करते हुए बादरायण व्यास ने अपनी निजी पौराणिक दृष्टि से एक अद्वितीय पुराणसाहित्य का निर्माण किया है ।।
श्रीमद्भागवत महापुराण के आरम्भ में ही व्यासने प्रस्तुत पुराण रचना का प्रयोजन उद्घोषित करते हुए लिखा है कि –
वासुदेवे भगवति भक्तियोगः प्रयोजितः ।
जनयत्याशु वैराग्यं ज्ञानं च यद् अहैतुकम् ।। 1-2-7

वासुदेवपरा वेदा, वासुदेवपरा मखाः ।
वासुदेवपरा योगा, वासुदेवपराः क्रियाः ।। 1-2-28


वासुदेवपरं ज्ञानं वासुदेवपरं तपः ।
वासुदेवपरो धर्मो वासुदेवपरा गतिः ।। 1-2-29

इन श्लोकों से मालुम होता है कि श्रीमद्भगवतपुराण में भगवान् वासुदेव के प्रति जो भक्तियोग होना चाहिए उसका निरूपण केन्द्रीभूत विषय है । और इस भक्तियोग को उद्भासित करने के लिए वेदवर्णित देवतासृष्टि को भी वासुदेवाश्रित चित्रित की गई है ।
(2)
भगवान् विष्णु के अवतार स्वरूप वासुदेव श्रीकृष्ण पर आश्रित वैदिक देवतासृष्टि का चित्र देखने से पहेले, हम ऋग्वेद स्थित विष्णु-देवता विषयक पुराकथा का संक्षेप में अभ्यास कर लेंगे । ऋग्वेद में द्युस्थानीय देवताओं में – सविता, पूषन्, अर्यमन्, आदित्य, उषस् आदि का समावेश होता है, जिसमें विष्णु का भी समावेश है । यहाँ विष्णुसूक्तों की संख्या चार-पाँच से अधिक नहीं है । इनमें से दीर्घतमस् ऋषि के जो सूक्त है, उसमें विष्णु के लिए उरुक्रम, उरुगाय, त्रिविक्रम, युवा, बृहच्छरीर, अकुमार जैसे विशेषणों का प्रयोग किया गया है । दूसरी और सप्तम मण्डल में वसिष्ठ ऋषिने विष्णु के लिए ‘शिपिविष्ट’ तथा ‘निषिक्तपा’ – इन दो विशेषणों का ध्यानास्पद प्रयोग किया है । यद्यपि यह बात एकदम स्पष्ट है कि ऋग्वेद में वर्णित विष्णुदेवता द्युस्थानीय है और वह सूर्यदेवता ही है । परन्तु पुराणकार व्यासजीने विष्णु के लिए प्रयुक्त पूर्वोक्त विशेषणों का श्रीमद्भागवत-महापुराण में बडे रोचक स्वरूप में उपबृंहण किया गया है ।
‘विष्णु’ शब्द का निर्वचन करते हुए आचार्य यास्क ने लिखा है कि- यद् विषितो भवति, तद् विष्णुर्भवति । विष्णुर्विषतेर्वा, व्याप्नोतेर्वा, तस्यैषा (ऋक्) भवति । (निरुक्त, अ-12) इस पर दुर्गने कहा है कि – विषितो व्याप्तोડयमेव सूर्यो रश्मिभिः भवति तदा विष्णुः भवति । अर्थात् व्यापनशील सूर्य के लिए ‘विष्णु’ शब्द का प्रयोग होना यथार्थ है।
वेदों में इस विष्णु को ‘त्रिविक्रम’ कहा है । इस वेदोक्त पुराकथा का उपबृंहण करके वामन आख्यान की भागवतपुराण में रचना की गई है ।
इसी तरह से ‘विष्णु’ , जो कि सविता देव का ही पर्याय है, उसके लिए वसिष्ठने “शिपिविष्ट” शब्द का प्रयोग किया है । यह विशेषण सूर्यरश्मिओं को ध्यान में रखते हुए प्रयुक्त हुआ है । सूर्य अपनी किरणों रूपी शिपि से पृथिवी में प्रवेशता है, और बीजों को अंकुरित करता है । और यदि ‘विष्णु’ (पृथिवी में) गर्भाधान करनेवाला हो तो, वसिष्ठ की दृष्टि में वह विष्णु ‘निषिक्तपा’ (ऋ 7-36-4) भी होना चाहिए । अर्थात् गर्भाधान करनेवाले विष्णु ही गर्भ के (निषिक्त रेतस् के) संरक्षक भी बने ।। इन दो विशेषणों द्वारा जो वेदोक्त पुराकल्पन (Myth) प्रस्तुत हुई थी, उसका उपबृंहण करते हुए व्यासजीने षष्ठस्कन्ध में मरुद्गण की उत्पत्ति वर्णित की है, और दशम स्कन्ध में वसुदेव-देवकी के सात गर्भों की हत्या करनेवाले कंस का संहार करनेवाले श्रीकृष्ण को विष्णु के अवतार कहे है । वेदोक्त “निषिक्तपा” शब्द का चारितार्थ्य बताने के लिए ही व्यासने देवकी के अष्टमगर्भ के रूप में श्रीकृष्ण का जन्म वर्णित किया है ।।
(3)
वैदिक पुराकथाओं का उपबृंहण करने के साथ साथ व्यासने ‘विष्णु’ विषयक एक नवीन पुराकल्पन का भी सर्जन कर लिया है । भारतीय परम्परागत मान्यता के अनुसार व्यासने मन्त्रों का संहिताकरण कर लेने के बाद ‘महाभारत’ की रचना की थी । इस महाभारत में ऐतिहासिक कृष्ण का चरित भी उन्होंने वर्णित किया था । अतः वे जब पुराणों की रचना करते है तब वेदोक्त ‘विष्णु देवता’ और महाभारतोक्त ‘श्रीकृष्ण’ का समाहार करके एक नवीन “चतुर्भुज विष्णु” का नवसर्जन भी करते है ।
‘चतुर्भुज विष्णु’ की जो परिकल्पना पुराणों में वर्णित है, वह शङ्ख-चक्र-गदा-पद्मधारी विष्णु है, यह सर्वविदित है । परन्तु ध्यान दे कर सोचा जाय तो पुराणकाल के विष्णु के दो हाथों में जो 1.सुदर्शन चक्र एवं 2. पद्म है- वह दोनों वेदकालीन सूर्यदेवता के द्योतक प्रतीक है । तथा अन्य दो हाथों में जो 3.गदा एवं 4.खङ्ख रखे गये है, वे दोनों महाभारतकालीन श्रीकृष्ण के प्रत्यायक है । महाभारत के भीष्मपर्व में (श्रीमद्भगवद्गीता में) अवतारवाद का शङ्ख फूंकते हुए श्रीकृष्ण ने कहा है कि-

परित्राणाय साधूनाम् विनाशाय च दुष्कृताम् ।
धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे ।।

इस से साधुपरित्राण और दुष्टों के विनाश के लिए विष्णु के हाथ में गदा स्थापित की गई है, तथा “संभवामि युगे युगे” का वादा देने के लिए एक अन्य हाथ में शङ्ख रखा गया है । इस तरह से, व्यासने वेदकालीन विष्णु(सूर्य) और महाभारतकालीन श्रीकृष्ण को एकत्र मिला कर ‘चतुर्भुज विष्णु’ की अपूर्व कल्पना का निर्माण किया है ।। अर्थात् पुराणों में भी, व्यास के द्वारा सृष्टिविद्या की केन्द्रभूत वेदोक्त सूर्योपासना नवीन स्वरूप में प्रवाहित की गई है ।
(4)
व्यासजी के हाथों से वेदोक्त पुराकथाओं का उपबृंहण और नवसर्जन होने के साथ साथ अन्य वैदिक देवतासृष्टि का कैसे क्रमिक विसर्जन भी हुआ है यह भी रसप्रद ज्ञातव्य विषय है । परन्तु वैदिक देवताओं का विसर्जन देखने से पहेले, व्यासने वेदों में वर्णित इन्द्र देव की प्रधानता एवं सर्वोपरिता का जो स्थानान्तरण किया है वह भी द्रष्टव्य है – ऋग्वेद में 33 या उससे भी अधिक देवताओं की स्तुति की गई है । परन्तु सब से अधिक 250 सूक्तों में जिसकी स्तुति की गई है वह देवता है इन्द्र । गृत्समद् ऋषि के ‘स जनास इन्द्रः’ (2-12) सूक्त को देखने से मालुम होता है कि देवों में सर्वोपरि देव ‘इन्द्र’ ही है । तथा इस इन्द्र के सहायक-देवों में विष्णु (उपेन्द्र) एवं मरुद्गण आते है । परन्तु पुराणकार व्यास के हाथों से यह इन्द्र एवं विष्णु का प्रधान-गौणभाव स्थानान्तरित हो जाता है । जैसा कि – श्रीमद्भागवत महापुराण के अष्टमस्कन्ध को देखने से मालुम होता है कि इन्द्रादि देवों ने जब बृहस्पति की अनुपस्थिति में विश्वरूप का सहारा लिया तो उसने देवों को ‘नारायणकवच’ का उपदेश दिया । तदनन्तर शङ्खचक्रगदाधर नारायण प्रकट हो कर वृत्रासुर को मारने के लिए दधीचि के गात्रों ले आने की सलाह देते है । जिससे ‘वज्र’ बनवा कर इन्द्रने वृत्रासुर कि दो भुजायें काट ली । तब वृत्र ऐरावत हस्ती सहित इन्द्र को निगल जाता है । परन्तु मायावी इन्द्र ‘नारायण-कवच’ की रक्षा से सुरक्षित रहा, और वृत्र का उदर फाड कर बहार नीकल जाता है । तब फिर से भीषण युद्ध होता है । यहाँ पर वृत्रासुर मरने से पहेले जो कहता है, वह ध्यातव्य है-

नन्वेष वज्रस्तव शक्र तेजसा हरेर्दधीचेस्तपसा च तेजितः ।
तेनैव शत्रुं जहि विष्णुयन्त्रितो, यतो हरिर्विजयः श्रीर्गुणास्ततः ।। (भा.पु. 6-11-20)

वृत्र- “हे इन्द्र ! तेरे इस वज्र में श्रीहरि का तेज है, और दधीचि का तप है, और तुम विष्णु से संचालित है, अतः तुम मुझे मार सकते हो । जहाँ श्रीहरि होते है वहीं पर विजय, श्री और सभी गुण होते है ।” इन्द्रने वृत्रासुर का वध तो किया, परन्तु अब ब्रह्म-हत्या का पाप इन्द्र को सताता है । इन्द्र भाग कर मानस सरोवर की एक कमलनाल में प्रविष्ट हो जाता है । वहाँ पर हजारों वर्षो तक कमल-विहारिणी लक्ष्मी ने ( अर्थात् विष्णुपत्नीने ) इन्द्र का रक्षण किया । इस तरह वृत्रासुरवध-प्रसङ्ग में भी व्यासजी के द्वारा बार बार इन्द्र कि रक्षा विष्णु के अधीन है यह बताया गया है ।।
(5)
दितिने अपने ‘हिरण्याक्ष’ एवं ‘हिरण्यकशिपु’ नामक दो पुत्रों की हत्या हो जाने के बाद कश्यप की सेवा करके ‘इन्द्रहन्ता’ एवं ‘अमृत्यु’ पुत्र का वरदान माँगा । कश्यपने अदिति के पुत्र इन्द्र की भी रक्षा का विचार मन में रखते हुए, दिति को ‘पुंसवन वैष्णवी-व्रत’ का उपदेश दिया ।
अब इन्द्र इस वैष्णवव्रत अमोघ फल-प्रदाता है, ऐसा जान कर छद्म वेष से दिति का दास बन के रहता है । संवत्सर पर्यन्त चलनेवाले इस व्रत में कदाचित् क्षति होने के इन्तजार में इन्द्र बैठा था । एकदा दिति ने उच्छिष्ट मूँह रखा था, तब शयन किया । इन्द्र उसी समय दिति के उदर में जा कर गर्भ को सात टुकडों में काट देता है । परन्तु गर्भस्थ शिशु वैषणव-व्रत के कारण सुरक्षित थे, वे मरे नहीं । और रोने लगे । इन्द्र ने “मा रोदीः ।” कह कर फिर प्रत्येक टूकडों को सात-सात करके उनपचास (49) टूकडें कर दिये । फिर भी वे नहीं मरे, तब इन्द्र ने उसको अपने बान्धव के रूप में स्वीकार कर लिया ।
यहाँ कश्यप ने दिति को जो वरदान दिया था, उसके शब्द ध्यातव्य है-
पुत्रस्ते भविता भद्रे इन्द्रहाડदेवबान्धवाः ।
संवत्सरं व्रतमिदं यद्यञ्जो धारयिष्यसि ।।
इस श्लोक पर श्रीधर ने मर्मोद्घाटन करते हुए लिखा है कि- वैष्णवं व्रतं तावदुपद्देक्ष्यामि तेनैव अस्याः शुद्धचित्ताया इन्द्रं प्रति क्रोधो निवर्तिष्यते, पुत्रस्त्वमर्त्यो भविष्यति, दीर्घकालत्वे च व्रतस्य कथंचिद् वैगुण्ये सतीन्द्रस्य वधोડपि न भविष्यतीति ।।
दिति के (मरुद्) पुत्र भी अमर्त्य बनेंगे, तथा व्रत में वैगुण्य पैदा होने पर इन्द्र का भी वध नहीं होगा ।। - इस तरह से मरुद्गण की उत्पत्तिकथा सूनानें में भी व्यास ने वैदिकदेवता इन्द्र की रक्षा वैष्णवव्रत पर आधृत है यह सूक्ष्म बात प्रदर्शित की है ।
(6)
भागवत के षष्ठ स्कन्ध में जहाँ जहाँ वैदिक देवों की विष्णु-आश्रितता प्रदर्शित है, ( जैसे कि- दधीचि की हड्डी से बने वज्र में विष्णु का तेज, नारायण कवच की रक्षा, कमल-विहारिणी लक्ष्मी का शरण और पुंसवन वैष्णव-व्रत ) वहाँ विष्णु की परोक्ष साहाय्य वर्णित है । तथा वेदवर्णित इन्द्र का सर्वोपरित्व अब छीन लिया गया है, और वह विष्णु पर स्थानान्तरित होता जा रहा है ।
अब अष्टम स्कन्ध में इन्द्र की विष्णु-आश्रितता में और बाढ आती है । क्योंकि असुरों से परास्त होता हुआ इन्द्र अब बार-बार विष्णु की प्रत्यक्ष साहाय्य पर जीने लगा है- ऐसा वर्णन व्यासने प्रस्तुत किया है -
एकबार असुरों ने स्वर्गलोक पर आक्रमण किया, तब देवों के प्राण नीकल गये, वे गिर पडे । इन्द्र-वरुणादि निस्तेज हो कर भगवान् अजित की शरण में गयें । उसने इनको समुद्रमंथन के लिए प्रोत्साहित किये । भगवान् विष्णु ने मन्दराचल को उठा कर समुद्र में रखा और स्वयं कच्छप रूप धारण करके मन्दराचल की आधारशिला बने । वासुकिनाग में अपनी शक्ति का संचार भी किया । और अन्त में अमृतकुंभ नीकलने पर ‘मोहिनी’ रूप धारण करके देवोंको अमृत-पान करवाया । यहाँ विष्णु की प्रत्यक्ष साहाय्य से देवों को अमरत्व प्राप्त हुआ ऐसा वर्णन है । अब इन्द्र-विष्णु का वेदोक्त प्रधान-गौणभाव बदल जाता है । विष्णु की सर्वोपरिता एवं प्राधान्य दोनों उद्घाटित होते जाते है ।।
* * *
वञ्चित हुए असुरों ने स्वर्ग में फिर से आक्रमण किया । बलि ने विश्वजयी यज्ञ किया । तब इन्द्रादि देवगण स्वर्ग से भ्रष्ट होने की भीति से आतंकित था । तब अदितिने पयोव्रत का पालन किया और विष्णु अवतार स्वरूप वामन का प्राकट्य होता है । वेदोक्त विष्णु की ‘त्रिविक्रम’ होने की कथा का उपबृंहण करके व्यासने वामन के विराट होने की नयी पुराकथा हमारे सामने प्रस्तुत की । इन्द्रादि देवों को फिर से विष्णु की प्रत्यक्ष साहाय्य से ही त्रिविष्टप वापस मिला । पुराणों में अब विष्णु सर्वोपरि एवं उपकारक देव की भूमिका में है, और वेदोक्त इन्द्रादि देव गौणत्व की भूमिका पर उतर आते है, और ‘उपकार्य’ की कोटि में चले जाते है ।।
(7)
व्यासने विष्णु की सर्वोपरिता प्रस्थापित करने के बाद इन्द्रादि वैदिक देवातासृष्टि का तिरोधान भी करने का उपक्रम श्रीमद्भागवत के दशम स्कन्ध में रखा है । पहले (बिन्दु क्रमांक 3 में) कहा गया है कि व्यासने वेदोक्त विष्णु और महाभारत-कालीन श्रीकृष्ण का समाहार करके पुराणों में ‘चतुर्भुज विष्णु’ का नवसर्जन- नवकल्पन- कर लिया है । अतः अब दशम स्कन्ध में श्रीकृष्ण जब अपने पिता नन्दजी से प्रस्ताव रखते है इन्द्रमख(यज्ञ) बंध रखा जाय, और उसके स्थान पर गोवर्धन पर्वत की पूजा की जाय, तब यह बात अत्यंत स्पष्ट हो जाती है कि पुराणकारों ने वेदोक्त इन्द्र देवता की सर्वोपरिता छीन कर चतुर्भुज विष्णु को दी है, तथा इन्द्रादि वैदिक देवों की वासुदेवाश्रितता बतानी शुरू कर दी है ।
दशम स्कन्ध में वर्णित इन्द्रमखभंग प्रसंग में श्रीकृष्ण के मुख में रखे गये शब्दों को देखा जाय तो—
इन्द्राय मन्युं जनयन् पितरं प्राह केशवः ।
कर्मणा जायते जन्तुः कर्मणैव विलीयते।।
सुखं दुःखं भयं क्षेम कर्मणैवाभिपद्यते ।। 10-24-12,13

रजसा चोदिता मेघा वर्षयन्त्यम्बूनि सर्वतः ।
प्रजास्तैरेव सिद्ध्यन्ति, महेन्द्रः किं करिष्यति ।। 10-24-23
कर्म के सिद्धान्त को एवं सत्त्व-रजसादि के सांख्योक्त सिद्धान्त को पुरस्कृत करके श्रीकृष्ण ने, इन्द्र की “वृष्टि के देवता” के रूप में जो प्रतिष्ठा थी वह छीन ली है । इन्द्रमखभंग प्रसंग इसका प्रतीक है । व्यास ने श्री कृष्णचरित के द्वारा वैदिक देवतासृष्टि का तिरोधान कर दिया ।
तथा दूसरी ओर से, कलियनाग दमन का प्रसंग चित्रण करके इन्द्रविषयक एक वेदोक्त पुराकथा का स्थानान्तरण भी कर दिया है । वेदों में कहा गया है हि इन्द्र ने ‘अहि’ (एक सर्प) को मार कर पानी को बहाया । विष्णु के अवतार स्वरूप श्रीकृष्ण ने भी यमुना के जल में प्रविष्ट हो कर कालियनाग का दमन किया । और यमुनाजल को विषमुक्त किया । अब वेदोक्त इन्द्र देव श्रीविष्णु(एवं श्रीकृष्ण) के सामने सर्वथा निस्तेज हो गये है ।।
(8)
इन्द्र-अहि की वेदोक्त पुराकथा का स्थानान्तरण (Displacement) करके श्रीकृष्ण-कालिदमन की पुराकथा का नवसर्जन व्यासने किया है—ऐसा जब कहते है तब इसी पुराकथा से सम्बद्ध एक दूसरे पहलु की भी बात करनी चाहिए—
महाकवि कालिदासने ‘रघुवंश’ (6-49) में कहा है कि-
त्रातेन तार्क्ष्यात् किल कालियेन
मणिं विसृष्टं यमुनौकसा यः ।
वक्षःस्थल-व्यापिरुचं दधानः
सकौस्तुभं ह्रेपयतीव कृष्णम् ।।
इस श्लोक में, कालिदास के समय में प्रचलित पुराकथा का निर्देश है – यहाँ ऐसा कहा गया है कि कालियनाग को श्रीकृष्ण ने गरुड के त्रास से मुक्त किया, इस समय कालियनाग ने अपने मस्तक से उतार कर श्री कृष्ण को कौस्तुभ मणि दिया था ।
परन्तु कालिदास के समय में प्रचलित उपर्युक्त पुराकथा पुराणकार व्यास के हाथ में सर्वथा बदल दी गई है, श्रीद्भागवत में तो कहा गया है कि कौस्तुभ मणि की प्राप्ति तो समुद्रमंथन के समय हुई थी । चतुर्भुज विष्णु के वक्षःस्थल पर कौस्तुभमणि शोभायमान हो रहा है । पुराणकाल में प्रचलित हुई ऐसी नवीन मिथक का कारण यही हो सकता है कि विष्णु के हाथ में रहा सुदर्शनचक्र जैसे ‘सूर्य देवता है’ ईस बात का द्योतक बन जाता है, उसी तरह से यह कौस्तुभ मणि भी विष्णु के ‘सूर्य’ होने का प्रतीक है ।
(9)
महाभारतोक्त अवतारवाद के आधार पर जब श्रीमद्भागवत पुराण में चतुर्भुज विष्णु के अवतार के रूप में वासुदेव श्रीकृष्ण को प्रस्थापित किया जाता है, तब वेदोक्त सूर्यात्मा स्वरूप विष्णु का श्रीकृष्ण के साथ पूरा अभेद भी प्रस्थापित किया जाता है । तद्यथा- 1. श्रीकृष्ण गायों से परिवेष्टित है, गोपाल है—ऐसा कहने का तात्पर्य यही है कि अनेकार्थक ‘गो’ शब्द का एक अर्थ सूर्यकिरण भी है । अतः श्रीकृष्ण का गो-परिवेष्टित होना सूर्य का प्रत्यायक भी बनता है । 2.सूर्यकिरण में सात रंगो का समाहार है, इस सत्य को ध्यान में रखते हुए, पुराणकार ने श्रीकृष्ण को भी मयूरपिच्छधारी बनाया है । 3.सूर्यरश्मि का रंग पीत होता है, और दूसरी ओर श्रीकृष्ण भी पीताम्बरधारी है ऐसा देख कर यह बात भी समझ में आती है कि पुराणकार व्यास वासुदेव श्रीकृष्ण का वेदोक्त सूर्यात्मा स्वरूप विष्णु के साथ अभेद प्रस्थापित करना चाहते है ।
श्रीकृष्ण सूर्यात्मा स्वरूप विष्णु ही है- इस बात का साद्यन्त निर्वहण करने के लिए पुराणकार व्यासने श्रीकृष्ण के देहोत्सर्ग की भूमि भी भारत के पश्चिमभाग में समुद्रतटस्थित प्रभासपाटण-तीर्थ बताई है । इस तीर्थ स्थान से ही सूर्य कि अन्तिम किरण समुद्रमे जाती है ऐसा स्कन्दपुराण में कहा गया है । इस भागवत के आरंभ में (द्वितीयाध्याय में) ही जो कहा था कि “वासुदेवपरा वेदाः” वेद याने वैदिक देवतासृष्टि वासुदेव श्रीकृष्णाश्रित है—ऐसा बताना श्रीमद्भागवत पुराण ही रचना का एक प्रयोजन है । वह विचार सुचारु रूप से सिद्ध किया गया है ।
(10)
सृष्टिविद्या के सन्दर्भ में पौराणिकी दृष्टि की यदि विचारणा की जाय तो वाक्यपदीयकार भर्तृहरि का स्मरण करना उपयुक्त रहेगा । व्याकरण की प्रशंसा करते हुए उन्होंने कहा है कि—
यत्तत् पुण्यतमं ज्योतिस्तस्य मार्गोsयमाञ्जसः । (वा. 1 /12 )

इस कारिका की स्वोपज्ञ टीका में भर्तृहरिने लिखा है कि– त्रीणि ज्योतिंषी, त्रयः प्रकाशाः । अर्थात् इस ब्रह्माण्ड में तीन ज्योतियाँ है, जिसके तीन तरह के प्रकाश है । तद्यथा 1.सूर्य 2.आत्मा और 3.शब्दब्रह्म ।। इन तीनों ज्योतिओं में तारतम्य भी है । इस ब्रह्माण्ड में यदि किसी भी तरह की जीवसृष्टि का प्रादुर्भाव करना है तो सब से पहले सूर्यरूप ज्योति की जरूरत है । लेकिन ब्रह्माण्ड में आत्मत्त्व रूप ज्योति/ चैतन्य स्वरूप ज्योति नहीं होगी तो सृष्टि के विस्तार की कोई गुंजायश नहीं है । अतः यह आत्मतत्त्व को पुण्यतर ज्योति कही जायेगी । और शब्दब्रह्मरूप तीसरी ज्योति न होने पर मनुष्यसृष्टि पशुसृष्टि में परिवर्तित हो जाती है । अतः शब्द रूप ज्योति को पुण्यतम ज्योति कही है ।।

इन त्रिविध ज्योतिओं में से वैयाकरणों ने शब्दब्रह्म रुप तीसरी ज्योति की उपासना की है । जो वेदान्ती दार्शनिक है, वे आत्मतत्त्व रूप दूसरी ज्योति की विचारणा करते है । परन्तु पौराणिक दृष्टि से तो सूर्य-विष्णु-रूप प्रथम ज्योति ही आराध्य है, क्योंकि सृष्टिविद्या का वह मूल है । और इसी प्राथमिक ज्योति की वर्णना में ही भागवतपुराण के रचनाकार व्यास साद्यन्त रममाण है । वेदोक्त विष्णु जो सूर्यात्मक है, उसी की पुराकथाओं का उपबृंहण करते हुए व्यास, अन्य इन्द्रादि देवों की पुराकथाओं का स्थानान्तरण, रूपान्तरणादि करते हुए ‘चतुर्भुज विष्णु’ की अपूर्व कल्पना का निर्माण भी करते है । तथा वासुदेव श्रीकृष्ण के साथ विष्णु का अभेद बताते हुए सूर्यात्मक ज्योति की विचारधारा अक्षुण्ण बनाये रखते है- यह रोमांचकारी हकीकत है ।।

वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः ।।


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5 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर तत्वग्यान पूर्ण जानकारी

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  2. माननीयश्री भट्ट साहब,
    सादर नमस्कार,
    श्रीमद् भागवत महापुराण में वैदिक देवतासृष्टि का तिरोधान –लेख में आपने वैदिक और पौराणिक देवताके विषय के बारेमे संसोधन के लिये आगे बढने के लिये एक नई दिशा खोल दी है ।
    - दिनेश माछी

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  3. माननीयश्री भट्ट साहब,
    सादर नमस्कार,
    श्रीमद् भागवत महापुराण में वैदिक देवतासृष्टि का तिरोधान –लेख में आपने वैदिक और पौराणिक देवताके विषय के बारेमे संसोधन के लिये आगे बढने के लिये एक नई दिशा खोल दी है ।

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  4. परमादरणिय,परमवंदनीय वसंतभाई भट्ट जी मै ईस विषय पर बहुत बडे स्तर पर संशोधन कर रहा हु। आपका यह संशोधन मेरे जैसे सनातन धर्मके नूतन संशोधक के लिये काफि उपकारक सिद्धा होगा.

    मेरी द्र्ष्टिसे वैदिक देवो और पौराणिक देवो के चरित्रो के वर्णन मे काफ़ि अन्तर दिखाई पडता है। उसका क्या कारण हो सकता है? क्या शैवदि सम्प्रदाय के लोगो के कारण ऐसा हुआ है? यदि पुराणो की रचना वेद व्यास ने की है तो ऐसी वेद विरूद्ध बाते नहि होती।

    आपके उद्यमको साष्टंग वंदन॥

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