अभिज्ञानशा(श)कुन्तल – कृति-समीक्षा से पाठ-समीक्षा
( तृतीय अङ्क के विशेष सन्दर्भ में )
वसन्तकुमार म. भट्ट
निदेशक, भाषासाहित्य भवन, गुजरात विश्वविद्यालय, अहमदाबाद – 380 009
bhattvasant@yahoo.co.in
भूमिकाः- पाठसमीक्षा की प्रक्रिया में दो स्तर होते हैः- 1. निम्न स्तरीय पाठसमीक्षा और 2. उच्च स्तरीय पाठसमीक्षा । पाण्डुलिपिओं में संचरित हुए पाठ में जब अशुद्धियाँ, खण्डितांश, विविध पाठभेद एवं प्रक्षेपादि दिखाई देते है तब प्रथमतः निम्न स्तरीय पाठ-समीक्षा की जाती है । जिसमें अभीष्ट कृति का पाठ निश्चित पद्धति से परिशुद्ध स्वरूप में तैयार किया जाता है । तथा विभिन्न पाण्डुलिपियों में संचरित हुए, लेकिन अमान्य किये गये पाठान्तर एवं प्रक्षेपादि को पादटिप्पणी में प्रदर्शित भी किये जाते हैं । इस तरह, जो पाठ संपादित किया जाता है उसको “समीक्षित पाठ-सम्पादन” कहते है । इस तरह की समीक्षितावृत्ति में अधिकृत पाठ के रूप में स्थापित किया गया पाठ मूल कवि ने ही लिखा होगा या नहीं ? उसकी भी प्रमाण-पुरस्सर परीक्षा करने के लिये ( स्वतन्त्र रूप से ) “उच्च स्तरीय पाठसमीक्षा” की भी आवश्यकता रहती है । पाठसम्पादक को अब इस द्वितीय स्तर की पाठसमीक्षा में पाण्डुलिपियों के साक्ष्य से बाहर निकल के सोचना है । पाण्डुलिपियों में संचरित हुए विविध पाठभेदों में से प्राचीनतम या बहुसंख्य पाण्डुलिपियों में ग्राह्य रहे पाठ का ( अधिकृत पाठ के रूप में ) चयन कर लेने के बाद भी, अमुक पाठ मूल ग्रन्थकार या कवि के द्वारा ही लिखा गया है ऐसा सुसम्बद्ध अनुमान प्रस्तुत करने के लिये कुछ अन्य समर्थक हेतु एवं सामग्री की भी आवश्यकता रहती है ।
अतः इस द्वितीय स्तर की पाठ-समीक्षा में – 1. कृतिनिष्ठ आन्तरिक सम्भावना (= पूर्वापर सन्दर्भों में कही गई बातों में सुसंगति है या नहीं उसकी परीक्षा की जाती है । अर्थात् कृति के दो वाक्यों में परस्पर कोई विरोध नहीं होना चाहिये । ), 2. कृति में आदि से लेकर अन्त तक कवि की निरूपण शैली, 3. बहिरंग प्रमाण के रूप में कवि ने अपने पुरोगामी ग्रन्थों से कौन सी सामग्री ली है एवं अनुगामी कविओं पर क्या प्रभाव डाला है – उसका विश्लेषण एवं परीक्षण भी किया जाता है । इस तरह की उच्च स्तरीय पाठ-समीक्षा में, उपर्युक्त तीनों प्रमाणों से सोचना आवश्यक है । पाठसम्पादक आरम्भ में तो जब पाण्डुलिपियाँ के साक्ष्य को लेकर सोचता है, तब ( अर्थात् निम्न स्तरीय पाठसमीक्षा में ) तो वह पूर्ण रूप से वस्तुनिष्ठ अनुमान क्या निकाला जा सकता है – उस पर ही ध्यान रखते हुए आगे बढता है । लेकिन उच्च स्तरीय पाठसमीक्षा के दौरान उसे कृतिसमीक्षा से पाठसमीक्षा करनी चाहिये, जो अधिक फलदायिनी सिद्ध होगी । क्योंकि यहाँ पर आत्मलक्षिता से बचते हुए, कृतिनिष्ठ ठोस प्रमाणों से यदि पाठ की मौलिकता सिद्ध की जाती है, तो उसमें सर्वसम्मति प्राप्त होने की योग्यता भी रहती है । प्रस्तुत आलेख में, इसी दृष्टिकोण से अभिज्ञान-शकुन्तल नाटक के तृतीयाङ्क की पाठसमीक्षा करने का लक्ष्य रखा है ।। ( शाकुन्तल के तीन पाठ्यांश 1. तीसरे अङ्क का शृङ्गारिक अंश, 2. पञ्चमाङ्क का आरम्भ, तथा 3. सप्तमाङ्क का प्रवेशक – मुख्य रूप से विवादास्पद रहे है ।। )
[ 1 ]
महाकवि कालिदास का अभिज्ञानश(शा)कुन्तल नाटक संस्कृत नाट्यसाहित्य में सर्वश्रेष्ठ है, तथा विश्वनाट्यसाहित्य में भी वही नाटक अग्रगण्य है । सारे संसार के विद्वानों ने बहुविध पाण्डुलिपिओं का उपयोग करके इस नाट्यकृति की अनेक समीक्षित आवृत्तियाँ प्रकाशित की है । लेकिन इनमें से एक भी समीक्षित आवृत्ति का पाठ अद्यावधि सर्वस्वीकृत नहीं हो सका है । शाकुन्तल के विविध संस्करणों का प्राथमिक परिचय किया जाय तो सर विलीयम्स जॉन्स ने बंगाली पाण्डुलिपिओं में संचरित हुए अभिज्ञानशकुन्तल का प्रथम अँग्रेजी अनुवाद 1791 ई. स. में प्रकाशित किया था । इसी अनुवाद से पूरे पश्चिमी जगत को हमारे महाकवि कालिदास का परिचय हुआ था । इस के बाद इस नाटक की अनेक पाण्डुलिपियाँ एकत्र करके उसमें संचरित हुई विभिन्न पाठ-परम्पराओं का अभ्यास शूरु हुआ । प्रॉफे. मोनीयर विलीयम्स ने अभिज्ञानशाकुन्तल की देवनागरी वाचना का पाठ प्रकाशित किया ( प्रथमावृत्तिः- 1853 में ) । ( लेकिन उनके सामने राघवभट्ट की अर्थद्योतनिका टीका नहीं थी ) । रिचार्ड पिशेल ने ई. सन. 1876 में बंगाली पाण्डुलिपिओं के आधार पर बंगाली वाचना (Pichel, 1876( First Ed) ,1922( Second Ed.)) का समीक्षित पाठ प्रथम बार प्रकाशित किया । उसी तरह से श्री रमानाथ झा ( 1957 ) ने शङ्कर एवं नरहरि की टीकाओं के साथ मैथिली-वाचना के पाठ का प्रथम बार प्रकाशन किया । यद्यपि अधिकांश विद्वान् ऐसे है जो मैथिली वाचना का स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं स्वीकारते है । क्योंकि इस वाचना का साम्य बहुशः बंगाली वाचना के साथ सद्यः प्रतीत होता है । प्रॉफे. ब्युह्लर ने 1873 में कश्मीरी ( शारदालिपि में लिखी ) पाण्डुलिपि ढूँढ निकाली थी, और प्रॉफे. एस. के. बेलवलकर ने उसका महत्त्व मूल आदर्शप्रति ( Archetype ) के समान मान के, उसी के आधार पर कश्मीरी-वाचना (बेलवलकर, 1965) का पाठ निर्धारित किया है । उसके बाद, 1904 ई. स. में T. Foulkes ने ग्रन्थ, तेलुगु इत्यादि दाक्षिणात्य पाण्डुलिपिओं में उपलब्ध होनेवाले अभिज्ञानशाकुन्तल के विविध पाठान्तरों का संग्रह प्रकाशित किया । तब से विद्वज्जगत् को शाकुन्तल की दाक्षिणात्य वाचना भी है इसकी जानकारी मिली । आन्ध्र प्रदेश संस्कृत अकादेमी, हैदराबाद के द्वारा काटयवेम की कुमारगिरिराजीया टीका के साथ अभिज्ञानशाकुन्तल का प्रकाशन 1982 ई.स.में हुआ है, उसमें दाक्षिणात्य वाचना का पाठ देखा जा सकता है ।।
इस तरह से करीब दो सो वर्षों की कालावधि में, पाण्डुलिपियों में संचरित हुए पाठवैविध्य की निम्न स्तरीय पाठ-समीक्षा करने से विद्वानों को ज्ञात हुआ है कि अभिज्ञानशा(श)कुन्तल नाटक का पाठ पँचविध वाचनाओं में प्रवहमान हुआ है । इन में से बंगाली, मैथिली एवं कश्मीरी वाचना में नाटक का बृहत्पाठ संचरित हुआ है । तथा देवनागरी एवं दाक्षिणात्य वाचना में नाटक का लघुपाठ दिखाई देता है । यहाँ प्रश्न होगा कि इन पाँचों वाचनाओं में से कौन सी वाचना में कालिदास ने ही लिखा हुआ पाठ सुरक्षित रहा होगा । अथवा इन पाँचों वाचनाओं में जहाँ जहाँ जो भी मौलिक अंश सुरक्षित रहा हो उसको कैसे पहेचाना जाय । इस दिशा में सब से पहला संनिष्ठ प्रयास गुजरात के प्रॉफे. बलवन्तराय ठाकोर (B.K.Thakore, 1922) ने किया था । उन्होंने प्रथम अखिल भारतीय प्राच्यविद्या परिषद् (1919,पूना ) में कहा था कि इस नाटक की तीन वाचनायें तो क्या, केवल दो वाचनायें भी होना वह किसी भी शिष्ट / शिक्षित मानवप्रजा को सम्भवतः मान्य नहीं होगा । किन्तु अभी तक जो काम हुआ है उसमें, जैसा कि उपर कहा गया है - अलग अलग प्रान्तों की पञ्चविध वाचनायें ही प्रकाश में आयी है । उनमें से कोई एक पाठ जो निश्चित रूप से केवल कालिदास ने ही लिखा हो ऐसा पाठ अभी तक सामने नहीं आया है । अतः शाकुन्तल का एक विश्वसनीय पाठ, जो सर्वमान्य हो सके ऐसा पाठ तैयार करने के लिये उच्चतर पाठ-समीक्षा करने की आवश्यकता है ।।
प्रॉफे. एस. के. बेलवलकरजी ने इस दिशा में जो प्रयास किये है वह ध्यानास्पद है । यद्यपि मार्गदर्शक हो सके ऐसे उनके शोध-आलेख होते हुए भी परिस्थिति में वस्तुतः कोई सुधार नहीं हुआ है । क्योंकि आज भी शाकुन्तल का पँचविध पाठ ही प्रचार में है, और इन में से कौन सी वाचना का पाठ विश्वसनीय माना जाय इस विषय में एकमति का सर्वथा अभाव है । जैसे कि – 1. प्रॉफे. एस. के. बेलवलकरजी ने नातिलघु और नातिबृहत् हो ऐसे कश्मीरी वाचना के पाठ को मौलिक माना है । 2. प्रॉफे. दिलीपकुमार काञ्जीलाल ने बंगाली वाचना में संचरित हुए पाठ को प्राचीनतम सिद्ध किया है, लेकिन साथ साथ उसे ही मौलिक भी मान लिया है । 3. काशी के पण्डितमूर्धन्य श्री रेवाप्रसाद द्विवेदीजी ने देवनागरी वाचना के पाठ को ही कालिदास-प्रणीत माना है ।।
प्रस्तुत आलेख में, शाकुन्तल नाटक के तृतीयाङ्क के दो तरह के पाठों का परिचय प्राप्त करके उसकी उच्च स्तरीय पाठ-समीक्षा करने का उपक्रम किया जा रहा है । यहाँ कृति-निष्ठ आन्तरिक सम्भावनाओं की चर्चा सोदाहरण की जायेगी । जिसको देख कर सुज्ञ पाठक को प्रतीति होगी कि तृतीयाङ्क का उपर्युक्त शृङ्गारिक अँश, जो बंगाली ( एवं मैथिली ) वाचना में उपलब्ध होता है वह मौलिक हो सकता है ।।
[ 2 ]
अभिज्ञानशकुन्तल के तृतीयाङ्क में गान्धर्व-विवाह का वर्णन किया गया है । इस अङ्क की दृश्यावली दो स्वरूप की है । देवनागरी वाचना में संचरित हुए तृतीयाङ्क के पाठ में कुल मिला के 24 श्लोक है । किन्तु बंगाली वाचना के तृतीयाङ्क में 41 श्लोक है । केवल श्लोकसंख्या को देखने से मालुम होता है कि देवनागरी वाचना की अपेक्षा से बंगाली-वाचना के श्लोक करीब दुगुना है । अतः तृतीयाङ्क के लघुपाठ एवं बृहत्पाठ की दृश्यावली में क्या अन्तर है वह द्रष्टव्य हैः--- यहाँ विशेष रूप से जिस अंश में संक्षेप या प्रक्षेप की स्थिति प्रवर्तमान है वह भाग निम्नोक्त हैः--
देवनागरी वाचना में दोनों सखियाँ मृगपोतक को अपनी माता के साथ संयोजित करने का बहाना बनाती है । और शकुन्तला अपने को अशरणा मेहसूस करने लगती है तब दोनों सखियों ने कहा कि – पृथिव्या यः शरणं स तव समीपे वर्तते ।। इस के बाद दोनों सखियाँ लतावलय से बिदा लेती है – अब नायक और नायिका के एकान्त- (रहसि)मिलन का वर्णन किया जाता है । यहाँ पर 18-19-20-21 इन चार श्लोकों के अन्तराल के बाद तुरन्त ही नेपथ्योक्ति आती है कि – चक्रवाकवधूके, आमन्त्रयस्व प्रियसहचरम् । उपस्थिता रजनी ।। और दोनों सखियाँ गौतमी का प्रवेश करवाती है । इसके प्रतिपक्ष में बंगाली वाचना का जो पाठ है उसमें सखियाँ की बिदा और नेपथ्योक्ति के बीच में 25-26-27-28-29-30-31-32-33-34-35-36-37, अर्थात् कुल मिला के 13 श्लोकों का समूह उपस्थित होता है । बंगाली वाचना के इतने लम्बे पाठ्यांश में कौन सी दृश्यावली रखी गई है – यह किसी भी पाठालोचक के लिये जानना अतीव आवश्यक है ।
1. दुःषन्त शकुन्तला को लतावलय से बाहर जाने से रोकता है । क्योंकि मध्याह्न का आतप अभी प्रखर है । फिर भी शकुन्तला बाहर जाती है और दुःषन्त वहाँ जमीन पर गिरे शकुन्तला के मृणालवलय को अपने वक्षःस्थल से लगाता है । शकुन्तला इस वलय को लेने के बहाने फिर से लतावलय में प्रविष्ट होती है और दुःषन्त उसके हाथ में मृणालवलय पहनाता है ।
2. शकुन्तला जब लतावलय में पुनः प्रविष्ट होती है तब दुःषन्त नायिका को ‘जीवितेश्वरी’ शब्द से पुकारता है, और दुःषन्त जब मृणालवलय पहनाता है तब शकुन्तला भी दुःषन्त को ‘आर्यपुत्र’ ऐसा सम्बोधन करती है ।
3. दुःषन्त ने मृणालवलय को जब दुबारा पहनाया, तब शकुन्तला उसे ठीक तरह से देख नहीं पाती है । क्योंकि उसके नेत्र में कर्णोत्पल की रेणु गिरने के कारण उसकी दृष्टि कलुषित हो गई थी । दुःषन्त उसे अपने वदन-मारुत से स्वच्छ कर देता है । शकुन्तला प्रिय करनेवाले व्यक्ति पर स्वयं अनुपकारिणी बनी रहने के लिये लज्जा का अनुभव करती है । दुःषन्त शकुन्तला को चुम्बन करना चाहता है, परन्तु उसी क्षण नेपथ्य से आवाज आती है । तदुपरान्त अकेली गौतमी का प्रवेश होता है । ( बंगाली पाठ में, गौतमी को लतावलय का मार्ग दिखाती प्रियंवदा और अनसूया साथ में नहीं आती है ) ।।
यहाँ पर प्रश्न ऊठता है कि बंगाली वाचना का बृहत्पाठ यदि मौलिक है तो, क्या देवनागरी वाचना का लघुपाठ ( रङ्गभूमि की आवश्यकता को ध्यान में लेकर किसी के द्वारा ) संक्षिप्त किया गया पाठ है ? अथवा –गान्धर्व-विवाह का संयम के साथ वर्णन करनेवाला देवनागरी एवं दाक्षिणात्य वाचना का पाठ, जो अधिक व्यंजनापूर्ण लगता है वह मौलिक पाठ है और कालान्तर में बंगाली परम्परा के विद्वानों ने उपर्युक्त नवीन दृश्यावली का प्रक्षेप करके, लघुपाठ में से बृहत्पाठ बनाया है ? ।। इस समस्या का उत्तर ढूँढने के लिये केवल प्राचीनतम पाण्डुलिपि का साक्ष्य या बहुसंख्य पाण्डुलिपियों का साक्ष्य देखना पर्याप्त नहीं है और निर्णायक भी नहीं है । यहाँ किसी भी टीकाकार का मत भी विश्वसनीय नहीं है, क्योंकि उपलब्ध टीकाकारों में से एक भी टीकाकार 15वीँ शताब्दी से अधिक पुराना नहीं है । ऐसी स्थिति में, हमारे लिये निम्न स्तरीय पाठ-समीक्षा के उपरान्त उच्च स्तरीय पाठ-समीक्षा के रूप में “ कृति-समीक्षा से पाठ-समीक्षा ” करनी अनिवार्य बन जाती है ।।
[ 3 ]
आन्तरिक सम्भावना या कृतिनिष्ठ ठोस प्रमाण – शब्द से जो अभिप्रेत है उसको समझने के लिये एक-दो उदाहरण देखने होंगेः—( 1 ) शाकुन्तल की प्रस्तावना करते हुए सूत्रधार ने कहाः- अद्य खलु कालिदास-ग्रथित-वस्तुनाSभिज्ञानशाकुन्तलनामधेयेन नवेन नाटकेनोपस्थातव्यमस्माभिः । उसके बाद सूत्रधार के कहने पर नटी ने ग्रीष्म ऋतु का गीत गाया । जिसको सून कर सूत्रधार ने कहा – आर्ये, साधु गीतम् । अहो रागबद्धचित्तवृत्ति- रालिखित इव सर्वतो रङ्गः । तदिदानीं कतमत् प्रकरणम् आश्रित्यैनम् आराधयामः । - यहाँ पर, ‘प्रकरण’ शब्द देवनागरी वाचना का है, उसके स्थान में बंगाली एवं मैथिली वाचना में ‘प्रयोगम्’ ऐसा पाठान्तर भी मिलता है । इसके उपरान्त ‘चर्चा’ नामक टीका में ‘प्रयोगकरणेन’ ऐसा तीसरा पाठभेद भी दिखाई पडता है । ( जिसमें प्रकरण और प्रयोग इन दोनों शब्दों को संमिश्रित किया गया है ) । संस्कृत के सभी छात्र यह जानते है कि दशविध रूपकों में से प्रकरण प्रकार का रूपक तो दश अङ्कों का होता है । इसी लिये शास्त्राज्ञा के दुराग्रही किसी ( बंगाली या मैथिली ) व्यक्ति ने ‘प्रकरण’ के स्थान पर ‘प्रयोग’ शब्द को रख कर दूसरे पाठभेद को जन्म दिया । और तीसरे किसी ने इन दोनों शब्दों को एकत्र करके ‘प्रयोगकरण’ जैसा इदं तृतीयम् कर दिया । राघव भट्ट जैसे आरूढ टीकाकार भी प्रकरण शब्द के विनिवेश का ध्वनि नहीं समझ पाये । यद्यपि उन्होंने परम्परागत पाठ की रक्षा तो की, किन्तु सम्भवतः बिना सूक्ष्म विचार किये “ प्रकरणम् रूपकम् । ” लिख दिया । मतलब कि राघव भट्ट को भी यहाँ प्रकरण शब्द के विनिवेश का प्रयोजन ध्यान में नहीं आया, और ( यहाँ प्रकरण शब्द रूपक-सामान्य का वाचक है – ऐसे ) एक गलत व्याख्यान का जन्म हुआ । दूसरी ओर प्रतिलिपि-कर्ताओं ने नये नये पाठान्तरों को भी उद्भावित कर लिये ।
वस्तुतः यहाँ इस नाटक में आगे चल कर, पञ्चम अङ्क में दुःषन्त की विस्मृति का प्रसंग आकारित होनेवाला है । दुर्वासा के शाप से दुःषन्त शकुन्तला को भूल जानेवाला है । इस केन्द्रवर्ती घटना की अभिव्यंजना करने के लिये ही महाकवि ने नाटक की प्रस्तावना में, क्षणचुम्बितानि.....वाले ऋतुगीत को सून कर मुग्ध हुए सूत्रधार के मुख से नाटक शब्द के स्थान पर प्रकरण शब्द का उच्चारण करवाया है । अन्यथा सूत्रधार ने आरम्भ में ही कहा था कि ‘ नवेन नाटकेन उपस्थातव्यम् ....’ । लेकिन रागबद्धचित्तवृत्ति का यही परिणाम हो सकता है । अतः नटी सूत्रधार को याद दिलाती है कि – नन्वार्यमिश्रैः प्रथममेवाज्ञप्तम् अभिज्ञानशाकुन्तलं नामापूर्वं नाटकं प्रयोगेSधिक्रियतामिति । जिसके प्रत्युत्तर में सूत्रधार ने कहा है कि – आर्ये, सम्यगनुबोधितोSस्मि । अस्मिन् क्षणे विस्मृतं खलु मया ।। नाटक में आगे चल कर प्रस्तुत होनेवाले विस्मरण और पुनःस्मरण का यह साङ्केतिक लघुरूप प्रस्तावना में ही रखा गया है । अतः प्रकरण शब्द से जो भावि विस्मरण का प्रसंग ध्वनित होता है – उसे आन्तरिक सम्भावना कहते है । यहाँ बहुसंख्य पाण्डुलिपियों के साक्ष्य से या प्राचीनतम पाण्डुलिपि के साक्ष्य से यदि प्रयोगम् जैसे पाठभेद का समर्थन होता है, तो भी उसको हटा कर प्रकरणम् जैसे आन्तरिक सम्भावना वाले ( देवनागरी वाचना के ) पाठ को ही मौलिक पाठ के रूप में स्थापित करना चाहिये ।।
( 2 ) इसी तरह से, ( देवनागरी वाचना के ) द्वितीयाङ्क के अन्त भाग में करभक राजमाताओं का सन्देश लेकर आया हैः- - वह कहता है कि – देव्याज्ञापयति – आगामिनि चतुर्थदिवसे प्रवृत्तपारणो मे उपवासो भविष्यति । तत्र दीर्घायुषावश्यं संभावनीया इति । दाक्षिणात्य वाचना के पाठ पर काटयवेम भूप की टीका है उसमें निवृत्तपारणो मे उपवासो.... जैसा पाठान्तर है । किन्तु बंगाली, मैथिली और कश्मीरी वाचना के पाठानुसार क्रमशः पुत्रपिण्डपारणो, पुत्रपिण्डपालन और पुत्रपिण्डपर्युपासनो – जैसे तीन पाठान्तर भी प्राप्त होते है । यहाँ पर भी बहुसंख्य पाण्डुलिपिओं में कौन सा पाठ ग्राह्य रहा है, या प्राचीनतम पाण्डुलिपि किस पाठभेद को मान्यता देती है – उसको महत्त्व न देते हुए, नाटक के आरम्भ में ही नायक दुःषन्त को “ सर्वथा चक्रवर्तिनं पुत्रम् अवाप्नुहि ” ऐसा जो आशीर्वचन मिला है उसको ध्यान में लेकर सोचना चाहिये कि पुत्रप्राप्ति को यहाँ नाटक का लक्ष्य बताया गया है । तथा आदि से लेकर अन्त तक प्रकट या अप्रकट रूप में पुत्रप्राप्ति का उल्लेख सभी अङ्कों में होता ही रहा है । अतः यदि (सर्वत्र) देवनागरी या दाक्षिणात्य वाचना के पाठभेदों को मौलिक पाठ के रूप में मान्यता देंगे तो प्रवृत्तपारणो या निवृत्तपारणो – जैसे पाठभेद से वहाँ द्वितीयाङ्क में पुत्रप्राप्ति का लक्ष्य अनुल्लिखित रह जायेगा । कहने का तात्पर्य यही है कि प्रकृत स्थल में पुत्रप्राप्ति के सन्दर्भ को यदि आन्तरिक सम्भावना के रूप में स्वीकारते है तो बंगाली, मैथिली या कश्मीरी वाचना के पाठान्तर को ही मौलिक पाठ के रूप में मान्यता मिल सकती है ।।
( 3 ) देवनागरी वाचनावाले शाकुन्तल के अन्दर के वाक्यों को, आन्तरिक सम्भावना के मानदण्ड से यदि देखेंगे तो मालुम होगा है कि यहाँ बंगाली वाचना के मौलिक पाठों को परिवर्तित करके, कालान्तर में कुत्रचित् नवीन पाठान्तर दाखिल किये गये है । उदाहरण के रूप में – चतुर्थाङ्क में अन्तिम श्लोक में कण्व मुनि ने कहा है कि -अर्थो हि कन्या परकीय एव तामद्य संप्रेष्य परिगृहीतुः । जातो ममायं विशदः प्रकामं प्रत्यर्पितन्यास इवान्तरात्मा ।। 4-21 ( राघवभट्ट, पृ. 149 ) किन्तु बंगाली वाचना के पाठानुसार यहाँ पर – जातोSस्मि सद्यो विशदान्तरात्मा चिरस्य निक्षेप इवार्पयित्वा ।। ( पिशेल, पृ. 67 ) ऐसा पाठभेद है । यहाँ प्रश्न होगा कि महाकवि कालिदास ने कन्या के लिये न्यास शब्द लिखा होगा, या निक्षेप शब्द को रखा होगा ? तो जो देवनागरी वाचना में न्यास शब्द का प्रयोग हुआ है, उसी में एक दूसरे स्थान पर शकुन्तला के मुख से निक्षेप शब्द का प्रयोग हुआ है ऐसा भी प्रमाण मिलता है । तद्यथा – श्लोक 4-12 के नीचे, शकुन्तला अपनी प्रिय वनज्योत्स्ना को दोनों सखियों के हाथ में रखते हुए कहती हैः—( सख्यौ प्रति ) हला, एषा द्वयोर्युवयोर्ननु हस्ते निक्षेपः । यहाँ न्यास अर्थ में ही निक्षेप शब्द का प्रयोग किया गया है । कोई भी कवि एक निश्चित अर्थ व्यक्त करने के लिये पारिभाषिक शब्द का प्रयोग तो सारी कृति में एक समान ही करेगा । ऐसी स्थिति में, अन्तःसाक्ष्य से ही प्रमाणित होता है कि 4-21 में मूल में तो निक्षेप शब्द ही होगा । जिसको बदल के देवनागरी वाचना में न्यास शब्द को रखा गया होगा ।।
( 4 ) महाकवि कालिदास ने अपने काव्यों में ‘ अथवा ’ अव्यय का प्रयोग प्रश्नोत्तर एवं पक्षान्तर के अर्थ में किया है । शाकुन्तल में दुःषन्त पहले प्रस्तुत किये पक्ष को एकदम अग्राह्य जाहिर करके, तुरन्त अभीष्ट एवं सही पक्षान्तर की प्रस्तुति करने के लिये अथवा शब्द का जो विनियोग करता है वह ध्यानास्पद है । उदाहरण रूप में, षष्ठाङ्क में अङ्गुलीयक को उपालम्भ देता हुआ कहता है कि – कथं नु तं बन्धुरकोमलाङ्गुलिं करं विहायासि निमग्नमम्भसि ।। अथवा – अचेतनं नाम गुणं न लक्षयेन्मयैव कस्मादवधीरिता प्रिया ।।(6-13) ऐसे एक निश्चित अर्थवाले अथवा शब्द का बार बार प्रयोग करना वह कालिदास की शैली की एक विशिष्टता है । इस प्रकार की शैली को आन्तरिक सम्भावना रूप एक प्रमाण मानके हम देवनागरी वाचना के संक्षिप्त किये गये या बंगाली वाचना में प्रक्षिप्त लगते हुए श्लोकों की पाठालोचना कर सकते है । उदाहरण रूप से –
राजा – सम्यगियमाह – इदमुपहितसूक्ष्मग्रन्थिना स्कन्धदेशे, स्तनयुगपरिणाहाच्छादिना वल्कलेन ।
वपुरभिनवमस्याः पुष्यति स्वां न शोभां, कुसुममिव पिनद्धं पाण्डुपत्रोदरेण ।।
अथवा – काममप्रतिरूपमस्य वयसो वल्कलम् । न पुनरलंकारश्रियं न पुष्यति । कुतः –
सरसिजमनुविद्धं शैवलेनापि रम्यं, मलिनमपि हिमांशोर्लक्ष्म लक्ष्मीं तनोति ।
इयमधिकमनोज्ञा वल्कलेनापि तन्वी, किमिव हि मधुराणां मण्डनं नाकृतीनाम् ।। ( 1-17 )
दुःषन्त को यहाँ पर शकुन्तला ने जो वल्कल पहने थे उससे उसके अभिनव शरीर की शोभा नहीं बढती है ऐसा पहले लगता है । किन्तु उसका मतलब तो यह भी होगा कि शकुन्तला तब ही सुन्दर लगेगी कि वो जब अच्छे वस्त्र पहेनेगी । किन्तु शकुन्तला की सुन्दरता अच्छे वस्त्रों पर निर्भर नहीं है । अतः दुःषन्त ने तुरन्त इस प्रथम पक्ष को अमान्य करके, ‘अथवा’ शब्द का प्रयोग करते हुए दूसरा पक्ष प्रस्तुत किया । शकुन्तला स्वयं मधुराकृतिवाली है, इसी लिये उसके लिये वल्कल भी मण्डन बन गये है , और उससे भी वह सुन्दर ही लगती है । शाकुन्तल नाटक में ‘अथवा’ शब्द से इस तरह की प्रस्तुति बार बार की गई है, जिसको देखते हुए यह मानना होगा कि देवनागरी वाचना में जो एक ही ( सरसिजमनुविद्धं....) श्लोकवाले पाठ का संचरण हुआ है, वह संक्षिप्त किया गया पाठ है ।।
आन्तरिक सम्भावना शब्द से किस तरह के प्रमाण अभिप्रेत है उसको स्पष्ट करने के लिये ये उदाहरण दिये गये हैं । और इन उदाहरणों से यह भी स्पष्ट होता है कि यह आवश्यक नहीं है कि आन्तरिक सम्भावनावाला पाठ केवल देवनागरी में ही हो, या केवल बंगाली में ही हो । किन्तु प्रस्तुत सन्दर्भ में हम जिस पाठ्यांश की आलोचना करना चाहते है वह बंगाली वाचना का तृतीयाङ्क का विस्तृत शृङ्गारिक भाग है । सामान्य रूप से तो पाठ-समीक्षा का एक अधिनियम ऐसा है कि लघुपाठ की अपेक्षा से जो बृहत् एवं अलंकृत पाठ होता है वह परवर्ती काल का होता है । यद्यपि यह अधिनियम रामायण, महाभारत जैसे प्रोक्त-प्रकार के ग्रन्थों के लिये एकदम सही है । क्योंकि ये ग्रन्थ अनेककर्तृक प्रकार के होते है । किन्तु नाटक जैसी एककर्तृक एवं अभिनेय कृति के लिये यह अधिनियम सर्वथा युक्तियुक्त सिद्ध नहीं होगा । क्योंकि नाट्यप्रयोग के दौरान रंगभूमि की, या समय की अपेक्षा के अनुसार नाट्यकृति के पाठ्यांश में प्रक्षेप या / एवं संक्षेप बार बार किये जा सकते है । अतः शाकुन्तल के मौलिक पाठ को ढूँढने के लिये, उपलब्ध द्विविध ( बृहत्पाठ एवं लघुपाठ ) पाठ-परम्पराओं की आन्तरिक सम्भावना के मानदण्ड से परीक्षा करने का यहाँ उपक्रम किया गया है ।।
[ 4 ]
तृतीयाङ्क का उपर्युक्त विस्तृत वर्ण्य विषय, जो केवल बंगाली और मैथिली वाचना के अभिज्ञानशकुन्तल में ही उपलब्ध होता है उसकी मौलिकता के बारे में भूतकाल के अनेक पुरोगामी विद्वानों ने भी चर्चा की है । अतः उन गणमान्य विद्वानों के मत-मतान्तर को सब से पहले जानना आवश्यक है । तत्पश्चात् ही “ कृति-समीक्षा से पाठ-समीक्षा ” करने का आरम्भ किया जायेगा ।। जैसे कि – ( 1 ) कोलकाता के प्रॉफे. शरदरंजन राय (Ray, 1908, ( 1924, 1962 )) ने कहा है कि – This is slovenly in style. In substance it is silly and does not care much for decorum. The passage describes at great length how the मृणालवलय was picked up by Dushyanta and put back on the wrist of Shakuntala. This however contradicts the poet; for, later on we find the मृणालवलय still lying in the grove. Compare हस्ताद् भ्रष्टमिदं बिसाभरणमित्यासज्यमानेक्षणो निर्गन्तुं सहसा न वेतसगृहाद् ईशोSस्मि शून्यादपि – Infra – which is undoubtedly authentic being common to all the recensions.
यद्यपि उन्हों ने बंगाली वाचना के बृहत्पाठ्यांश को प्रक्षिप्त माना है, किन्तु यह प्रक्षेपवाला पाठ 12 शताब्दी में साहित्यदर्पणकार विश्वनाथ को मालूम था – ऐसा भी श्रीशरदरंजन राय ने ही बहुत पहेले ( 1908 ) कहा थाः--- The interpolation, clumsy as it is must have been made at a very early dates. The Sahitya-darpana quotes the sloka चारुणा स्फुरितेनायम् etc. from the above in some 14th century; the line हृदयस्य निगडमिव मे, as it occurs here, was by Vardhamana ascribed to Kalidasa. ( pp. 344 ).
( 2 ) प्रॉफे. एस. के. बेलवलकरजी (K., 1929) ने उपर्युक्त वलय प्रसंग के सन्दर्भ में श्रीशरदरंजन राय के मत का खण्डन करते हुए कहा है कि – शकुन्तला ने केवल एक एक वलय ही दोनों हाथ में पहेने थे ऐसा निश्चयात्मक रूप से कहेने का हमे कोई अधिकार नहीं है । क्योंकि यहाँ मृणालैकवलयम् शब्द का अर्थ तो “ एकमात्र मृणालतन्तु से ही बने हो ऐसे अनेक वलय भी उसने पहेने होंगे ” ऐसा हो सकता है । यदि राघवभट्ट (राघवभट्ट, 2006) जो कहते है कि – शिथिलितं शिथिलं संजातं मृणालस्यैकं मुख्यं वलयं यत्र ।... एकम् इत्यनेन वलयान्तरासहत्वं ध्वन्यते ।।( राघवभट्ट, पृ. 90 ) उसको मान लिया जाय तो भी यह तो स्वीकारना ही होगा कि शकुन्तला के दूसरे हाथ से वलय गिर सकता है ।
हम यह भी कह सकते है कि – श्री शरदरंजन राय के मतानुसार यदि मृणाल-वलय प्रसंग प्रक्षिप्त है तो, तृतीयाङ्क के अन्तिम श्लोक में जो बिसाभरण का निर्देश है उसका क्या समाधान दिया जायेगा- ऐसा प्रश्न खडा होता है । क्योंकि यह श्लोक तो शाकुन्तल नाटक की पाँचो वाचनाओं में एक समान रूप से ग्राह्य रहा है । इस श्लोक में निर्दिष्ट तीन चीजों में से 1. शकुन्तला की पुष्पमयी शय्या, तथा 2.शकुन्तला का मदन-लेख अङ्क में साक्षात् निर्दिष्ट हुआ है, परन्तु मृणाल-वलय प्रसंग यदि प्रक्षिप्त होगा तो इस श्लोक में तीसरी चीज के रूप में बिसाभरण ( मृणाल-वलय ) का जो उल्लेख हुआ है, वह निराधार हो जायेगा । परन्तु यदि मृणाल-वलय प्रसंग को मौलिक मानते है तो अन्तिम श्लोक में निर्दिष्ट तीनों चीजों की संगति बैठ जाती है ।।
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तृतीयाङ्क के बृहत्पाठ्यांश की मौलिकता का समर्थन करने के सन्दर्भ में प्रॉफे. एस. के. बेलवलकरजी का जो मुख्य प्रदान है (S.K.Belvalkar, 1929) वह दो अन्य तर्क के उपर अवलम्बित हैः—जैसे कि ( 1 ) सखियों की बिदा हो जाने के बाद और गौतमी के आगमन के बीच में जो अपेक्षित काल का अन्तराल होना आवश्यक है वह देवनागरी वाचना के लघुपाठ में नहीं दिखाई देता है । दुःषन्त की उक्ति हैः—सुन्दरि, अपरिनिर्वाणो दिवसः । ..... कथमातपे गमिष्यसि परिबाधापेलवैरङ्गैः ।। ( 3 – 19 ) और जब गौतमी का आगमन होता है तब वह बोलती है कि वत्से, परिणतो दिवसः । तद् एहि, उटजम् एव गच्छामः ।। अर्थात् अङ्क का आरम्भ मध्याह्न में होता है – ऐसी प्रकट सूचना है, किन्तु ( देवनागरी पाठ के अनुसार ) कुछ ही क्षणों में गौतमी आती है और नेपथ्य से कहा जाता है कि शाम ढल गई है, ....उपस्थिता रजनी । इस के प्रतिपक्ष में, मध्याह्न एवं सन्ध्या के बीच का अपेक्षित समयावधि व्यतीत होने के लिये बंगाली वाचना का जो बृहत्पाठ है उसमें वर्णित नायक-नायिका का लम्बा सहचार समुचित प्रतीत होता है । अर्थात् समय-सूचना के अनुरूप विस्तारवाला पाठ केवल बंगाली एवं मैथिली वाचनाओं में ही है । नाटक जैसी साहित्यिक कृति में समय-सूचना की संगति होना – वह भी एक आन्तरिक सम्भावना है, और महाकवि कालिदास की नाट्यकृति के मौलिक पाठ को ढूँढने में वह सबल प्रमाण सिद्ध होता है ।। प्रॉफे. एस. के. बेलवलकरजी ने कहा है कि तृतीयाङ्क की विस्तृत शृङ्गारिक घटना मध्याह्न से सायंकाल के बीच में व्यतीत होने का प्रमाण डॉ. रिचार्ड पिशेल की आवृत्ति में जो श्लोक 81है, जिस में सायंकाल की लम्बी होनेवाली छाया का उल्लेख है । अर्थात् – दिनावसानच्छायेव पुरोमूलं वनस्पतेः ( 3 – 29 ) वह श्लोक भी समर्थक प्रमाण है । तथा ( 2 ) पिशेल की आवृत्ति का मणिबन्धनगलितमिदं.....मृणालवलयं स्थितं पुरतः । (3-31) श्लोक वर्धमान ( 12वीँ शती ) ने गणरत्नमहोदधि में उद्धृत किया है, एवमेव अनेन लीलाभरणेन ते प्रिये..... जनः समाश्वासित एष दुःखभाग् अचेतनेनापि सता न तु त्वया ।।(3-32) वाला श्लोक हर्षवर्धन ने रत्नावली में उपयुक्त किया है इस लिये बंगाली वाचना का मृणालवलय प्रसंग भी, गद्य-संवादों के साथ, मौलिक मानना होगा । इस तरह प्रॉफे. एस. के. बेलवलकरजी ( 1929 ) ने बंगाली वाचना के बृहत्पाठ का समर्थन करने के लिये बाह्य प्रमाण के रूप में हर्षवर्धन की दो नाटिकाओं – रत्नावली और प्रियदर्शिका – के कुछ शब्दसमूह एवं दृश्य-सादृश्य की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट किया है । और उन्हों ने कहा है कि हर्षवर्धन ने महाकवि कालिदास का अनुकरण करते हुए इन दोनों नाटिकाओं में जो निरूपण किया है उससे यह सिद्ध होता है कि अभिज्ञानशकुन्तल का विस्तृत पाठ सप्तम शताब्दी के पूर्वार्ध से प्रचार में रहा है । ।
इस तरह प्रॉफे. एस. के. बेलवलकरजी ने शकुन्तल के बृहत्पाठ की मौलिकता एवं प्राचीनतमता सिद्ध करने के लिये जो उच्चतर समीक्षा प्रस्तुत की है, वह हमारे लिये उपकारक एवं दिशासूचक भी है । तथापि यह भी कहना होगा कि बंगाली बृहत्पाठ का समर्थन करने के बाद भी, कालान्तर में उन्हों ने बृहत्पाठ के मौलिक होने का पक्ष छोड दिया होगा ऐसा प्रतीत होता है । क्योंकि उनके अवसान के बाद, उन्होंने तैयार किये अभिज्ञान-शाकुन्तल का समीक्षित पाठ, जो साहित्य अकादेमी, नयी दिल्ली की ओर से डॉ. वी. राघवन ने प्रसिद्ध ( 1965 में ) किया है, उसमें तो कश्मीरी वाचना का पाठ दिया है । उसमें उन्होंने ब्युह्लर ने ढूँढी हुई शारदालिपि की पाण्डुलिपि को आधार बनाया है । जैसा कि डॉ. वी. राघवन ने बताया है – उनकी दृष्टि में कश्मीरी वाचना का पाठ मौलिक पाठ के रूप में उनको मान्य हो सकता है । ( कश्मीरी वाचनावाले शाकुन्तल का जो पाठ मिलता है वह नातिविस्तृत एवं नातिलघु ऐसा पाठ है । ) किन्तु डॉ. बेलवलकरजी ने अन्य कौन कौन सी पाण्डुलिपियों का विनियोग किया था उसका विवरण डॉ. वी. राघवन नहीं दे पाये है ।।
यहाँ पर यह भी कहना आवश्यक है कि (1) मृणालवलय – प्रसंग के अनुसन्धान में ही एक दूसरा रोचक शृङ्गारिक दृश्य आता है, जिसमें शकुन्तला के नेत्र में पुष्परज गिरने के कारण उसकी दृष्टि कलुषित होने का प्रसंग निरूपित होता है । दुःषन्त उस पुष्परज को अपने वदन-मारुत से हटा के शकुन्तला के नेत्र को स्वच्छ कर देता है । यह प्रसंग प्रक्षिप्त है या नहीं उसके लिये प्रॉफे. श्री एस. के. बेलवलकरजी ने अपने विचार प्रकट नहीं किये है । एवमेव, दूसरे भी कोई विद्वान् ने इस के बारे में सम्मति या विप्रतिपत्ति नहीं दिखाई है । तथा (2) इस शृङ्गारिक दृश्यावली प्रस्तुत करनेवाले विस्तृत अङ्क के 41 श्लोकों में से कौन कौन से श्लोक प्रक्षिप्त हो सकते है, उसकी भी स्वतन्त्र रूप से चर्चा किसी विद्वान् ने की हो ऐसा ज्ञात नहीं है ।।
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रिचार्ड पिशेल के बाद अभिज्ञानशकुन्तल (Kanjilal, 1980) के बृहत्पाठ का पुनःसम्पादन करनेवाले विद्वान् है डॉ. दिलीपकुमार काञ्जीलाल । उन्होंने इस नाटक की सम्भवतः अधिकाधिक पाण्डुलिपियाँ और सभी टीका-सामग्री देखी है । तथा पूरे विस्तार के साथ यह सिद्ध किया है कि कश्मीर के आठवीँ – नवमी शताब्दी के प्रायः सभी आलङ्कारिकों ने अभिज्ञानशकुन्तल के जिन श्लोकों का उद्धरण दिया है, उसमें बंगाली वाचना में संचरित शब्दों ( पाठान्तरों ) का ही समादर किया है । यद्यपि 1908 में श्री शरदरञ्जन राय (कोलकाता) ने 14वीँ शती के साहित्यदर्पण में उद्धृत हुए शकुन्तल के एक श्लोक की ओर ध्यान आकृष्ट किया था । लेकिन डॉ. दिलीपकुमार काञ्जीलाल ने तो कश्मीर के बहुत सारे आलङ्कारिकों का सन्दर्भ देते हुए यह दिखाया है कि अभिज्ञानशकुन्तल का बृहत्पाठ ही प्राचीन काल से प्रसिद्धि में रहा है । वे कहते है कि 10वीँ शती से पूर्व में यदि शकुन्तल का बृहत्पाठ प्रचार में है, तो 20वीँ शती के हम लोगों को यही पाठ अधिक श्रद्धेय है ऐसा स्वीकारना ही चाहिये ।
डॉ. एस. के. बेलवलकरजी ने जैसे तृतीयाङ्क की समय-सूचनाओं की ओर ध्यान आकृष्ट करते हुए बृहत्पाठ का समर्थन किया है, उसी तरह से डॉ. दिलीपकुमार काञ्जीलाल ने एकान्त मिलन के दौरान अपने प्रियतम का पति के रूप में स्वीकार करने से पहेले जो विस्तृत समय (सहचार) की अपेक्षा रहती है उसकी ओर ध्यान आकृष्ट किया है । यह भी एक सबल तर्क है, जो बंगाली वाचना के बृहत्पाठ का समर्थन करता है । डॉ. दिलीपकुमार काञ्जीलाल ने भी बंगाली पाण्डुलिपियों में संचरित हुए अभिज्ञानशकुन्तल के बृहत्पाठ को ही प्राचीनतम और मौलिक मानने का जो मताग्रह पुरस्कृत किया है, वह केवल एक व्यवहारिक तर्क उपर ही आधारित है । उसमें कृतिनिष्ठ कोई वचन का समर्थन नहीं दिया है । एवमेव, इसी बंगाली वाचना की विस्तृत शृङ्गारिक दृश्यावली में आये हुए कौन कौन से श्लोक स्पष्ट रूप से प्रक्षिप्त प्रतीत हो रहे है – उसकी भी प्रकट आलोचना उन्होंने नहीं की है ।।
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शाकुन्तल के तृतीयाङ्क के शृङ्गारिक दृश्यों की मौलिकता के सन्दर्भ में पुरोगामी पाठसमीक्षकों की स्थापनाओं को देखने के बाद, प्रस्तुत आलेख में कृति-समीक्षा से जो पाठ-समीक्षा प्रस्तुत करने का उद्देश्य रखा है उसकी चर्चा करने का अब अवसर हैः—इस तीसरे अङ्क में आये हुए 1. दुःषन्त ने शकुन्तला को पहनाये हुए मृणालवलय का प्रसंग, और 2. शकुन्तला की दृष्टि कलुषित होने पर दुःषन्त ने अपने वदन-मारुत से उसे निर्मल की थी यह प्रसंग कृतिनिष्ठ आन्तरिक सम्भावना-युक्त है या नहीं ? यही दो प्रसंग मुख्य रूप से विवेचनीय हैः— देवनागरी वाचना के लघुपाठ में शकुन्तला ने मृणालवलय हाथ में पहना है ऐसा स्पष्ट उल्लेख तीसरे अङ्क के आरम्भ में ही है, और कवि ने कहा भी है कि वह वलय ‘शिथिल’ हुआ है । अतः उसे नीचे गिर जाने की बात सर्वथा अपेक्षित थी । कालिदास जैसे महाकवि की नाट्यकृति में जो कुछ भी कहा जाता है वह सप्रयोजन ही होता है । अतः दुःषन्त ने उस शिथिलित मृणाल-वलय को पहनाया हो ऐसा प्रसंग कालिदास के लिये वर्ण्य विषय बनता ही है । तथा वह शिथिल था, उसी लिये फिर से वह गिरा हुआ दुःषन्त के हाथ में आ जाता है ऐसा अङ्क के अन्त में कहा गया है वह भी समुचित है । और, जो बात अङ्क के आदि और अन्त में उल्लिखित है वह अङ्क के मध्य भाग में भी हो सकती है – ऐसा मानना तर्क-विरुद्ध नहीं होगा । एवमेव, महाकवि ने केवल शकुन्तला के ही शिथिलित मृणालवलय का निर्देश किया है ऐसा नहीं है । उन्होंने तो विरही दुःषन्त के हाथों से बार बार नीचे उतर जाने वाले कनकवलय का भी निर्देश किया है । दूसरा, यहाँ नगर-संस्कृति के नायक के हाथ में कनकवलय का होना और आरण्यक-संस्कृति की नायिका के हाथों में मृणाल-वलय का होना वर्णित करना – उसमें हम एक संतुलित कलाकृति का लक्षण भी देख सकते है ।
इस मृणाल-वलय के प्रसंग का मूलगामी पाठ में होना एक अन्य आन्तरिक सम्भावना से भी समर्थित होता है उसकी ओर भी सत्यान्वेषी साहित्यरसिकों का ध्यान आकृष्ट करना आवश्यक हैः--- जिस लता-वलय में दुःषन्त-शकुन्तला का एकान्त मिलन होता है वहाँ आरम्भ में शकुन्तला लता-वलय से बहार चली जाती है । तब दुःषन्त शकुन्तला के मणिबन्धन से गलित हुए मृणालवलय को देखता है, जो उसे “ हृदयस्य निगडम् इव ” लगता है , उसको ऊठा लेता है और अपने गले लगाता है । तब उस वलय को वापस लेने के बहाने शकुन्तला लता -वलय में पुनःप्रविष्ट होती है । यहाँ प्रिया शकुन्तला को देखते ही दुःषन्त सहर्ष बोलता हैः- “अये, जीवितेश्वरी मे प्राप्ता ।” इसके बाद, दुःषन्त मृणाल-वलय को वापस लौटाने के लिये एक अभिसन्धि (शर्त) रखता है कि वह उसके हाथ में पहनाये, जो शकुन्तला मंजूर रखती है । दुःषन्त ने जब शकुन्तला के हाथ में उसे पहनाया तब शकुन्तला के मुख से “ त्वरताम् त्वरताम् आर्यपुत्रः । ” ऐसा सम्बोधन निकल जाता है । कङ्कण-स्वरूप मृणाल-वलय पहनाने के अवसर पर शकुन्तला के मन में दुःषन्त के लिये पतिभाव प्रकट हुआ हो यह अत्यन्त स्वाभाविक है । इस दृष्टि से, मृणाल-वलय प्रसंग में नायक-नायिका ने परस्पर जो “जीवितेश्वरी” और “आर्यपुत्रः” कहा है, वह क्षण अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है । क्योंकि आगे चल कर जब षष्ठाङ्क में ( दुःषन्त-नामधेयाङ्किता मुद्रिका मिल जाने के बाद ) कदाचित् अन्तःपुर की अन्य स्त्रियों के सामने विरही दुःषन्त के मुख से “ गोत्र-स्खलन ” हो जाता है ऐसा निरूपण आता है तो वह बिलकुल निराधार है ऐसा नहीं लगता है ।
किन्तु देवनागरी एवं दाक्षिणात्य वाचना के पाठ में तो यह मृणाल-वलय का प्रसंग नहीं है । अतः वहाँ षष्ठाङ्क में गोत्र-स्खलन का निर्देश आने पर उसका कोई पूर्व-निर्दिष्ट आधार नहीं मिलता है । कहने का तात्पर्य यही है कि बंगाली वाचना में मृणाल-वलय का प्रसंग है और उस प्रसंग के निमित्त से दोनों के चित्त में जो सहज दाम्पत्यभाव प्रकट हुआ था उससे ही षष्ठाङ्क में दुःषन्त से अनजान में होनेवाले गोत्र-स्खलन की स्वाभाविकता प्रतीतिकर बनती है । और इस तरह से षष्ठाङ्क में आनेवाला गोत्र-स्खलन का निर्देश हमारे लिये मृणाल-वलय का समर्थक प्रमाण बनता है ।।
[ 8 ]
अब तृतीयाङ्क में जो दूसरा विवादास्पद प्रसंग है उसकी पाठ-समीक्षा की जा रही हैः-- शकुन्तला की दृष्टि पुष्परज से कलुषित होने पर दुःषन्त उसे अपने वदन-मारुत से निर्मल कर देता है – उस प्रसंग की मौलिकता कृति-निष्ठ अन्तःसाक्ष्य से समर्थित होती है या नहीं ? इस विषय में सम्भवतः किसी ने नहीं सोचा है । यहाँ, शकुन्तला के नेत्र पुष्परज से कलुषित होने जैसे कोई प्रसंग की हम अपेक्षा रख सकते है या नहीं ? यही बात प्रथमतः विचारणीय हैः—प्रथमाङ्क में वृक्षसेचन के दौरान परिश्रान्त हुई शकुन्तला का दुःषन्त ने वर्णन किया है, इस श्लोक में कहा गया है कि, स्रस्तं कर्णशिरीषरोधि वदने घर्माम्भसां जालकं, बन्धे स्रंसिनि चैकहस्तयमिताः पर्याकुला मूर्धजाः ( शाकु. 1-26, राघवभट्ट, पृ. 47 ) अर्थात् शकुन्तला अपने कर्णों में शिरीष आदि पुष्पों को लगाती थी । और इसी लिये षष्ठाङ्क में शकुन्तला का चित्र अंकित करते हुए दुःषन्त ने फिर से कहा भी है कि – कृतं न कर्णार्पितबन्धनं सखे, शिरीषमागण्डविलम्बिकेसरम् । न वा शरच्चन्द्रमरीचिकोमलं मृणालसूत्रं रचितं स्तनान्तरे ।। ( शाकु. 6-18, राघवभट्ट, पृ. 213 ) इस तरह शकुन्तला अपने कानों में प्रसाधन के रूप में पुष्प लगाती थी, और इसी लिये कदाचित् उसके नेत्र में पुष्परेणु गिरने की सम्भावना (एवं अपेक्षा) तो थी ही । यह बात कृति-निष्ठ वाक्यों से ही समर्थित होती है । लेकिन यहाँ ऐसा प्रश्न ऊठाया जा सकता है कि क्या ऐसा कोई प्रसंग महाकवि ने ही अपने हाथों से लिखा होगा ? इस प्रश्न का उत्तर देने के लिये उच्च स्तरीय समीक्षा को मान्य हो ऐसा कोई प्रमाण देना आवश्यक है ।।
महाकवि कालिदास ने इस नाट्यकृति की दृश्यावली में सर्वत्र एक रूप के सामने दूसरा प्रतिरूप खडा करने की जो कलात्मक सर्जनविधा का साद्यन्त विनियोग किया है उसकी ओर सब का ध्यान आकृष्ट करने की जरूरत है । जैसा कि – 1. प्रथमाङ्क में मृगया-विहारी दुःषन्त का कण्वमुनि के आश्रम में प्रवेश होते ही – न खलु न खलु बाणः सन्निपात्योSयमस्मिन्... शब्द सुनाई पडते है, वैसे ही सप्तमाङ्क के आरम्भ में “ मा चापलम् कुरु । कथं गत एवात्मनः प्रकृतिम् ।” शब्द नेपथ्य से आते है । यहाँ प्रथमाङ्क में शिकारी दुःषन्त का जो एक रूप प्रस्तुत किया था, उसका ही दूसरा प्रतिरूप सिंहबाल के साथ खेल रहे सर्वदमन का खडा किया गया है । 2. प्रथमाङ्क में भ्रमर-बाधा प्रसंग वर्णित करने के बाद, कवि ने षष्ठाङ्क में वही दुःषन्त भ्रमरोपदेश करता है ऐसा भी निरूपण किया है । 3.द्वितीयाङ्क के अन्त में यज्ञक्रिया में राक्षसोपद्रव को संयमित करने के लिये दुःषन्त प्रस्थान करता है – ऐसा जो एक रूप (दृश्य) प्रस्तुत किया है, उसके सामने ( प्रतिदृश्य के रूप में ) षष्ठाङ्क में मातलि ने मेघप्रतिच्छन्द प्रासाद में विदूषक को पकड लिया है और दुःषन्त उसे छुडाने के लिये शरासन धारण करता है । 4. तृतीयाङ्क में महाकवि ने संभोग-शृङ्गार का निरूपण किया है, तो षष्ठाङ्क में उसके प्रतिरूप में विप्रलम्भ-शृङ्गार का वर्णन किया है । और इन दोनों के बीच में, चतुर्थाङ्क में पितृ-वात्सल्य का अनन्य एवं अभूतपूर्व आलेखन किया है । 5. तृतीयाङ्क में शकुन्तला अपनी अस्वस्थ शरीरदशा का रहस्योद्घाटन करते हुए कहती है कि – सखि, यतः प्रभृति मम दर्शनपथम् आगतः स तपोवन-रक्षिता राजर्षिः, तत आरभ्य तद्गतेनाभिलाषेणैतद् अवस्थास्मि संवृत्ता । यहाँ दुःषन्त सहर्ष बोलता है कि श्रुतं श्रोतव्यम् । इस दृश्य के सामने, प्रतिदृश्य के रूप में पञ्चमाङ्क में जब शकुन्तला दुःषन्त की अंगुठी नहीं दिखा सकती है तब वह एकदा घटित मृगपोतक की बात सुनाने का प्रस्ताव रखती है । तब यहाँ दुःषन्त शकुन्तला का उपहास करता हुआ कहता है कि – श्रोतव्यम् इदानीं संवृत्तम् । इस तरह महाकवि ने सम्पूर्ण कृति में एक रूप के सामने दूसरा प्रतिरूप ( एक दृश्य के सामने दूसरा प्रतिदृश्य ) खडा करने की स्पृहणीय निरूपण-शैली का मार्ग अपनाया है । इस निरूपण-शैली भी हमारे लिये कृति-निष्ठ अन्तःसाक्ष्य बन सकती है, और उसके आधार पर बंगाली ( और मैथिली ) वाचना के तृतीयाङ्क में शकुन्तला की दृष्टि कर्णोत्पल रेणु से कलुषित होने का जो प्रसंग वर्णित किया है उसका समर्थन किया जा सकता है । जैसे कि – तृतीयाङ्क में दुःषन्त ने अपने वदन-मारुत से शकुन्तला की दृष्टि निर्मल कर दी थी – उसी एक दृश्य के सामने, षष्ठाङ्क में कवि ने दूसरा प्रतिदृश्य भी खडा किया है । धीवर के पास से जब शकुन्तला के हाथ से गिरी मुद्रिका मिल जाती है और दुःषन्त को शकुन्तला का पुनःस्मरण हो जाता है तब शकुन्तला का चित्रांकन करते हुए वह एक श्लोक बोलता हैः—
कार्या सैकतलीनहंसमिथुना स्रोतोवहा मालिनी, पादास्तामभितो निषण्णहरिणा गौरीगुरोः पावनाः ।
शाखालम्बित-वल्कलस्य च तरोर्निर्मातुम् इच्छाम्यधः, शृङ्गे कृष्णमृगस्य वामनयनं कण्डूयमानां मृगीम् ।। 6-17
इसमें कहा गया है कि मुझे ( दुःषन्त को ) इस चित्र में बह रही मालिनी नदी की बालुका में बैठा एक हंस-मिथुन आकारित करना है । हिमालय की उपत्यका के पास में बैठे हरिणों के समूह को बनाना है । वृक्ष की डालियों पर कुछ वल्कल वस्त्र टाँगे हो एवं उस वृक्ष के अधो भाग में कृष्णमृग के शृङ्ग पर अपना वाम-नेत्र खूजलाती हुई एक हरिणी भी चित्रित करने की चाहत हो रही है । - यहाँ “कण्डूयमानां मृगीम्” का जो चित्र बनाने की इच्छा प्रकट की गई है वह निरतिशय व्यञ्जना पूर्ण है । षष्ठाङ्क में वर्णित इस प्रसंग का सम्बन्ध स्पष्ट रूप से तृतीयाङ्क में निरूपित शकुन्तला के नेत्र कलुषित होने के प्रसंग के साथ ही है । वहाँ पर दुःषन्त ने जब अपने वदन-मारुत से शकुन्तला की दृष्टि को निर्मल कर देने का प्रस्ताव रखा था, तब शकुन्तला ने कहा था कि मेरे मन में तुम्हारे लिये विश्वास नहीं है । ( क्योंकि सम्भव है कि दुःषन्त कुछ अधिक भी कर सकता है ) । दुःषन्त ने इसी तृतीयाङ्क के प्रसंग को ही स्मरण-पट में रख कर एक प्रतिदृश्य के रूप में, यह “ कण्डूयमानां मृगीम् ” का चित्र बनाने की इच्छा प्रकट की है । इस तरह एक दृश्य के सामने दूसरा प्रतिदृश्य खडा करने की जो निरूपण- शैली समग्र कृति में बार बार दिखाई देती है उसको तार्किक रूप से ही आन्तरिक सम्भावना के रूप में स्वीकारना चाहिये । अतः तृतीयाङ्क में शकुन्तला का नेत्र कलुषित होने पर दुःषन्त ने उसे अपने वदन-मारुत से स्वच्छ कर दिया था ऐसा एक प्रसंग जो बंगाली वाचना में निरूपित किया गया है, वह प्रक्षिप्त नहीं है, बल्कि सर्वथा मौलिक है – ऐसा मानने को हम बाध्य हो जाते है ।।
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यहाँ जो कृति-समीक्षा से पाठ-समीक्षा करने का उपक्रम रखा है उसमें महाकवि की प्रतीक-योजना का भी विश्लेषण करना अतीव उपकारक सिद्ध होगा । जैसा कि – कवि ने शकुन्तला के लिये मुख्य रूप से तीन प्रतीकों का विनियोग किया गया हैः—1. हरिणी, 2. कमल और 3. शकुन्त ( पक्षी ) । महाकवि कालिदास ने इन तीनों प्रतीकों का साद्यन्त उपयोग करते हुए ही नाट्यकार्य का विकास प्रदर्शित किया है । प्रथम उदाहरण के रूप में शकुन्तला के लिये हरिणी का प्रतीक जो समग्र कृति में प्रयुक्त किया गया है वह तो सुविदित है । लेकिन इस प्रतीक के द्वारा महाकवि ने नाट्यकार्य का कैसे विकास होता हुआ वर्णित किया है वह ज्ञातव्य है । शकुन्तला के लिये प्रयुक्त प्रतीक यदि हरिणी है, तो हरिणी को किसी शिकारी की अपेक्षा होगी ही । वह शिकारी यहाँ दुःषन्त है, और नाटक का आरम्भ ही मृगया-विहारी दुःषन्त के प्रवेश से होता है । किन्तु नाटक का आरम्भ जिस स्थिति से शूरु होता है, उसमें आगे चल कर बहुत कुछ परिवर्तन / विकास आ गया है ऐसा महाकवि दिखाना चाहते है । दुःषन्त शिकारी बनके तो कदापि शकुन्तला स्वरूपा हरिणी को प्राप्त नहीं कर सकता है – ऐसा महाकवि का तत्त्वदर्शन है । क्योंकि सौन्दर्य को प्राप्त करने के लिये स्वयं को भी सौन्दर्य ही बनना होता है । अतः हरिणी को ( हृदय से ) प्राप्त करने के लिये शिकारी को भी हरिण बनना पडेगा यह बात स्पष्ट है । षष्ठाङ्क के उपर्युक्त श्लोक में कहा गया है कि दुःषन्त अब विश्वसनीय हरिण बनके हरिणी के सामने खडा रहना चाहता है, जिससे उसके शृङ्ग पर वह हरिणी आश्वस्त हो के अपने वाम-नयन को खूजला सके ।
यहाँ दूसरा ध्वनि यह है कि ( पञ्चमाङ्क के ) शकुन्तला-प्रत्याख्यान प्रसंग में मुद्रिका नहीं मिलने पर शकुन्तला ने दुःषन्त को एकदा एकान्त में हुई बात का स्मरण दिलाने की कोशिश की । वह कहती है कि एकबार नवमालिका के मण्डप में दुःषन्त के हाथ का पानी दीर्घापाङ्ग नामक मृगपोतक ने नहीं पिया, तब वही जलपात्र शकुन्तला ने अपने हाथ में लिया और दीर्घापाङ्ग ने तत्क्षण उसमें से जल पी लिया । इसको देख कर दुःषन्त ने उपहास करते हुए कहा थाः—सभी समान गन्धवाले समान गन्धवाले में ही विश्वास करते है । आप दोनों जंगल के ही तो निवासी हैं । यहाँ पर दुःषन्त ने अपने आपको नागर कहा और शकुन्तला को आरण्यक कही । इस विषमता को जब तक नहीं मिटाई जाय तब तक दोनों के दाम्पत्य में सुसंगतता कैसे सिद्ध हो सकती है ? दुःषन्त जब तक हरिण बनके खडा न रहे, अर्थात् वह भी शकुन्तला का सगन्ध-सखा न बने तब तक दोनों का मिलन होना महाकवि को मंजूर नहीं है । अतः दुःषन्त जिस चित्र को आलिखित करने जा रहा है उसमें तरु की छाया में खडा हरिण ओर कोई नहीं है, वह स्वयं दुःषन्त ही है । हरिणी स्वरूपा शकुन्तला को वामाङ्गी के रूप में प्राप्त करने की योग्यता शिकारी में नहीं थी, वह तो हरिण बनने से ही सिद्ध होगी – यह बात संकल्पित चित्र का वर्णन करते हुए दुःषन्त ने गहेरी मार्मिकता से व्यक्त की है ।।
[ 10 ]
बंगाली वाचना के तृतीयाङ्क का विस्तृत शृङ्गारिक अंश प्रक्षिप्त नहीं है, किन्तु मौलिक है – यह दिखाने के लिये यहाँ जो चर्चा उपस्थापित की गई है उसके समर्थन में अब केवल दो बिन्दु जोडना अवशिष्ट हैः 1. मृणाल-वलय प्रसंग एवं पुष्परेणु से शकुन्तला का नेत्र कलुषित होने का प्रसंग परस्पर से स्वतन्त्र नहीं है । बल्कि मृणाल-वलय पहनाने के प्रसंग में ही अत्यन्त स्वाभाविक रूप से दूसरे प्रसंग का अवतार हो जाता है । और इस दूसरे प्रसंग के अनुसन्धान में ही गौतमी का प्रवेश भी सहज रूप से अन्वित हो जाता है । कहने का तात्पर्य यही है कि ये दोनों प्रसंग परस्पराश्लिष्ट है । तथा तार्किक रूप से पूर्वापर क्रम में सुग्रथित होने से, किसी ने इन दोनों को उत्तरवर्ती काल में चिपकाये है ऐसा नहीं लगता है । 2. दुःषन्त – शकुन्तला का सहचार जो बंगाली पाठ में निरूपित किया गया है उसको देख कर अनेक साहित्यरसिकों ने ऐसा अभिप्राय व्यक्त किया है कि यहाँ शकुन्तला प्रगल्भ दिखती है, एक नादान – भोलीभाली निसर्ग कन्या नहीं लगती है । अतः ये दोनों प्रसंग कालिदास की कलम का परिणाम नहीं हो सकता । किन्तु देवनागरी और दाक्षिणात्य वाचना के लघुपाठ में जो शकुन्तला वर्णित की गई है वह भी नितान्त रूप में व्यवहार जगत् से अनभिज्ञ भोली कन्या है ऐसा निरूपण नहीं है । वहाँ पर भी दोनों सखियाँ जब दुःषन्त को शकुन्तला का स्वीकार करके उनके जीवन को अवलम्बन देने की बिनती करती है, तब शकुन्तला ने तुरन्त कहा है कि – हला, किमन्तःपुरविरहपर्युत्सुकस्य राजर्षेरुपरोधेन । अर्थात् अली, अन्तःपुर की रानियों के विरही राजर्षि को यहाँ रोकने से क्या फायदा ? शकुन्तला, जो प्रायः मौन रहती है उसने मौके की क्षण पर तो दुःषन्त की सम्पूर्ण परीक्षा हो जाय ऐसा प्रश्न कर ही लिया था – यह क्षण स्मर्तव्य है । यहाँ पर शकुन्तला की अन्यथा अव्यक्त प्रगल्भता एक क्षण के लिये विद्युत् की लकीर जैसी चमक जाती है, तो उसको देखते हुए बंगाली वाचना में वर्णित नायक-नायिका का शृङ्गारपूर्ण सहचार अस्वाभाविक या अनपेक्षित नहीं लगता है ।।
[ 11 ]
कृति-निष्ठ आन्तरिक सम्भावना से तृतीयाङ्क के विस्तृत शृङ्गारिक पाठ्यांश की मौलिकता का समर्थन अवश्य हो सकता है । लेकिन बंगाली वाचना के इस बृहत्पाठ में जो कुछ भी उपलब्ध होता है वह सम्पूर्णतया ग्राह्य है – ऐसा भी नहीं कहा जा सकता है । क्योंकि डॉ.रिचार्ड पिशेल एवं डॉ. दिलीपकुमार काञ्जीलाल ने बंगाली वाचना का जो पाठ प्रकाशित किया है उसमें भी ऐसे अनेक श्लोक है जिसकी भी कृति-निष्ठ आन्तरिक सम्भावना के मानदण्ड से परीक्षा करने की आवश्यकता है । उदाहरण के रूप में एक श्लोक को देखते हैः— ( बंगाली वाचना में ) दुःषन्त तृतीयाङ्क के आरम्भ में कामदेव को सम्बोधन करता हुआ बोलता है –
कुतस्ते कुसुमायुधस्य सतस्तैक्ष्ण्यमेतत् । ( स्मृत्वा ) आं ज्ञातम् ।
अद्यापि नूनं हरकोपवह्निस्त्वयि ज्वलत्यौर्व इवाम्बुराशौ ।
त्वमन्यथा मन्मथ मद्विधानां भस्मावशेषः कथमेवमुष्णः ।। 3-3 ।।
इस श्लोक के बाद, तव कुसुमशरत्वं शीतरश्मित्वमिन्दोः .... श्लोक आता है ।
आगे चल कर मृणालवलय पहनाते हुए दुःषन्त ने शकुन्तला के हस्त को अपने हाथ में लिया है । वहाँ शकुन्तला के हस्त का स्पर्श होते ही दुःषन्त जो श्लोक बोलता है वह इस तरह का हैः—
राजा – ( शकुन्तलाया हस्तमादाय ) अहो स्पर्शः ।
हरकोपाग्निदग्धस्य दैवेनामृतवर्षिणा ।
प्ररोहः संभृतो भूयः किं स्वित्कामतरोरयम् ।। 3-34 ।।
यहाँ पर एक ही अङ्क में दो बार हरकोपवह्नि / हरकोपाग्नि शब्दों से भगवान् शङ्कर के तृतीय नेत्राग्नि से जले कामदेव का निर्देश है, जो स्पष्ट रूप से एक ही विचार की पुनरुक्ति ही है । कविकुलगुरु की वाणी में यह दोष रूप ही प्रतीत हो रहा है । अतः इन दोनो में से कोई एक श्लोक प्रक्षिप्त होगा – यह निश्चित है । यहाँ आन्तरिक सम्भावना के रूप में एक ही तर्क है कि महाकवि एक ही विचार की पुनरुक्ति नहीं करते है । सूक्ष्मेक्षिका से देखने पर दूसरी भी पुनरुक्ति यहाँ यह है कि अद्यापि नूनम् .... से ( 3-3 ) कामदेव को उपालम्भ देने के बाद, फिर से तव कुसुमशरत्वम् ... के द्वारा भी वही भाव प्रदर्शित किया गया है । यहाँ 3-3 के रूप में जो श्लोक है वह प्रक्षिप्त होगा । क्योंकि 3-34 के रूप में जो श्लोक है वह मृणाल-वलय के प्रसंग में पूर्ण रूप से समुचित लगता है ।।
देवनागरी एवं दाक्षिणात्य वाचना के पाठ में मृणाल-वलय प्रसंग को हटाया गया है, इस लिये 3-34 श्लोक भी निकाल दिया होगा । किन्तु हरकोपाग्नि .... शब्दों से कुमारसम्भव के प्रसंग का स्मरण होता है, इस लिये किसी अज्ञात व्यक्ति ने 3-3 ( अद्यापि नूनम्....) श्लोक को उत्तरवर्ती काल में लिख कर उसे देवनागरी वाचना में प्रक्षिप्त कर दिया होगा । जिसका अनुकरण करते हुए कोई लिपिकार ने उसे बंगाली वाचना के पाठ में भी संमिश्रित कर दिया है । अन्यथा हरकोपवह्नि.. .( 3-34) शब्दों से कामदेव-दहन का उल्लेख बंगाली पाठ में तो था ही । औचित्य की दृष्टि से सोचा जाय तो, मृणाल-वलय प्रसंग में आनेवाला 3-34 श्लोक ही मौलिक प्रतीत होता है ।।
उपसंहारः-- उच्च स्तरीय पाठ-समीक्षा में कृतिनिष्ठ आन्तर सम्भावना का मूल्य सब से ऊँचा होता है । इस दृष्टि से यहाँ जो चर्चा प्रस्तुत की है उससे अभिज्ञानशकुन्तल की बृहत्पाठपरम्परा में बंगाली वाचना का पाठ मौलिक सिद्ध होता है । यद्यपि यह भी कहना चाहिये कि प्रॉफे. रिचार्ड पिशेल या डॉ. दिलीपकुमार काञ्जीलाल ने बंगाली वाचना का जो समीक्षित पाठ प्रकाशित किया है, वही सर्वथा / यथावत् रूप में ग्राह्य है – ऐसा भी हम नहीं मान सकते है । क्योंकि बंगाली वाचना के पाठ में भी, अभी भी पर्याप्त प्रक्षेप दिखाई पडते है, जिसे हटाने की आवश्यकता है । तथापि यह भी सही है कि बंगाली वाचना के तृतीयाङ्क में जो विस्तृत शृङ्गारिक दृश्यावली मिलती है वह मौलिकता से सभर है । इसमें भी विशेष रूप से 1.मृणाल-वलय का प्रसंग एवं 2. शकुन्तला के कर्णोत्पल से कलुषित हुए नेत्र को दुःषन्त ने अपने वदन-मारुत से उसे स्वच्छ किया था यह प्रसंग कालिदास-प्रणीत हो सकता है – ऐसा बहुविध आन्तरिक सम्भावनाओं से सिद्ध होता है ।।
।। इति शम् ।।
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परिशिष्ट – 1
देवनागरी वाचना में तृतीयाङ्क का शृङ्गारिक दृश्य
प्रियंवदा – ( सदृष्टिक्षेपम् ) अणसूए, जह एसो इदो दिण्णदिट्ठी उस्सुओ मिअपोदओ मादरं अण्णेसदि । एहि, संजोएम णं । [ अनसूये, यथैष इतो दत्तदृष्टिरुत्सुको मृगपोतको मातरमन्विष्यति । एहि, संयोजयाव एनम् । ] ( इत्युभे प्रस्थिते । )
शकुन्तला – हला, असरण म्हि । अण्णदरा दो आअच्छदु । [ हला, अशरणास्मि । अऩ्यतरा युवयोरागच्छतु । ] उभे – पुहवीए जो सरणं सो तुह समीवे वट्टह । [ पृथिव्या यः शरणं स तव समीपे वर्तते । ] ( इति निष्क्रान्ते । )
शकुन्तला – कहं गदाओ एव्व ? [ कथं गते एव ? । ]
राजा – अलमावेगेन । नन्वयमाराधयिता जनस्तव समीपे वर्तते ।
किं शीतलैः क्लमविनोदिभिरार्द्रवातान् संचारयामि नलिनीदलतालवृन्तैः ।
अङ्के निधाय करभोरु, यथासुखं ते संवाहयामि चरणावुत पद्मताम्रौ ।। 3- 18 ।।
शकुन्तला – ण माणणीएसु अत्ताणं अवराहइस्सं । [ न माननीयेष्वात्मानमपराधयिष्ये । ] ( इत्युत्थाय गन्तुमिच्छति । )
राजा – सुन्दरि ! अनिर्वाणो दिवसः । इयं च ते शरीरावस्था ।
उत्सृज्य कुसुमशयनं नलिनीदलकल्पितस्तनावरणम् ।
कथमातपे गमिष्यसि परिबाधापेलवैरङ्गैः ।। 3-19 ।। ( इति बलादेनाम् निवर्तयति । )
शकुन्तला – पोरव ! रक्ख अविणअं । मअणसंतत्तावि ण हु अत्तणो पहवामि । [ पौरव, रक्षाविनयमम् । मदनसंतप्तापि न खल्वात्मनः प्रभवामि । ]
राजा – भीरु ! अलं गुरुजनभयेन । दृष्ट्वा ते विदितधर्मा तत्रभवान्न तत्र दोषं ग्रहीष्यति कुलपतिः । अपि च –
गान्धर्वेण विवाहेन बह्व्यो राजर्षिकन्यकाः ।
श्रूयन्ते परिणीतास्ताः पितृभिश्चाभिनन्दिताः ।। 3-20 ।।
शकुन्तला – मुंच दावं मं ।भूओ वि सहीजणं अणुमाणइस्सं । [ मुञ्च तावन्माम् । भूयोपि सखीजनमनुमानयिष्ये ।]
राजा – भवतु, मोक्ष्यामि ।
शकुन्तला – कदा । [ कदा ? ]
राजा – अपरिक्षतकोमलस्य यावत्कुसुमस्येव नवस्य षट्पदेन ।
अधरस्य पिपासता मया ते सदयं सुन्दरि, गृह्यते रसोSस्य ।। 3-21 ।।
( इति मुखमस्या समुन्नमयितुमिच्छति । शकुन्तला परिहरति नाट्येन । )
( नेपथ्ये )
चक्कवाकवहुए ! आमंतेहि सहअरं । उवट्ठिआ रअणी । [ चक्रवाकवधूः ! आमन्त्रयस्व सहचरम् । उपस्थिता रजनी । ]
शकुन्तला – ( ससंभ्रमम् ) पोरव ! असंसअं मम सरीरवुत्तंतोवलंभस्स अज्जा गोदमी इदो एव्व आअच्छदि । जाव विडवंतरिदो होहि । [ पौरव ! असंशयं मम शरीरवृत्तान्तोपलम्भायार्या गौतमात एवागच्छति । यावद् विटपान्तरितो भव । ]
राजा – तथा । ( इत्यात्मानमावृत्य तिष्ठति )
( ततः प्रविशति पात्रहस्ता गौतमी, सख्यौ च )
सख्यौ – इदो इदो अज्जा गोदमी । [ इत इत आर्या गौतमी । ]
गौतमी – ( शकुन्तलामुपेत्य ) जादे, अवि लहुसंदावाइं दे अंगाइं । । [ जाते, अपि लघुसंतापानि तेSङ्गानि । ]
शकुन्तला – अत्थि मे विसेसो । [ अस्ति मे विशेषः । ]
गौतमी – इमिणा दब्भोदएण णिराबाधं एव्व दे सरीरं भविस्सदि ।( शिरसि शकुन्तलामभ्युक्ष्य ।) वच्छे, परिणदो दिअहो । एहि, उडजं एव्व गच्छम्ह । [ अनेन दर्भोदकेन निराबाधमेव ते शरीरं भविष्यति । वत्से, परिणतो दिवसः । एहि, उटजमेव गच्छामः । ]
- अभिज्ञानशाकुन्तलम्, राघवभट्टस्य टीकया सहितम्, पृ.106-111
डॉ. रिचार्ड पिशेल संपादित बंगाली वाचना का पाठ ( पृ. 36 – 41 )
प्रियंवदा – हला । चवलो क्खु एसो । णं णिवारिदुं एआइणी ण पारेसि । ता अहं पि सहाअत्तणं करइस्सं । ( इत्युभे प्रस्थिते ) [ हला, चपलः खलु एषः । एनम् निवारयितुं एकाकिनी न पारयसि । तत् अहम् अपि सहायत्वम् करिष्यामि । ]
शकुन्तला – इदो अण्णदो ण वो गन्तुं अणुमण्णे जदो असहाइणि म्हि । [ इतः अन्यतः न वाम् गन्तुम् अनुमन्यसे । यतः असहायिनी अस्मि । ]
उभे – ( सस्मितम् ) तुमं दाव असहाइणी जाए पुढवीणाधो समीवे वट्टदि । [ त्वं तावत् असहायिनी ?, यस्याः पृथिवीनाथः समीपे वर्तते । ]
।। इति निष्क्रान्ते ।।
शकुन्तला – कथं गदाओ पिअसहीओ । [ कथं गते प्रियसख्यौ । ]
राजा – ( दिशोSवलोक्य ) सुन्दरि, अलमावेगेन । नन्वयमाराधयिता जनस्ते सखीभूमौ वर्तते । तदुच्यताम् ।
किं शीकरैः क्लमविमर्दिभिरार्द्रवातं संचालयामि नलिनीदलतालवृन्तम् ।
अङ्के निधाय चरणावुत पद्मताम्रौ, संवाहयामि करभोरु यथासुखं ते ।। 3-25 ।।
शकुन्तला – ण माणणीएसुं अत्ताणअं अवराहइस्सं । ( अवस्थासदृशमुत्थाय प्रस्थिता ) [ न माननीयेषु आत्मानम् अपराधयिष्यामि । ]
राजा – ( अवष्टभ्य ) सुन्दरि, अपरिनिर्वाणो दिवसः । इयं च ते शरीरावस्था ।
उत्सृज्य कुसुमशयनं नलिनीदलकल्पितस्तनावरणा ।
कथमातपे गमिष्यसि परिबाधाकोमलैरङ्गैः ।। 3-26 ।। ( इति वारयति )
शकुन्तला – मुञ्च मुञ्च । ण क्खु अत्तणो पहवामि । अध वा सहीमेत्तसरणा किं दाणिं एत्थ करइस्सं । [ मुञ्च मुञ्च । न खलु आत्मनः प्रभवामि । अथवा सखीमात्रशरणा । किमिदानीम् अत्र करिष्यामि । ]
राजा – धिक् । व्रीडितोSस्मि ।
शकुन्तला – ण क्खु अहं महाराअं भणामि, देव्वं उवालहामि । [ न खलु अहम् महाराजं भणामि, दैवम् उपालभे ]
राजा – अनुकूलकारि दैवं किमुपालभ्यते ।
शकुन्तला – कथं दाणिं ण उवालहिस्सं जं मं अत्तणो अणीसं परगुणेहि लोहावेदि । [ कथमिदानीं न उपालप्स्ये, यत् माम् आत्मनः अनीशाम् परगुणैर्लोभयति । ]
राजा – ( स्वगतम् )
अप्यौत्सुक्ये महति दयितप्रार्थनासु प्रतीपाः, काङ्क्षन्त्योSपि व्यतिकरसुखं कातराः स्वाङ्गदाने ।
आबाध्यन्ते न खलु मदनेनैव लब्धान्तरत्वाद् आबाधन्ते मनसिजमपि क्षिप्तकालाः कुमार्यः ।। 3-27 ।।
( शकुन्तला गच्छात्येव )
राजा – कथमात्मनः प्रियं न करिष्ये ।
शकुन्तला – पोरव, रक्ख विणअं । इदो तदो इसीओ संचरन्ति । [ पौरव, रक्ष विनयम् । इतस्ततः ऋषयः संचरन्ति । ]
राजा – सुन्दरि, अलं गुरुजनाद् भयेन । न ते विदितधर्मा तत्रभवान् कण्वः खेदमुपयास्यति ।
गान्धर्वेण विवाहेन बह्व्योSथ मुनिकन्यकाः ।
श्रूयन्ते परिणीतास्ताः पितृभिश्चानुमोदिताः ।। 3-28 ।।
( दिशोSलोक्य ) कथं प्रकाशं निर्गतोSस्मि । ( शकुन्तलां हित्वा पुनस्तैरेव पदैः प्रतिनिवर्तते । )
शकुन्तला – ( पदान्तरे प्रतिनिवृत्य साङ्गभङ्गम् ) पोरव, अनिच्छापूरओ वि संभासणमेत्तएण परिचिदो अअं जणो ण विसुमरिदव्वो । [ पौरव, अनिच्छापूरकः अपि संभाषणमात्रकेण परिचितः अयं जनः न विस्मर्तव्यः ]
राजा – सुन्दरि,
त्वं दूरमपि गच्छन्ती हृदयं न जहासि मे । दिनावसानच्छायेव पुरोमूलं वनस्पतेः ।। 3-29 ।।
शकुन्तला – ( स्तोकान्तरं गत्वा आत्मगतम् ) हद्धी हद्धी । इमं सुणिअ ण मे चलणा पुरोमुहा पसरन्ति । भोदु, इमेहि पज्जन्तकुरुवएहि ओवारिदसरीरा पेक्खिस्सं दाव से भावाणुबन्धं । ( तथा कृत्वा स्थिता ) [ हा धिक्, हा धिक् । इदं श्रुत्वा न मे चरणौ पुरोमुखौ प्रसरतः । भवतु, एभिः पर्यन्तकुरबकैः अपवारितशरीरा प्रेक्षिष्ये । तावत् अस्य भावानुबन्धम् । ]
राजा – कथमेवं प्रिये अनुरागैकरसं मामुत्सृज्य निरपेक्षैव गतासि ।
अनिर्दयोपभोग्यस्य रूपस्य मृदुनः कथम् । कठिनं खलु ते चेतः शिरीषस्येव बन्धनम् ।। 3-30 ।।
शकुन्तला – एदं सुणिअणत्थि मे विहवो गच्छिदुं । [ एतत् श्रुत्वा नास्ति मे विभवः गन्तुम् । ]
राजा – संप्रति प्रियाशून्ये किमस्मिन् करोमि । ( अग्रतोSवलोक्य ) हन्त, व्याहतं गमनम् ।
मणिबन्धनगलितमिदं संक्रान्तोशीरपरिमलं तस्याः ।
हृदयस्य निगडमिव मे मृणालवलयं स्थितं पुरतः ।। 3-31 ।। ( सबहुमानमादत्ते )
शकुन्तला – ( हस्तं विलोक्य ) अम्मो, दोव्वल्लसिढिलदाए परिब्भट्टं पि मुणालवलअं मए ण परिण्णादं । [ अम्मो दौर्बल्यशिथिलतया परिभ्रष्टम् अपि मृणालवलयं मया न परिज्ञातम् । ]
राजा – ( मृणालमुरसि निक्षिप्य ) अहो स्पर्शः ।
अनेन लीलाभरणेन ते प्रिये विहाय कान्तं भुजमत्र तिष्ठता ।
जनः समाश्वासित एष दुःखभाग् अचेतनेनापि सता न तु त्वया ।। 3-32 ।।
शकुन्तला – अदो वं असमत्थ म्हि विलम्बिदुं । भोदु, एदेणज्जेव अवदेसेण अत्ताणअं दंसइस्सं । ( इत्युपसर्पति )
[ अतः परम् असमर्थाSस्मि विलम्बितुम् । भवतु एतेन एव अपदेशेन आत्मानं दर्शयिष्यामि । ]
राजा – ( दृष्ट्वा सहर्षम् ) अये जीवितेश्वरी मे प्राप्ता । परिदेवितानन्तरं प्रसादेनोपकर्तव्योSस्मि खलु देवस्य ।
पिपासाक्षामकण्ठेन याचितं चाम्बु पक्षिणा ।
नवमेघोज्झिता चास्य धारा निपतिता ।। 3-33 ।।
शकुन्तला – ( राज्ञः प्रमुखे स्थित्वा ) अज्ज अद्धपथे सुमरिअ एदस्स हत्थब्भंसिणो मुणालवलअस्स किदे पडिणिउत्त म्हि । आचक्खिदं विअ मे हिअएण तए गहिदं ति । ता णिक्खिव एदं मा मं अत्ताणअं च मुणिअणेसुं पआसइस्ससि । [ आर्य अर्धपथे स्मृत्वा एतस्य हस्तभ्रंशिनः मृणालवलयस्य कृते प्रतिनिवृत्ता अस्मि । आख्यातमिव मे हृदयेन त्वया गृहीतमिति । तत् निक्षिप एतत् । मा माम् आत्मानं च मुनिजनेषु प्रकाशयिष्यसि । ]
राजा – एकेनाभिसन्धिना प्रत्यर्पयामि ।
शकुन्तला – केण उण । [ केन पुनः । ]
राजा – यदिदमहमेव यथास्थानं निवेशयामि ।
शकुन्तला – ( आत्मगतम् ) का गदी ।( इत्युपसर्पति ) [ का गतिः । ]
राजा – इतः शिलापट्टकमेव संश्रयावः । ( इत्युभौ परिक्रम्योपविष्टौ )
राजा – ( शकुन्तलाया हस्तमादाय ) अहो स्पर्शः ।
हरकोपाग्निदग्धस्य दैवेनामृतवर्षिणा । प्ररोहः संभृतो भूयः किं स्वित्कामतरोरयम् ।। 3-34 ।।
शकुन्तला – ( स्पर्शं रूपयित्वा ) तुवरदु तुवरदु अज्जउत्तो । [ त्वरताम् त्वरताम् आर्यपुत्रः । ]
राजा – ( सहर्षमात्मगतम् ) इदानीमस्मि विश्वस्तः । भर्तुराभाषणपदमेतत् । ( प्रकाशम् ) सुन्दरि, नातिश्लिष्टः सन्धिरस्य मृणालवलयस्य । यदि तेSभिप्रेतमन्यथा घटयिष्यामि ।
शकुन्तला – जधा दे रोअदि । [ यथा ते रोचते । ]
राजा – ( सव्याजं विलम्ब्य प्रतिमुच्य ) सुन्दरि, दृश्यताम् ।
अयं स ते श्यामलतामनोहरं विशेषशोभार्थमिवोज्झिताम्बरः ।
मृणालरूपेण नवो निशाकरः करं समेत्योभयकोटिमाश्रितः ।। 3-35 ।।
शकुन्तला – ण दाव ण पेक्खामि पवणुक्कम्पिणा कण्णुप्पलरेणुणा कलुसीकिदा मे दिट्ठी । [ न तावत् एनं प्रेक्षे, पवनोत्कम्पिना कर्णोत्पलरेणुना कलुषीकृता मे दृष्टिः । ]
राजा – ( सस्मितम् ) यदि मन्यसे अहमेनां वदनमारुतेन विशदां करिष्ये ।
शकुन्तला – तदो अणुकम्पिदा भवे । किं उण ण दे वीससामि । [ ततः अनुकम्पिता भवेयम् । किं पुनः न ते विश्वसिमि । ]
राजा – मा मैवम् । नवो हि परिजनः सेव्यानामादेशात् परं न वर्तते ।
शकुन्तला – अअं जेव अच्चुवआरो अविस्सासजणओ । [ अयमेवात्युपचारोSविश्वासजनकः । ]
राजा – ( स्वगतम् ) नाहमेतं रमणीयं सेवावकाशमात्मनः शिथिलयिष्ये । ( इति मुखमुन्नमयितुं प्रवृत्तः । शकुन्तला प्रतिषेधं रूपयन्ती विरमति । )
राजा – अयि मदिरेक्षणे, अलमस्मदविनयाशङ्कया । ( शकुन्तला किञ्चिद् दृष्वावनतमुखी तिष्ठति )
राजा – ( अङ्गुलीभ्यां मुखमुन्नमय्यात्मगतम् )
चारुणा स्फुरितेनायमपरिक्षतकोमलः । पिपासतो ममानुज्ञां ददातीव प्रियाधरः ।। 3-36 ।।
शकुन्तला – पडिण्णादमन्थरो विअ अज्जुउत्तो । [ प्रतिज्ञामन्थरः इवार्यपुत्रः । ]
राजा – सुन्दरि, कर्णोत्पलसंनिकर्षादीक्षणसादृश्यमूढोSस्मि । ( इति मुखमारुतेन चक्षुः सेवते )
शकुन्तला – भोदु, पइदित्थदंसण म्हि संवृत्ता । लज्जामि उण अणुवआरिणी पिअआरिणो अज्जउत्तस्स । [ भवतु, प्रकृतिस्थदर्शनाSस्मि संवृत्ता । ]
राजा – सुन्दरि, किमन्यत् ।
इदमुपकृतिपक्षे सुरभि मुखं ते मया यदाघ्रातम् । ननु कमलस्य मधुकरः संतुष्यति गन्धमात्रेण ।। 37 ।।
शकुन्तला – असंतोसे उण किं करेदि । [ असंतोषे पुनः किं करोति । ]
राजा – इदमिदम् । ( इति व्यवसितो वक्रं ढौकते । )
।। नेपथ्ये ।।
चक्रवाअवहु । आमन्तेहि सहअरं । उवत्थिदा रअणी । [ चक्रवाकवधु, आमन्त्रय सहचरम् । उपस्थिता रजनी । ]
शकुन्तला – ( कर्णं दत्वा ससंभ्रमम् ) अज्जउत्त एसा खु मम वुत्तन्तोवलम्भणणिमित्तं अज्जा गोदमी आअदा । ता विडवन्तरिदो होहि । [ आर्यपुत्र, एषा खलु मम वृत्तान्तोपलम्भननिमित्तम् आर्या गौतमी आगता । तत् विटपान्तरितः भव । ]
राजा – तथा । ( इत्येकान्ते स्थितः )
गौतमी – ( प्रविश्य पात्रहस्ता गौतमी ) जाद, इदं सन्तिउदअं । ( दृष्ट्वा समुत्थाय ) असुत्था इध देवदासहाइणी चिट्ठसि । [ जात, इदम् शान्त्युदकम् । अस्वस्था इह देवतासहायिनी तिष्ठसि । ]
शकुन्तला – इदाणिं जेव पिअंवदाअणुसूआओ मालिणिं ओदिण्णाओ । [ इदानीमेव प्रियंवदानुसूये मालिनीम् अवतीर्णे । ]
गौतमी – ( शान्त्युदकेन शकुन्तलाम् अभ्युक्ष्य ) जाद, णिराबाधा मे चिरं जीव । अवि लहुसंतावाइं दे अङ्गाइं ।
[ जात, निराबाधा मे चिरम् जीव । अपि लधुसंतापानि तेSङ्गानि । ] ( इति स्पृशति )
शकुन्तला – अज्जे, अत्थि विसेसो । [ आर्ये, अस्ति विशेषः । ]
गौतमी – परिणदो दिअसो । ता एहि । उडअं जेव गच्छम्ह ।। [ परिणतः दिवसः । तत् एहि उटजमेव गच्छावः ]
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शनिवार, 23 अक्टूबर 2010
शनिवार, 17 जुलाई 2010
अष्टाध्याय्याम् वृत्तिविचारः ।।
।। अष्टाध्याय्यां वृत्तिविचारः ।।
वसन्तकुमारो भट्टः
निदेशकः, भाषासाहित्यभवनम्, गुजरात विश्वविद्यालयः, अहमदावाद – 380 009
भूमिका – भाषाव्यवहारः सदैव वक्तृजन-श्रोतृजनयोर्मध्ये प्रवर्तते । अतः कस्या अपि भाषाया व्याकरणं द्विधा विरचयितुं शक्यते । एकं व्याकरणं श्रोतृणां कृते, अपरञ्च वक्तृणां कृते । अत्र 1. श्रोतृणां कृते यद् व्याकरणं स्यात् तस्मिन् वाक्याद् आरभ्या-Sर्थप्राप्तिपर्यन्तानि सोपानानि प्रदर्श्यन्ते । अत्र वाक्यस्य विघटनं निरूप्यते । व्याक्रियन्ते पृथक्क्रियन्ते शब्दा अनेनेति व्युत्पत्तिं चरितार्थां कुर्वाणा काSपि पद्धतिरनुसर्तव्येति कथनस्याशयः । 2. एवञ्च वक्तृणां कृते यद् व्याकरणं भवेत् तस्मिन् विवक्षिताद् अर्थादारभ्य वाक्यसिद्धिपर्यन्तं निरूपणं कर्तव्यम् । इमां द्वितीयां पद्धतिम् अनुसृत्य महर्षिणा पाणिनिनाSष्टाध्यायी विरचितेति दृश्यते । यतो हि – वक्तृणां मनस्सु ये विचाराः प्रादुर्भवन्ति तेषां वैखर्या वाण्या ध्वनिश्रेण्यां प्रकटीकरणम् अनिवार्यम् । अतः कमपि विचारं पूर्वं मनसि निश्चित्य, तस्यार्थस्य रूपान्तरणं कृत्वा वाक्यनिर्मितिः कथं कर्तव्येति प्रथममेव केनापि वक्त्रा ज्ञातव्यम् एव । अतः महर्षिः पाणिनिर् वक्तृणां कृते यद् व्याकरणं विरचयति, तस्मिन् “साधकतमम्, ध्रुवमपाये, कर्मणा यमभिप्रैति ( इति कारकपादे ) , वर्तमाने, परोक्षे, ( इति लकार-निरूपणे ), सत्तायाम्, व्यक्तायां वाचि ” ( इति धातुपाठे ) इत्यादिशब्दैः प्रथमम् अर्थनिर्धारणं करोति । तदनन्तरं तेभ्यः सर्वेभ्य अर्थेभ्यः करणम्, सम्प्रदानम्, अपादानम्, इत्यादीनि कारकसंज्ञादीनि प्रददाति । ततो महर्षिणा तेषां कारकादीनां प्रकटीकरणाय विभिन्नाः प्रत्यया विधीयन्ते । ततः स्थान्यादेशभावस्य प्रयुक्त्या तेषां प्रत्ययानां ध्वनिश्रेण्याम् आवश्यकं परिवर्तनं निर्दिश्यते । अन्तिमे च सोपाने सन्धिकार्यं कृत्वा, प्रयोगार्हस्य वाक्यस्य सिद्धिः सम्पाद्यते ।। अष्टाध्याय्याम् एतादृशं निरूपणं दृष्ट्वाSSधुनिकैर् वैयाकरणैर् अष्टाध्याय्याम् शब्दनिष्पादकस्य तन्त्रस्य ‘दर्शनं’ क्रियते । अर्थात् महर्षिणा पाणिनिना शब्दनिष्पादनात्मकं तन्त्रं ( Generative grammar ) व्याकरणं निर्मितमित्युच्यते । एतादृशस्य व्याकरणस्य कृते व्याक्रियन्ते व्युत्पाद्यन्ते शब्दा अनेनेति व्याकरणम् इति व्युत्पत्तिः सुसंगता भवति ।।
परन्तु पाणिनेर् अष्टाध्याय्याम् निरूपितस्य व्याकरणस्य यत् स्वरूपम् अद्यावधि विद्वद्भिर् आकलितं तत्र वृत्ति-विचारस्य किमपि स्थानं नास्ति । प्रत्युत तस्य ( वृत्तिविचारस्य ) सर्वथोपेक्षा तैर्विहितेति प्रतीयते । अतः प्रस्तुते शोधपत्रे वृत्ति-विचारम् अधिकृत्य पाणिनेर् अष्टाध्याय्याः पूर्णं स्वरूपं कीदृशं प्रतिभातीति विवेचनाय प्रयतिष्यते ।।
1 – 1 “ समर्थः पदविधिः ” ( 2- 1 – 1 ) इति परिभाषा-सूत्रस्य कोSर्थ इति विचार्यमाणे भट्टोजिदीक्षितेन सिद्धान्तकौमुद्यां लिखितं यद् - पदसम्बन्धी यो विधिः, स समर्थाश्रितो बोध्यः । अस्य सूत्रस्य च व्याख्यानावसरे , पतञ्जलिना स्पष्टीक्रियते यद् समर्थ इति पदेन 1. व्यपेक्षाभावरूपं सामर्थ्यं, 2. एकार्थीभावरूपञ्च सामर्थ्यम् अत्र विवक्षितं वर्तते । प्रथमेन च सामर्थ्येन वाक्यस्य सिद्धिर्भवति., द्वितीयेन चैकार्थीभावरूपेण सामर्थ्येन समासादयः पञ्चवृत्तयः भवन्ति ।
पदविधिरिति शब्दं, पतञ्जलिरित्थं विवृणोति – “ किं पुनर् विधीयते । 1. समासो, 2.विभक्तिविधानं 3. पराङ्वद्भावश्च ” ।। ( 2-1-1 भाष्यम् पृ. 359 ) अत्र नागेशो भट्टः स्पष्टीकरोति यद् समासपदं वृत्तिमात्रोपलक्षणम् । ( उद्द्योतः, पृ. 313 ) किन्तु विभक्तिविधानमिति शब्देन वाक्यसिद्धिरपि व्यपेक्षाभावरूपं सामर्थ्यम् अपेक्षत इत्यपि पतञ्जलिना निर्दिष्टमेव । अत एव नागेशेनैव तत्रेत्थम् अपि स्पष्टीकृतं यत् – केचित्तु पदोद्देश्यकः पदत्वसम्पादको वा सर्वो Sपि पदसम्बन्धित्वात् पदविधिरेवेति वदन्ति । ( तत्रैव उद्द्योतः, पृ. 313 )
अनया चर्चया सुष्ठु ज्ञायते यद् अस्याम् अष्टाध्याय्यां द्वौ विधी वर्तेते । एको विधिः – पदत्वसम्पादक आस्ते., द्वितीयश्च विधिः – पदोद्देश्यकोSपि नितराम् आस्ते । अत अष्टाध्याय्याः सूक्ष्ममान्तरिकं स्वरूपं निर्णेतुम् द्वावपि विधी सूक्ष्मेक्षिकया निरीक्षणीयौ ।
1 – 2 पाणिनेर्व्याकरणस्यान्तरिकं स्वरूपं द्रष्टुम् प्रथममेकः प्रश्नो विचारणीयो भवति । तद्यथा – पाणिनिः किं पदसंस्कारपक्षस्य पुरस्कर्ता, उत वा वाक्यसंस्कारपक्षस्य पुरस्कर्ता । तर्हि विद्वद्भिर्निणीतं यद् पाणिनिः शब्दसाधनिकावस्थायां ( प्रक्रियादशायाम् ) केवलं वाक्यसंस्कारपक्षम् एव स्वीकृतवान् । यतो हि – महर्षिणः पाणिनिः “ लः कर्मणि च भावे चाकर्मकेभ्यः,” तथा “ अनभिहिते ” इति च सूत्राभ्यां वाक्यस्यैव सिद्धिरादितः मनसि निधाय, सूत्राणि विरचयतीति प्रतिभाति ।।
परन्तु वाक्यसंस्कारपक्षस्य पुरस्कर्ता पाणिनिर् वाक्यान्तर्गतानां सुबन्त-तिङन्तपदानां साधनिकां यदा प्रदर्शयति, तदा वृत्तिजन्यानां पदानां स्थानं कुत्र विराजते, तदपि गवेषणीयम् । एतादृशे प्रश्ने समुद्भाविते – समुद्भूते सति, कार्यशब्दवादिनां यन्मतं तत्प्रथमं निपुणं निभालनीयम् । अष्टाध्याय्याः स्वरूपनिर्धारणाय तेषां कार्यशब्दवादिनाम् अभिप्रायः परमोपकारकोSस्ति ।
2 – 1 ये कार्यशब्दवादिनः सन्ति त इत्थं मन्वते यद् वृत्ति-वाक्ययोरर्थः सर्वथाSभिन्न एव । त एवमपि वदन्ति यद् वाक्यं नष्टीकृत्यैव समासादिवृत्तयः संसाध्यन्ते । ( अत एव तत्त्वबोधिन्यां “ समसनं समासः, भावे घञ् । अनेकस्य पदस्य एकपदीभवनम् इत्यर्थ इत्येके ।“ इति लिखितम् । ) प्रथमतया, वाक्यसंस्कारपक्षम् अनुसृत्य यद् वाक्यं निर्मितं तस्य वाक्यस्य यानि पदानि सन्ति, तानि पदानि प्रकृति-प्रत्यययोः पृथक्कृत्य, तत्र “ सुपो धातुप्रातिपदिकयोः ” (2 – 4 -71 ) इत्यनेन विभक्ति-प्रत्ययानाञ्च लोपं कृत्वा, कृत्-तद्धितान्तसमासादीनां प्रातिपदिकत्वं जोघुष्यते । अत्रैकपदीभवनान्तरं यो Sर्थः पूर्वसिद्धस्य वाक्यस्यासीत्, स एवार्थ वृत्तितः संप्राप्यते । अत्र “ समः अर्थः यस्य स समर्थ इति ” व्युत्पत्तिरपीदम् एव कथयति यद् वृत्ति-वाक्ययोरर्थः सर्वथा Sभिन्न एव ।। एवञ्च परार्थाभिधानं वृत्तिरिति भाष्योक्तेरपीदमेवाशयः ।।
2 – 2 कार्यशब्दवादिनः स्वकीयं मतं समर्थयितुं “ विभाषा ” ( 2 – 1 - 11 ) इति द्वितीयाध्यायस्य प्रथमपादस्यैकादशीयं सूत्रं प्रमाणत्वेनोपस्थापयन्ति । ते “ विभाषा ”( 2 -1-11 ) इत्यधिकारसूत्रं महाविभाषात्वेन ख्यापयन्ति । अनेन सूत्रेण “ राज्ञः पुरुषः ” इति वाक्यस्य, “ राजपुरुष ” इति वृत्तिजन्यस्य च पदस्य साधुत्वम् समानार्थत्वञ्च समुद्घोष्यते । वाग्व्यवहारकाले “ राज्ञः पुरुष ” इति वाक्यमपि साधु, “राजपुरुष” इति सामासिकं पदमपि साधु । तेनोभावपि प्रयोगौ सर्वथा स्वीकार्याविति महर्षिणा सूत्रकारेण सुष्ठु ज्ञापितम् । वृत्ति-वाक्याभ्याम् अर्थप्रतीतिरपि समानैव जायते । येन च, राज्ञः पुरुषम् आनय इत्युच्यमाने यस्यानयनं भवति, तस्यैवानयनं राजपुरुषम् आनय इत्युच्यमाने भवति । अतः नास्ति को S पि भेदो वृत्ति-वाक्ययोर् मध्ये ।।
2 – 3 कार्यशब्दवादिभिः द्वितीयमपि प्रमाणम् उपस्थाप्यते यद् महर्षिणा पाणिनिना “ नित्यं क्रीडाजीविकयोः ”(2-2-17) इत्येतस्मिन् सूत्रे नित्यमिति यत् पदं प्रयुक्तम्, तदतीव ध्यानार्हम् । तद्यथा - “ उद्दालक-पुष्पभञ्जिका ” इति शब्देन अमुकक्रीडेत्यर्थो Sवबोध्यते । परन्तु यदा “उद्दालकस्य पुष्पाणि भज्यन्ते यस्यां क्रीडायाम् ” इत्येतादृशं विग्रहवाक्यं प्रयुज्यते, तदा अमुक(विशिष्टा)क्रीडाया बोधो न जायते । अतः पाणिनिना स्वयमेवात्र “नित्यमिति” शब्दग्रहणेन, महाविभाषया विकल्पेन प्राप्तस्य वाक्यस्य निवृत्तिः क्रियते । तेन ज्ञायते यद् यत्र नास्ति नित्यमिति पदम्, तत्र सर्वत्रापि महाविभाषया वृत्ति-वाक्ययोर् विकल्पः समानार्थबोधकत्वेनैव प्रचलति ।।
2 – 4 तद्धितवृत्तिविषये Sपि वृत्ति-वाक्ययोः समानार्थकत्वे सत्यपि , प्रौढिवादेनैकाम् अभिनवां दृष्टिम् अनुसृत्य किञ्चिदुच्यते । तद्यथा – समर्थानां प्रथमाद् वा ( 4 -1 -82 ) इत्यनेन सूत्रेण “ औपगव ” इत्यादीनां शब्दानां सिद्धिर्भवति । सूत्रकारेणात्र यद् “ वा ” इति पदम् अभिप्रवेशितम्, तेन “ औपगव ” इति शब्देन सह, “ उपगोः अपत्यम् पुमान् ” इति वाक्यस्यापि समानार्थकता प्रयोगार्हत्वञ्च सूत्रकारेण स्वीकृतम् । किन्तु पोल किपार्स्की महोदयेन वा – विभाषा – अन्यतरस्याम् इति शब्दानाम् विकल्पवाचकत्वे सत्यपि, तेभ्यः सर्वेभ्यः शब्देभ्यः काS पि स्वल्पा विशिष्टा S र्थच्छाया सम्प्राप्यत इति समुद्घाटितम् । किपार्स्की महोदयस्य मतानुसारेण पाणिनेर्मनसि ‘वा’ इति शब्दस्य Or rather, usually, preferably [ Panini – As a Variationist; by Paul Kiparsky, University of Poona, Pune,1980, p. 1 ] इति विशिष्टार्थोSभिमत आसीत् । तेन “ उपगोः अपत्यं पुमान् ” इति वाक्यापेक्षया “ औपगव “ इति तद्धितान्तस्य रूपस्याधिकतरं प्रयोगार्हत्वम् अस्ति । इत्थं “ समर्थानां प्रथमाद् वा ” इति सूत्रस्थेन ‘वा’ इति शब्देन तद्धितवृतेरधिकतरा स्पृहणीयता वाग्व्यवहारे भवेद् इति संसूच्यते ।।
3 – 0 एकशेषः किं वृत्तिरस्ति न वा ?
3 – 1 पञ्चविधासु वृत्तिषु यैकशेषरूपा वृत्तिः परिगणिता, सा कथं वृत्तित्वेन परिगण्यत इति प्रश्नः । यद्यपि प्रश्नोSयं त एव पृच्छन्ति, ये पाणिनेरष्टाध्यायीस्थां व्यवस्थां नैव जानन्ति । तैरेवं वक्तुं पार्यते – समासरूपा या वृत्तिरस्ति, तस्यामेव एकशेषस्य समावेशो भविष्यति । कस्मादिति चेत् – द्वन्द्वसमासस्य ये विभेदाः सन्ति, तत्रैव एकशेषस्याप्यन्तर्भावो भवितुमर्हति । माता च पिता च इति पितरौ इति एकशेषस्योदाहरणम् इति ।। महर्षेः पाणिनेर्व्याकरणाद् येSनभिज्ञाः सन्ति, ते पितरौ इति पदम् एकशेषद्वन्द्वस्योदाहरणम् मन्वते । परन्तु कथनमिदम् अज्ञानविजृम्भितम् एव । वस्तुतस्तु, एकशेषस्यैकम् अप्युदाहरणं द्वन्द्वसमासस्य भेदत्वेन न स्वीक्रियते । यतो हि - द्वयोर्विषयविभागः सुतरां भिन्न एव । अतः जिज्ञासुना द्वन्द्वस्य च, एकशेषस्य च विषयविभागः प्रथमम् अवगन्तव्यः । बालानाम् सुखबोधायैतत् पर्याप्तम् ।
किन्तु विद्वज्जनानां परितोषायाSत्र महती समीक्षा करणीया । तद्यथा- सरूपाणामेकशेष एकविभक्तौ ( 1 - 2 – 64 ) इत्यत्र भाष्ये पतञ्जलेर्भणितिरियम् यद् अनवकाश एकशेषो द्वन्द्वं बाधिष्यते । अस्या भाष्योक्तेः क आशय इति विचार्यमाणे ज्ञायते यद् – यदि एकशेषो बाधकः, द्वन्द्वश्च बाध्यः, तर्हि उत्सर्गापवादयोः सामानाधिकरण्यम् ( समानविषयता ) भवितुमर्हति । तेन यदि द्वन्द्वसमासस्य वृत्तित्वेन स्वीकृतिः क्रियते, तर्हि एकशेषस्यापि वृत्तित्वेन परिगणनं कर्तव्यमेव । इदमेकं समाधानम् । अपरश्च श्रूयताम् – अष्टाध्याय्याः प्रथमपादस्य द्वितीये पादे एकशेषप्रकरणं नीम्नोक्तैः सूत्रैर्निर्दिष्टम् –
1. सरूपाणामेकशेष एकविभक्तौ ।( 1-2-64),
2. वृद्धो यूना तल्लक्षणश्चेदेव विशेषः । ( 65 )
3. स्त्री पुंवच्च । ( 66 )
4. पुमान् स्त्रिया । ( 67 )
5. भ्रातृ-पुत्रौ स्वसृ-दुहितृभ्याम् । ( 68 )
6. नपुंसकम् अनपुंसकेनैकवच्चास्यान्यतरस्याम् । ( 69 )
7. पिता मात्रा । ( 70 )
8. श्वसुरः श्वश्र्वा । ( 71 )
9. त्यदादीनि सर्वैर्नित्यम् । ( 72 )
10. ग्राम्यपशुसङ्घेष्वतरुणेषु स्त्री । ( 73 ) ।
एतैर्दशभिः सूत्रैः द्विविध एकशेषो वर्णितः । (1) सरूपाणामेकशेषः , (2) विरूपाणाञ्चैकशेषः । अस्य द्विविधस्योदाहरणद्वयमपि द्रष्टव्यम् ।
( क ) सैनिक + सैनिक + सैनिक + जस् + आ + गम्( गतौ ) + (झि) अन्ति । अत्र सरूपाणाम् एकशेष एकविभक्तौ ( 1 – 2 – 64 ) इत्यनेनैकस्यैव सैनिकेति प्रातिपदिकस्य भविष्यत्येकशेषः ।। तद्यथा - सैनिक + 0 + 0 + आ + गच्छ् + अ + अन्ति । ततः सैनिका आगच्छन्ति इति वाक्यस्य सिद्धिर्भवति ।। - उदाहरणमिदमस्ति सरूपैकशेषस्य ।।
(ख) ( जगत् + ङ्स् ) + मातृ + अम् + पितृ + अम् + वन्दे ।
अत्र पिता मात्रा ( 1 -2 -70 ) इत्यनेन सूत्रेण पितृ इति शब्दस्यैकशेषो भवति । ( जगतः पितरौ वन्दे । ) इदमुदाहरणम् विरूपाणामेकशेषस्य भवति ।।
3 - 2 अत्रैकशेषस्य नास्ति किमपि विग्रहवाक्यम् । यथा राज्ञः पुरुष इति विग्रहवाक्याद् राजपुरुष इति समासो निष्पाद्यते । कुम्भं करोति इत्येतस्माद् विग्रहवाक्याद् कुम्भकार इति कृदन्तं प्रातिपदिकं निर्मीयते । तथा सैनिका आगच्छन्ति इत्यत्र सरूपैकशेषे , उत वा पितरौ इति विरूपैकशेषे नास्ति पूर्वतः सिद्धं किमपि विग्रहवाक्यम् ।। तथापि – एकशेषो वृत्तित्वेन परिगण्यते । अतः जिज्ञासा विशेषरूपेणोदेति – कथम् एकशेषो वृत्तिरिति । उच्यते – वर्तनं वृत्तिः इति वृत्तिपदस्य व्युत्पत्तिः । तेन विलुप्तानाम् सरूपाणां विरूपाणाम् वा प्रातिपदिकानाम् ( शब्दानाम् ) अर्थे, अवशिष्टस्य प्रातिपदिकस्य प्रवर्तनम् यत्र भवति स एकशेषोSपि वृत्तिरिति निशङ्कं सिध्यति ।।
3 - 3 परन्त्वत्र सर्वैरवधेयम् यद् इयम् एकशेषरूपा वृत्तिस्तु न पदोद्देशको विधिः, वृत्तिरियन्तु पदत्वसम्पादिकाSस्ति । तेन पञ्चविधानां वृत्तीनाम् नीम्नोक्तरीत्या वर्गीकरणं विधेयमिति मन्ये ।
वृत्तयः
पदत्व-सम्पादिका वृत्तिः पदोद्देश्यिका वृत्तयः
1. एकशेषरूपा वृत्तिः 2. कृद्- रूपा वृत्तिः
सा च द्विविधा - 3. तद्धित-रूपा वृत्तिः
(क) सरूपाणामेकशेषः 4. समास-रूपा वृत्तिः
(ख) विरूपाणामेकशेषः 5. सनाद्यन्तधातु-रूपा वृत्तिः
4 – 0 अष्टाध्याय्या आन्तरिकीं संरचनाम् अवगन्तुम् इदानीं विचार्यते –भगवता पाणिनिना अष्टाध्याय्यां किम् केनापि सुनिश्चितेन पौर्वापर्यक्रमेण वृत्ति-वाक्ययोः सिद्धिः प्रदर्शिता ।
4 – 1 पूर्वं यथा निर्दिष्टं तथा वाक्यसंस्कारपक्षम् अनुसृत्य प्रथमं कमपि विवक्षितार्थम् विनिश्चित्य, तस्यार्थस्य कृते विविधाः प्रकृतयः संस्थाप्य, कारकसंज्ञानाम् माध्यमेन विभक्तिप्रत्ययान् अवतार्य, स्थान्यादेशभावेन यानि यानि ध्वनिपरिवर्तनान्यपेक्ष्यन्ते तानि सर्वाणि संपाद्य, प्रसङ्ग- प्राप्तानि सन्धिकार्याण्यपि कृत्वाSन्तिमे सोपाने प्रयोगार्हस्य वाक्यस्य सिद्धिः क्रियते पाणिनीयैः सूत्रैः ।। तद्यथा – “ राजन् + ङस् + पुरुष + सु + गम् + लट् ” इत्यस्माद् ( प्रकृति-प्रत्ययानाम् ) समुदायात् “राज्ञः पुरुषः गच्छति । ” प्रयोगार्हं वाक्यम् निर्मीयते । इत्थम् विवक्षिताद् अर्थाद् आरभ्य प्रवर्तमानं पाणिनीयं व्याकरणचक्रम् अन्तिमे सोपाने वाक्यं निर्माति, किन्तु तावत् पर्यन्तं, ( अर्थाद् अष्टाध्याय्याः पूर्वार्धे ) पाणिनीयस्य व्याकरणतन्त्रस्य परिभ्रमणन्त्वर्धमेव समाप्तम् ।।
4 – 2 अत्र वक्ता यद्यस्य वाक्यस्य व्यवहारदशायाम् प्रयोगं कर्तुम् अभिलषति, तर्हि तस्य वाक्यस्य प्रयोगाय सोSनुमन्यते । परन्तु यदि स वक्ताSस्मादेव वाक्याद् वृत्तिजन्यं सामासिकपदं निर्मातुमिच्छति, तर्हि तस्य कृतेSपि पाणिनीयं व्याकरणं सन्नद्धम् एव तिष्ठति । अत्र च विलसति पाणिनेः पदसंस्कारपक्षः । वक्तुर्मनसि यदा समासप्रयोगस्येच्छा जागर्ति तदा पाणिनेर्व्याकरणतन्त्रस्योत्तरगोलार्धे प्रवृत्तिः ( भ्रमणम् ) प्रारभ्यते । तद्यथा – राजन् + ङस् + पुरुष + सु इत्यलौकिकाद् वाक्याद् शब्दसाधनिका Sग्रे प्रचलति । अत्र “ प्राक्कडारात्समासः ” इत्यधिकारान्तर्गतं “ षष्ठी ” इत्येतत् सूत्रं प्रथमं समाससंज्ञां विदधाति, ततः “ कृत्-तद्धित-समासाश्च ”इति सूत्रेण समाससंज्ञकस्य प्रकृति-प्रत्ययसमुदायस्यैका Sपरा प्रातिपदिकेति संज्ञा भवति । इदानीं या या संज्ञा सा सा फलवतीति न्यायेन, प्रातिपदिकसंज्ञाम् अनुसृत्य “ सुपो धातु-प्रातिपदिकयोः ” इति सूत्रेण प्रातिपदिकान्तर्गतस्य ये ये विभक्तिप्रत्ययाः सन्ति, तेषां समेषां लोपो भविष्यति । ततः “ नलोपः प्रातिपदिकान्तस्य ” इत्यनेन सूत्रेण राजन् इत्यस्माच्छब्दान् नकारस्यापि लोपो भविष्यति; येन “राजपुरुष” इति षष्ठीतत्पुरुष-समासस्य सिद्धिः पूर्णतां गमिष्यति । अस्य कथनस्याSयम् आशयः – वाक्यसिद्धिं विधाय पाणिनेर्व्याकरणं तत्रैव न विरमति । परन्तु तस्मादेव वाक्यात् समासादिरूपम् पदमपि सुतरां जनयति । ततः “ राजपुरुषो गच्छति ” इत्यपि वक्तुं पार्यते ।। ( अर्थाद् अग्रेप्येतादृशं वाक्यम् अपि निर्मातुं शक्यते । )
4 – 3 परन्तु पाणिनीयं तन्त्रमत्रापि विरामं नानुभवति । यदि को S पि वक्ता राजपुरुष इति शब्दं ( प्रातिपदिकम् ) विशेषणत्वेन प्रयोक्तुम् अभिलषति तर्हि तन्त्रमिदं तस्य वक्तुः साहाय्यं वितनोत्येव । तत्कथम् इति चेत् –श्रूयताम् । विष्णुमित्रो राजपुरुषाय देवदत्ताय धनं प्रयच्छति ” इत्यादिस्वरूपकं कमप्यर्थं प्रकटीकरणाय, राजपुरुष + ङे + देवदत्त + ङे.....इत्यादिभिर् व्याकरण-सोपानैः प्रक्रियां सम्पाद्य तस्य वृत्तिजन्यस्य सामासिकपदस्यापि पुनः पुनर् नवीने वाक्ये प्रवेशो भवितुमर्हत्येव ।।
4 – 4 तदनन्तरं यदि राजपुरुषश्चासौ देवदत्तश्चेति कर्मधारय-समासस्य रचनां कर्तुम् वाञ्छति कश्चिद् वक्ता तर्हीदमेव पाणिनीयं व्याकरणं तत्रापि तस्य साहाय्यं करोत्येव । येन च – राजपुरुषदेवदत्ताय नगरस्य प्रजाः क्रुध्यन्ति । इति वाक्यं जनयित्वा पाणिनीयं व्याकरणं वक्तारम् उपकरोत्येव ।। इत्थं पाणिनेरष्टाध्यायी चक्रवद् अनवरतम् अहर्निशञ्च परिभ्रमति । अस्त्येतादृशी पाणिनेरष्टाध्याय्या आन्तरिकी संरचना ।।
अथोपसंह्रियते --
1. पाणिनेर्व्याकरणतन्त्रं प्रक्रियावस्थायाम् पूर्वार्धे शब्दनिष्पादनात्मकमप्यस्ति । एवमेव तदेव व्याकरणमुत्तरार्धे रूपान्तरणात्मकमपि दृश्यते ।
2. वाक्यसंस्कारपक्षं पुरस्कृत्य, प्रक्रियावस्थायाम् प्रथमम्, अर्थाद् आरभ्य वाक्यसिद्धिः प्रदर्श्यते । तदनन्तरं तदेव वाक्यं विग्रहवाक्यरूपेण स्वीकृत्य विविधानाम् पदानाम् उपरि संस्कारो विधीयते । अनेन च वृत्तिविधायकेन कार्येण, कृदन्त-तद्धितान्तादीनां पदानाम् ( प्रातिपदिकानाम्) सिद्धिर्भवति । अतः पदसंस्कारपक्षोSपि पाणिनिना स्वीकृतः । किन्तु तादृशः पक्षस्तु तन्त्रस्योत्तरार्धे वर्णितः ।
3. पाणिनीयं व्याकरणतन्त्रं चक्रवद् अनवरतं परिभ्रमति । तद् व्याकरणं वक्तुश्च नैकान् विचारान् श्रोतारं सम्प्रेषयितुम् वृत्ति-वाक्ययोर्विकल्पमपि वितनोतितमाम् ।
4. वृत्ति-वाक्ययोः वैकल्पिकत्वे समानार्थबोधकत्वे सत्यपि समर्थानां प्रथमाद् वा इत्यनेन साध्यमानानां तद्धितान्तानाम् प्रयोगार्हतरत्वमपि स्वीकरणीयम् ।
5. एकशेषरूपा वृत्तिः पदत्वसम्पादिकास्ति । तथान्याः चतस्रो वृत्तयः पदोद्देश्यिकाः सन्ति ।
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वसन्तकुमारो भट्टः
निदेशकः, भाषासाहित्यभवनम्, गुजरात विश्वविद्यालयः, अहमदावाद – 380 009
भूमिका – भाषाव्यवहारः सदैव वक्तृजन-श्रोतृजनयोर्मध्ये प्रवर्तते । अतः कस्या अपि भाषाया व्याकरणं द्विधा विरचयितुं शक्यते । एकं व्याकरणं श्रोतृणां कृते, अपरञ्च वक्तृणां कृते । अत्र 1. श्रोतृणां कृते यद् व्याकरणं स्यात् तस्मिन् वाक्याद् आरभ्या-Sर्थप्राप्तिपर्यन्तानि सोपानानि प्रदर्श्यन्ते । अत्र वाक्यस्य विघटनं निरूप्यते । व्याक्रियन्ते पृथक्क्रियन्ते शब्दा अनेनेति व्युत्पत्तिं चरितार्थां कुर्वाणा काSपि पद्धतिरनुसर्तव्येति कथनस्याशयः । 2. एवञ्च वक्तृणां कृते यद् व्याकरणं भवेत् तस्मिन् विवक्षिताद् अर्थादारभ्य वाक्यसिद्धिपर्यन्तं निरूपणं कर्तव्यम् । इमां द्वितीयां पद्धतिम् अनुसृत्य महर्षिणा पाणिनिनाSष्टाध्यायी विरचितेति दृश्यते । यतो हि – वक्तृणां मनस्सु ये विचाराः प्रादुर्भवन्ति तेषां वैखर्या वाण्या ध्वनिश्रेण्यां प्रकटीकरणम् अनिवार्यम् । अतः कमपि विचारं पूर्वं मनसि निश्चित्य, तस्यार्थस्य रूपान्तरणं कृत्वा वाक्यनिर्मितिः कथं कर्तव्येति प्रथममेव केनापि वक्त्रा ज्ञातव्यम् एव । अतः महर्षिः पाणिनिर् वक्तृणां कृते यद् व्याकरणं विरचयति, तस्मिन् “साधकतमम्, ध्रुवमपाये, कर्मणा यमभिप्रैति ( इति कारकपादे ) , वर्तमाने, परोक्षे, ( इति लकार-निरूपणे ), सत्तायाम्, व्यक्तायां वाचि ” ( इति धातुपाठे ) इत्यादिशब्दैः प्रथमम् अर्थनिर्धारणं करोति । तदनन्तरं तेभ्यः सर्वेभ्य अर्थेभ्यः करणम्, सम्प्रदानम्, अपादानम्, इत्यादीनि कारकसंज्ञादीनि प्रददाति । ततो महर्षिणा तेषां कारकादीनां प्रकटीकरणाय विभिन्नाः प्रत्यया विधीयन्ते । ततः स्थान्यादेशभावस्य प्रयुक्त्या तेषां प्रत्ययानां ध्वनिश्रेण्याम् आवश्यकं परिवर्तनं निर्दिश्यते । अन्तिमे च सोपाने सन्धिकार्यं कृत्वा, प्रयोगार्हस्य वाक्यस्य सिद्धिः सम्पाद्यते ।। अष्टाध्याय्याम् एतादृशं निरूपणं दृष्ट्वाSSधुनिकैर् वैयाकरणैर् अष्टाध्याय्याम् शब्दनिष्पादकस्य तन्त्रस्य ‘दर्शनं’ क्रियते । अर्थात् महर्षिणा पाणिनिना शब्दनिष्पादनात्मकं तन्त्रं ( Generative grammar ) व्याकरणं निर्मितमित्युच्यते । एतादृशस्य व्याकरणस्य कृते व्याक्रियन्ते व्युत्पाद्यन्ते शब्दा अनेनेति व्याकरणम् इति व्युत्पत्तिः सुसंगता भवति ।।
परन्तु पाणिनेर् अष्टाध्याय्याम् निरूपितस्य व्याकरणस्य यत् स्वरूपम् अद्यावधि विद्वद्भिर् आकलितं तत्र वृत्ति-विचारस्य किमपि स्थानं नास्ति । प्रत्युत तस्य ( वृत्तिविचारस्य ) सर्वथोपेक्षा तैर्विहितेति प्रतीयते । अतः प्रस्तुते शोधपत्रे वृत्ति-विचारम् अधिकृत्य पाणिनेर् अष्टाध्याय्याः पूर्णं स्वरूपं कीदृशं प्रतिभातीति विवेचनाय प्रयतिष्यते ।।
1 – 1 “ समर्थः पदविधिः ” ( 2- 1 – 1 ) इति परिभाषा-सूत्रस्य कोSर्थ इति विचार्यमाणे भट्टोजिदीक्षितेन सिद्धान्तकौमुद्यां लिखितं यद् - पदसम्बन्धी यो विधिः, स समर्थाश्रितो बोध्यः । अस्य सूत्रस्य च व्याख्यानावसरे , पतञ्जलिना स्पष्टीक्रियते यद् समर्थ इति पदेन 1. व्यपेक्षाभावरूपं सामर्थ्यं, 2. एकार्थीभावरूपञ्च सामर्थ्यम् अत्र विवक्षितं वर्तते । प्रथमेन च सामर्थ्येन वाक्यस्य सिद्धिर्भवति., द्वितीयेन चैकार्थीभावरूपेण सामर्थ्येन समासादयः पञ्चवृत्तयः भवन्ति ।
पदविधिरिति शब्दं, पतञ्जलिरित्थं विवृणोति – “ किं पुनर् विधीयते । 1. समासो, 2.विभक्तिविधानं 3. पराङ्वद्भावश्च ” ।। ( 2-1-1 भाष्यम् पृ. 359 ) अत्र नागेशो भट्टः स्पष्टीकरोति यद् समासपदं वृत्तिमात्रोपलक्षणम् । ( उद्द्योतः, पृ. 313 ) किन्तु विभक्तिविधानमिति शब्देन वाक्यसिद्धिरपि व्यपेक्षाभावरूपं सामर्थ्यम् अपेक्षत इत्यपि पतञ्जलिना निर्दिष्टमेव । अत एव नागेशेनैव तत्रेत्थम् अपि स्पष्टीकृतं यत् – केचित्तु पदोद्देश्यकः पदत्वसम्पादको वा सर्वो Sपि पदसम्बन्धित्वात् पदविधिरेवेति वदन्ति । ( तत्रैव उद्द्योतः, पृ. 313 )
अनया चर्चया सुष्ठु ज्ञायते यद् अस्याम् अष्टाध्याय्यां द्वौ विधी वर्तेते । एको विधिः – पदत्वसम्पादक आस्ते., द्वितीयश्च विधिः – पदोद्देश्यकोSपि नितराम् आस्ते । अत अष्टाध्याय्याः सूक्ष्ममान्तरिकं स्वरूपं निर्णेतुम् द्वावपि विधी सूक्ष्मेक्षिकया निरीक्षणीयौ ।
1 – 2 पाणिनेर्व्याकरणस्यान्तरिकं स्वरूपं द्रष्टुम् प्रथममेकः प्रश्नो विचारणीयो भवति । तद्यथा – पाणिनिः किं पदसंस्कारपक्षस्य पुरस्कर्ता, उत वा वाक्यसंस्कारपक्षस्य पुरस्कर्ता । तर्हि विद्वद्भिर्निणीतं यद् पाणिनिः शब्दसाधनिकावस्थायां ( प्रक्रियादशायाम् ) केवलं वाक्यसंस्कारपक्षम् एव स्वीकृतवान् । यतो हि – महर्षिणः पाणिनिः “ लः कर्मणि च भावे चाकर्मकेभ्यः,” तथा “ अनभिहिते ” इति च सूत्राभ्यां वाक्यस्यैव सिद्धिरादितः मनसि निधाय, सूत्राणि विरचयतीति प्रतिभाति ।।
परन्तु वाक्यसंस्कारपक्षस्य पुरस्कर्ता पाणिनिर् वाक्यान्तर्गतानां सुबन्त-तिङन्तपदानां साधनिकां यदा प्रदर्शयति, तदा वृत्तिजन्यानां पदानां स्थानं कुत्र विराजते, तदपि गवेषणीयम् । एतादृशे प्रश्ने समुद्भाविते – समुद्भूते सति, कार्यशब्दवादिनां यन्मतं तत्प्रथमं निपुणं निभालनीयम् । अष्टाध्याय्याः स्वरूपनिर्धारणाय तेषां कार्यशब्दवादिनाम् अभिप्रायः परमोपकारकोSस्ति ।
2 – 1 ये कार्यशब्दवादिनः सन्ति त इत्थं मन्वते यद् वृत्ति-वाक्ययोरर्थः सर्वथाSभिन्न एव । त एवमपि वदन्ति यद् वाक्यं नष्टीकृत्यैव समासादिवृत्तयः संसाध्यन्ते । ( अत एव तत्त्वबोधिन्यां “ समसनं समासः, भावे घञ् । अनेकस्य पदस्य एकपदीभवनम् इत्यर्थ इत्येके ।“ इति लिखितम् । ) प्रथमतया, वाक्यसंस्कारपक्षम् अनुसृत्य यद् वाक्यं निर्मितं तस्य वाक्यस्य यानि पदानि सन्ति, तानि पदानि प्रकृति-प्रत्यययोः पृथक्कृत्य, तत्र “ सुपो धातुप्रातिपदिकयोः ” (2 – 4 -71 ) इत्यनेन विभक्ति-प्रत्ययानाञ्च लोपं कृत्वा, कृत्-तद्धितान्तसमासादीनां प्रातिपदिकत्वं जोघुष्यते । अत्रैकपदीभवनान्तरं यो Sर्थः पूर्वसिद्धस्य वाक्यस्यासीत्, स एवार्थ वृत्तितः संप्राप्यते । अत्र “ समः अर्थः यस्य स समर्थ इति ” व्युत्पत्तिरपीदम् एव कथयति यद् वृत्ति-वाक्ययोरर्थः सर्वथा Sभिन्न एव ।। एवञ्च परार्थाभिधानं वृत्तिरिति भाष्योक्तेरपीदमेवाशयः ।।
2 – 2 कार्यशब्दवादिनः स्वकीयं मतं समर्थयितुं “ विभाषा ” ( 2 – 1 - 11 ) इति द्वितीयाध्यायस्य प्रथमपादस्यैकादशीयं सूत्रं प्रमाणत्वेनोपस्थापयन्ति । ते “ विभाषा ”( 2 -1-11 ) इत्यधिकारसूत्रं महाविभाषात्वेन ख्यापयन्ति । अनेन सूत्रेण “ राज्ञः पुरुषः ” इति वाक्यस्य, “ राजपुरुष ” इति वृत्तिजन्यस्य च पदस्य साधुत्वम् समानार्थत्वञ्च समुद्घोष्यते । वाग्व्यवहारकाले “ राज्ञः पुरुष ” इति वाक्यमपि साधु, “राजपुरुष” इति सामासिकं पदमपि साधु । तेनोभावपि प्रयोगौ सर्वथा स्वीकार्याविति महर्षिणा सूत्रकारेण सुष्ठु ज्ञापितम् । वृत्ति-वाक्याभ्याम् अर्थप्रतीतिरपि समानैव जायते । येन च, राज्ञः पुरुषम् आनय इत्युच्यमाने यस्यानयनं भवति, तस्यैवानयनं राजपुरुषम् आनय इत्युच्यमाने भवति । अतः नास्ति को S पि भेदो वृत्ति-वाक्ययोर् मध्ये ।।
2 – 3 कार्यशब्दवादिभिः द्वितीयमपि प्रमाणम् उपस्थाप्यते यद् महर्षिणा पाणिनिना “ नित्यं क्रीडाजीविकयोः ”(2-2-17) इत्येतस्मिन् सूत्रे नित्यमिति यत् पदं प्रयुक्तम्, तदतीव ध्यानार्हम् । तद्यथा - “ उद्दालक-पुष्पभञ्जिका ” इति शब्देन अमुकक्रीडेत्यर्थो Sवबोध्यते । परन्तु यदा “उद्दालकस्य पुष्पाणि भज्यन्ते यस्यां क्रीडायाम् ” इत्येतादृशं विग्रहवाक्यं प्रयुज्यते, तदा अमुक(विशिष्टा)क्रीडाया बोधो न जायते । अतः पाणिनिना स्वयमेवात्र “नित्यमिति” शब्दग्रहणेन, महाविभाषया विकल्पेन प्राप्तस्य वाक्यस्य निवृत्तिः क्रियते । तेन ज्ञायते यद् यत्र नास्ति नित्यमिति पदम्, तत्र सर्वत्रापि महाविभाषया वृत्ति-वाक्ययोर् विकल्पः समानार्थबोधकत्वेनैव प्रचलति ।।
2 – 4 तद्धितवृत्तिविषये Sपि वृत्ति-वाक्ययोः समानार्थकत्वे सत्यपि , प्रौढिवादेनैकाम् अभिनवां दृष्टिम् अनुसृत्य किञ्चिदुच्यते । तद्यथा – समर्थानां प्रथमाद् वा ( 4 -1 -82 ) इत्यनेन सूत्रेण “ औपगव ” इत्यादीनां शब्दानां सिद्धिर्भवति । सूत्रकारेणात्र यद् “ वा ” इति पदम् अभिप्रवेशितम्, तेन “ औपगव ” इति शब्देन सह, “ उपगोः अपत्यम् पुमान् ” इति वाक्यस्यापि समानार्थकता प्रयोगार्हत्वञ्च सूत्रकारेण स्वीकृतम् । किन्तु पोल किपार्स्की महोदयेन वा – विभाषा – अन्यतरस्याम् इति शब्दानाम् विकल्पवाचकत्वे सत्यपि, तेभ्यः सर्वेभ्यः शब्देभ्यः काS पि स्वल्पा विशिष्टा S र्थच्छाया सम्प्राप्यत इति समुद्घाटितम् । किपार्स्की महोदयस्य मतानुसारेण पाणिनेर्मनसि ‘वा’ इति शब्दस्य Or rather, usually, preferably [ Panini – As a Variationist; by Paul Kiparsky, University of Poona, Pune,1980, p. 1 ] इति विशिष्टार्थोSभिमत आसीत् । तेन “ उपगोः अपत्यं पुमान् ” इति वाक्यापेक्षया “ औपगव “ इति तद्धितान्तस्य रूपस्याधिकतरं प्रयोगार्हत्वम् अस्ति । इत्थं “ समर्थानां प्रथमाद् वा ” इति सूत्रस्थेन ‘वा’ इति शब्देन तद्धितवृतेरधिकतरा स्पृहणीयता वाग्व्यवहारे भवेद् इति संसूच्यते ।।
3 – 0 एकशेषः किं वृत्तिरस्ति न वा ?
3 – 1 पञ्चविधासु वृत्तिषु यैकशेषरूपा वृत्तिः परिगणिता, सा कथं वृत्तित्वेन परिगण्यत इति प्रश्नः । यद्यपि प्रश्नोSयं त एव पृच्छन्ति, ये पाणिनेरष्टाध्यायीस्थां व्यवस्थां नैव जानन्ति । तैरेवं वक्तुं पार्यते – समासरूपा या वृत्तिरस्ति, तस्यामेव एकशेषस्य समावेशो भविष्यति । कस्मादिति चेत् – द्वन्द्वसमासस्य ये विभेदाः सन्ति, तत्रैव एकशेषस्याप्यन्तर्भावो भवितुमर्हति । माता च पिता च इति पितरौ इति एकशेषस्योदाहरणम् इति ।। महर्षेः पाणिनेर्व्याकरणाद् येSनभिज्ञाः सन्ति, ते पितरौ इति पदम् एकशेषद्वन्द्वस्योदाहरणम् मन्वते । परन्तु कथनमिदम् अज्ञानविजृम्भितम् एव । वस्तुतस्तु, एकशेषस्यैकम् अप्युदाहरणं द्वन्द्वसमासस्य भेदत्वेन न स्वीक्रियते । यतो हि - द्वयोर्विषयविभागः सुतरां भिन्न एव । अतः जिज्ञासुना द्वन्द्वस्य च, एकशेषस्य च विषयविभागः प्रथमम् अवगन्तव्यः । बालानाम् सुखबोधायैतत् पर्याप्तम् ।
किन्तु विद्वज्जनानां परितोषायाSत्र महती समीक्षा करणीया । तद्यथा- सरूपाणामेकशेष एकविभक्तौ ( 1 - 2 – 64 ) इत्यत्र भाष्ये पतञ्जलेर्भणितिरियम् यद् अनवकाश एकशेषो द्वन्द्वं बाधिष्यते । अस्या भाष्योक्तेः क आशय इति विचार्यमाणे ज्ञायते यद् – यदि एकशेषो बाधकः, द्वन्द्वश्च बाध्यः, तर्हि उत्सर्गापवादयोः सामानाधिकरण्यम् ( समानविषयता ) भवितुमर्हति । तेन यदि द्वन्द्वसमासस्य वृत्तित्वेन स्वीकृतिः क्रियते, तर्हि एकशेषस्यापि वृत्तित्वेन परिगणनं कर्तव्यमेव । इदमेकं समाधानम् । अपरश्च श्रूयताम् – अष्टाध्याय्याः प्रथमपादस्य द्वितीये पादे एकशेषप्रकरणं नीम्नोक्तैः सूत्रैर्निर्दिष्टम् –
1. सरूपाणामेकशेष एकविभक्तौ ।( 1-2-64),
2. वृद्धो यूना तल्लक्षणश्चेदेव विशेषः । ( 65 )
3. स्त्री पुंवच्च । ( 66 )
4. पुमान् स्त्रिया । ( 67 )
5. भ्रातृ-पुत्रौ स्वसृ-दुहितृभ्याम् । ( 68 )
6. नपुंसकम् अनपुंसकेनैकवच्चास्यान्यतरस्याम् । ( 69 )
7. पिता मात्रा । ( 70 )
8. श्वसुरः श्वश्र्वा । ( 71 )
9. त्यदादीनि सर्वैर्नित्यम् । ( 72 )
10. ग्राम्यपशुसङ्घेष्वतरुणेषु स्त्री । ( 73 ) ।
एतैर्दशभिः सूत्रैः द्विविध एकशेषो वर्णितः । (1) सरूपाणामेकशेषः , (2) विरूपाणाञ्चैकशेषः । अस्य द्विविधस्योदाहरणद्वयमपि द्रष्टव्यम् ।
( क ) सैनिक + सैनिक + सैनिक + जस् + आ + गम्( गतौ ) + (झि) अन्ति । अत्र सरूपाणाम् एकशेष एकविभक्तौ ( 1 – 2 – 64 ) इत्यनेनैकस्यैव सैनिकेति प्रातिपदिकस्य भविष्यत्येकशेषः ।। तद्यथा - सैनिक + 0 + 0 + आ + गच्छ् + अ + अन्ति । ततः सैनिका आगच्छन्ति इति वाक्यस्य सिद्धिर्भवति ।। - उदाहरणमिदमस्ति सरूपैकशेषस्य ।।
(ख) ( जगत् + ङ्स् ) + मातृ + अम् + पितृ + अम् + वन्दे ।
अत्र पिता मात्रा ( 1 -2 -70 ) इत्यनेन सूत्रेण पितृ इति शब्दस्यैकशेषो भवति । ( जगतः पितरौ वन्दे । ) इदमुदाहरणम् विरूपाणामेकशेषस्य भवति ।।
3 - 2 अत्रैकशेषस्य नास्ति किमपि विग्रहवाक्यम् । यथा राज्ञः पुरुष इति विग्रहवाक्याद् राजपुरुष इति समासो निष्पाद्यते । कुम्भं करोति इत्येतस्माद् विग्रहवाक्याद् कुम्भकार इति कृदन्तं प्रातिपदिकं निर्मीयते । तथा सैनिका आगच्छन्ति इत्यत्र सरूपैकशेषे , उत वा पितरौ इति विरूपैकशेषे नास्ति पूर्वतः सिद्धं किमपि विग्रहवाक्यम् ।। तथापि – एकशेषो वृत्तित्वेन परिगण्यते । अतः जिज्ञासा विशेषरूपेणोदेति – कथम् एकशेषो वृत्तिरिति । उच्यते – वर्तनं वृत्तिः इति वृत्तिपदस्य व्युत्पत्तिः । तेन विलुप्तानाम् सरूपाणां विरूपाणाम् वा प्रातिपदिकानाम् ( शब्दानाम् ) अर्थे, अवशिष्टस्य प्रातिपदिकस्य प्रवर्तनम् यत्र भवति स एकशेषोSपि वृत्तिरिति निशङ्कं सिध्यति ।।
3 - 3 परन्त्वत्र सर्वैरवधेयम् यद् इयम् एकशेषरूपा वृत्तिस्तु न पदोद्देशको विधिः, वृत्तिरियन्तु पदत्वसम्पादिकाSस्ति । तेन पञ्चविधानां वृत्तीनाम् नीम्नोक्तरीत्या वर्गीकरणं विधेयमिति मन्ये ।
वृत्तयः
पदत्व-सम्पादिका वृत्तिः पदोद्देश्यिका वृत्तयः
1. एकशेषरूपा वृत्तिः 2. कृद्- रूपा वृत्तिः
सा च द्विविधा - 3. तद्धित-रूपा वृत्तिः
(क) सरूपाणामेकशेषः 4. समास-रूपा वृत्तिः
(ख) विरूपाणामेकशेषः 5. सनाद्यन्तधातु-रूपा वृत्तिः
4 – 0 अष्टाध्याय्या आन्तरिकीं संरचनाम् अवगन्तुम् इदानीं विचार्यते –भगवता पाणिनिना अष्टाध्याय्यां किम् केनापि सुनिश्चितेन पौर्वापर्यक्रमेण वृत्ति-वाक्ययोः सिद्धिः प्रदर्शिता ।
4 – 1 पूर्वं यथा निर्दिष्टं तथा वाक्यसंस्कारपक्षम् अनुसृत्य प्रथमं कमपि विवक्षितार्थम् विनिश्चित्य, तस्यार्थस्य कृते विविधाः प्रकृतयः संस्थाप्य, कारकसंज्ञानाम् माध्यमेन विभक्तिप्रत्ययान् अवतार्य, स्थान्यादेशभावेन यानि यानि ध्वनिपरिवर्तनान्यपेक्ष्यन्ते तानि सर्वाणि संपाद्य, प्रसङ्ग- प्राप्तानि सन्धिकार्याण्यपि कृत्वाSन्तिमे सोपाने प्रयोगार्हस्य वाक्यस्य सिद्धिः क्रियते पाणिनीयैः सूत्रैः ।। तद्यथा – “ राजन् + ङस् + पुरुष + सु + गम् + लट् ” इत्यस्माद् ( प्रकृति-प्रत्ययानाम् ) समुदायात् “राज्ञः पुरुषः गच्छति । ” प्रयोगार्हं वाक्यम् निर्मीयते । इत्थम् विवक्षिताद् अर्थाद् आरभ्य प्रवर्तमानं पाणिनीयं व्याकरणचक्रम् अन्तिमे सोपाने वाक्यं निर्माति, किन्तु तावत् पर्यन्तं, ( अर्थाद् अष्टाध्याय्याः पूर्वार्धे ) पाणिनीयस्य व्याकरणतन्त्रस्य परिभ्रमणन्त्वर्धमेव समाप्तम् ।।
4 – 2 अत्र वक्ता यद्यस्य वाक्यस्य व्यवहारदशायाम् प्रयोगं कर्तुम् अभिलषति, तर्हि तस्य वाक्यस्य प्रयोगाय सोSनुमन्यते । परन्तु यदि स वक्ताSस्मादेव वाक्याद् वृत्तिजन्यं सामासिकपदं निर्मातुमिच्छति, तर्हि तस्य कृतेSपि पाणिनीयं व्याकरणं सन्नद्धम् एव तिष्ठति । अत्र च विलसति पाणिनेः पदसंस्कारपक्षः । वक्तुर्मनसि यदा समासप्रयोगस्येच्छा जागर्ति तदा पाणिनेर्व्याकरणतन्त्रस्योत्तरगोलार्धे प्रवृत्तिः ( भ्रमणम् ) प्रारभ्यते । तद्यथा – राजन् + ङस् + पुरुष + सु इत्यलौकिकाद् वाक्याद् शब्दसाधनिका Sग्रे प्रचलति । अत्र “ प्राक्कडारात्समासः ” इत्यधिकारान्तर्गतं “ षष्ठी ” इत्येतत् सूत्रं प्रथमं समाससंज्ञां विदधाति, ततः “ कृत्-तद्धित-समासाश्च ”इति सूत्रेण समाससंज्ञकस्य प्रकृति-प्रत्ययसमुदायस्यैका Sपरा प्रातिपदिकेति संज्ञा भवति । इदानीं या या संज्ञा सा सा फलवतीति न्यायेन, प्रातिपदिकसंज्ञाम् अनुसृत्य “ सुपो धातु-प्रातिपदिकयोः ” इति सूत्रेण प्रातिपदिकान्तर्गतस्य ये ये विभक्तिप्रत्ययाः सन्ति, तेषां समेषां लोपो भविष्यति । ततः “ नलोपः प्रातिपदिकान्तस्य ” इत्यनेन सूत्रेण राजन् इत्यस्माच्छब्दान् नकारस्यापि लोपो भविष्यति; येन “राजपुरुष” इति षष्ठीतत्पुरुष-समासस्य सिद्धिः पूर्णतां गमिष्यति । अस्य कथनस्याSयम् आशयः – वाक्यसिद्धिं विधाय पाणिनेर्व्याकरणं तत्रैव न विरमति । परन्तु तस्मादेव वाक्यात् समासादिरूपम् पदमपि सुतरां जनयति । ततः “ राजपुरुषो गच्छति ” इत्यपि वक्तुं पार्यते ।। ( अर्थाद् अग्रेप्येतादृशं वाक्यम् अपि निर्मातुं शक्यते । )
4 – 3 परन्तु पाणिनीयं तन्त्रमत्रापि विरामं नानुभवति । यदि को S पि वक्ता राजपुरुष इति शब्दं ( प्रातिपदिकम् ) विशेषणत्वेन प्रयोक्तुम् अभिलषति तर्हि तन्त्रमिदं तस्य वक्तुः साहाय्यं वितनोत्येव । तत्कथम् इति चेत् –श्रूयताम् । विष्णुमित्रो राजपुरुषाय देवदत्ताय धनं प्रयच्छति ” इत्यादिस्वरूपकं कमप्यर्थं प्रकटीकरणाय, राजपुरुष + ङे + देवदत्त + ङे.....इत्यादिभिर् व्याकरण-सोपानैः प्रक्रियां सम्पाद्य तस्य वृत्तिजन्यस्य सामासिकपदस्यापि पुनः पुनर् नवीने वाक्ये प्रवेशो भवितुमर्हत्येव ।।
4 – 4 तदनन्तरं यदि राजपुरुषश्चासौ देवदत्तश्चेति कर्मधारय-समासस्य रचनां कर्तुम् वाञ्छति कश्चिद् वक्ता तर्हीदमेव पाणिनीयं व्याकरणं तत्रापि तस्य साहाय्यं करोत्येव । येन च – राजपुरुषदेवदत्ताय नगरस्य प्रजाः क्रुध्यन्ति । इति वाक्यं जनयित्वा पाणिनीयं व्याकरणं वक्तारम् उपकरोत्येव ।। इत्थं पाणिनेरष्टाध्यायी चक्रवद् अनवरतम् अहर्निशञ्च परिभ्रमति । अस्त्येतादृशी पाणिनेरष्टाध्याय्या आन्तरिकी संरचना ।।
अथोपसंह्रियते --
1. पाणिनेर्व्याकरणतन्त्रं प्रक्रियावस्थायाम् पूर्वार्धे शब्दनिष्पादनात्मकमप्यस्ति । एवमेव तदेव व्याकरणमुत्तरार्धे रूपान्तरणात्मकमपि दृश्यते ।
2. वाक्यसंस्कारपक्षं पुरस्कृत्य, प्रक्रियावस्थायाम् प्रथमम्, अर्थाद् आरभ्य वाक्यसिद्धिः प्रदर्श्यते । तदनन्तरं तदेव वाक्यं विग्रहवाक्यरूपेण स्वीकृत्य विविधानाम् पदानाम् उपरि संस्कारो विधीयते । अनेन च वृत्तिविधायकेन कार्येण, कृदन्त-तद्धितान्तादीनां पदानाम् ( प्रातिपदिकानाम्) सिद्धिर्भवति । अतः पदसंस्कारपक्षोSपि पाणिनिना स्वीकृतः । किन्तु तादृशः पक्षस्तु तन्त्रस्योत्तरार्धे वर्णितः ।
3. पाणिनीयं व्याकरणतन्त्रं चक्रवद् अनवरतं परिभ्रमति । तद् व्याकरणं वक्तुश्च नैकान् विचारान् श्रोतारं सम्प्रेषयितुम् वृत्ति-वाक्ययोर्विकल्पमपि वितनोतितमाम् ।
4. वृत्ति-वाक्ययोः वैकल्पिकत्वे समानार्थबोधकत्वे सत्यपि समर्थानां प्रथमाद् वा इत्यनेन साध्यमानानां तद्धितान्तानाम् प्रयोगार्हतरत्वमपि स्वीकरणीयम् ।
5. एकशेषरूपा वृत्तिः पदत्वसम्पादिकास्ति । तथान्याः चतस्रो वृत्तयः पदोद्देश्यिकाः सन्ति ।
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बुधवार, 10 मार्च 2010
श्रीमद् भागवतपुराण में वैदिक देवता सृष्टि का तिरोधान
श्रीमद्भागवत महापुराण में वैदिक देवतासृष्टि का तिरोधान*
वसन्तकुमार म. भट्ट
निदेशक, भाषासाहित्यभवन,गुजरात विश्वविद्यालय,
अहमदाबाद-380 009
bhattvasant@yahoo.co.in
(1)
यह सुविदित है कि मन्त्रसंहिताओं में अग्नि, इन्द्र, वरुण, यम, प्रजापति, मरुदादि बहुविध देवताओं की स्तुतियाँ प्रस्तुत है । इन सभी देवताओं के द्वारा ही इस सृष्टि का आविर्भाव हुआ है, और उसका सञ्चालन भी इन के द्वारा होता है । प्रस्तुत आलेख में वैदिक-देवतासृष्टि का पुराणकाल में कैसे क्रमशः तिरोधान होता जाता है, यह बताने की कोशिश की है । विशेष रूपसे श्रीमद्भागवत पुराण को लेकर उस में इन्द्र देवता का वेदोक्त प्रधानभाव कैसे गौणत्व को प्राप्त करके, अन्ततोगत्वा सम्पूर्ण तिरोहित हो जाता है- इस की सोदाहरण चर्चा करनी अपेक्षित है ।
हम जानते है कि वेदसाहित्य में इन्द्रदेवता का प्राधान्य सर्वोपरि है, ओर इस देवता का वृत्रासुर के साथ बार बार युद्ध होता है । और इन्द्र की विजय होती है । इस युद्ध में कदाचित् इन्द्र को मरुद्गण की या विष्णु की साहाय्य भी मिलती है । वैदिक पुराकथाओं में यह बात भी कही जाती है कि वैदिक देवगण आदितः अजर एवं अमर नहीं थे । लेकिन कालान्तर में उन्होंने तप या सोमपान से अमरत्व प्राप्त किया था । तत्पश्चाद् उपनिषत्काल में इन्हीं इन्द्रादि देवों का सर्वोपरित्व या स्वामित्व अमान्य भी किया गया है । केनोनिषद् में सर्वोपरि सत्ता के रूप में ‘ब्रह्मन्’ तत्त्व को प्रस्थापित किया गया है ।।
इन वेदोक्त पुराकथाओं (Myths) का विविध पुराणों में, उपबृंहण करने के साथ साथ स्थानान्तरण, रूपान्तरणादि करते करते, वेदोक्त सृष्टिविद्या के मूलभूत तत्त्वों का संरक्षण करते हुए बादरायण व्यास ने अपनी निजी पौराणिक दृष्टि से एक अद्वितीय पुराणसाहित्य का निर्माण किया है ।।
श्रीमद्भागवत महापुराण के आरम्भ में ही व्यासने प्रस्तुत पुराण रचना का प्रयोजन उद्घोषित करते हुए लिखा है कि –
वासुदेवे भगवति भक्तियोगः प्रयोजितः ।
जनयत्याशु वैराग्यं ज्ञानं च यद् अहैतुकम् ।। 1-2-7
वासुदेवपरा वेदा, वासुदेवपरा मखाः ।
वासुदेवपरा योगा, वासुदेवपराः क्रियाः ।। 1-2-28
वासुदेवपरं ज्ञानं वासुदेवपरं तपः ।
वासुदेवपरो धर्मो वासुदेवपरा गतिः ।। 1-2-29
इन श्लोकों से मालुम होता है कि श्रीमद्भगवतपुराण में भगवान् वासुदेव के प्रति जो भक्तियोग होना चाहिए उसका निरूपण केन्द्रीभूत विषय है । और इस भक्तियोग को उद्भासित करने के लिए वेदवर्णित देवतासृष्टि को भी वासुदेवाश्रित चित्रित की गई है ।
(2)
भगवान् विष्णु के अवतार स्वरूप वासुदेव श्रीकृष्ण पर आश्रित वैदिक देवतासृष्टि का चित्र देखने से पहेले, हम ऋग्वेद स्थित विष्णु-देवता विषयक पुराकथा का संक्षेप में अभ्यास कर लेंगे । ऋग्वेद में द्युस्थानीय देवताओं में – सविता, पूषन्, अर्यमन्, आदित्य, उषस् आदि का समावेश होता है, जिसमें विष्णु का भी समावेश है । यहाँ विष्णुसूक्तों की संख्या चार-पाँच से अधिक नहीं है । इनमें से दीर्घतमस् ऋषि के जो सूक्त है, उसमें विष्णु के लिए उरुक्रम, उरुगाय, त्रिविक्रम, युवा, बृहच्छरीर, अकुमार जैसे विशेषणों का प्रयोग किया गया है । दूसरी और सप्तम मण्डल में वसिष्ठ ऋषिने विष्णु के लिए ‘शिपिविष्ट’ तथा ‘निषिक्तपा’ – इन दो विशेषणों का ध्यानास्पद प्रयोग किया है । यद्यपि यह बात एकदम स्पष्ट है कि ऋग्वेद में वर्णित विष्णुदेवता द्युस्थानीय है और वह सूर्यदेवता ही है । परन्तु पुराणकार व्यासजीने विष्णु के लिए प्रयुक्त पूर्वोक्त विशेषणों का श्रीमद्भागवत-महापुराण में बडे रोचक स्वरूप में उपबृंहण किया गया है ।
‘विष्णु’ शब्द का निर्वचन करते हुए आचार्य यास्क ने लिखा है कि- यद् विषितो भवति, तद् विष्णुर्भवति । विष्णुर्विषतेर्वा, व्याप्नोतेर्वा, तस्यैषा (ऋक्) भवति । (निरुक्त, अ-12) इस पर दुर्गने कहा है कि – विषितो व्याप्तोડयमेव सूर्यो रश्मिभिः भवति तदा विष्णुः भवति । अर्थात् व्यापनशील सूर्य के लिए ‘विष्णु’ शब्द का प्रयोग होना यथार्थ है।
वेदों में इस विष्णु को ‘त्रिविक्रम’ कहा है । इस वेदोक्त पुराकथा का उपबृंहण करके वामन आख्यान की भागवतपुराण में रचना की गई है ।
इसी तरह से ‘विष्णु’ , जो कि सविता देव का ही पर्याय है, उसके लिए वसिष्ठने “शिपिविष्ट” शब्द का प्रयोग किया है । यह विशेषण सूर्यरश्मिओं को ध्यान में रखते हुए प्रयुक्त हुआ है । सूर्य अपनी किरणों रूपी शिपि से पृथिवी में प्रवेशता है, और बीजों को अंकुरित करता है । और यदि ‘विष्णु’ (पृथिवी में) गर्भाधान करनेवाला हो तो, वसिष्ठ की दृष्टि में वह विष्णु ‘निषिक्तपा’ (ऋ 7-36-4) भी होना चाहिए । अर्थात् गर्भाधान करनेवाले विष्णु ही गर्भ के (निषिक्त रेतस् के) संरक्षक भी बने ।। इन दो विशेषणों द्वारा जो वेदोक्त पुराकल्पन (Myth) प्रस्तुत हुई थी, उसका उपबृंहण करते हुए व्यासजीने षष्ठस्कन्ध में मरुद्गण की उत्पत्ति वर्णित की है, और दशम स्कन्ध में वसुदेव-देवकी के सात गर्भों की हत्या करनेवाले कंस का संहार करनेवाले श्रीकृष्ण को विष्णु के अवतार कहे है । वेदोक्त “निषिक्तपा” शब्द का चारितार्थ्य बताने के लिए ही व्यासने देवकी के अष्टमगर्भ के रूप में श्रीकृष्ण का जन्म वर्णित किया है ।।
(3)
वैदिक पुराकथाओं का उपबृंहण करने के साथ साथ व्यासने ‘विष्णु’ विषयक एक नवीन पुराकल्पन का भी सर्जन कर लिया है । भारतीय परम्परागत मान्यता के अनुसार व्यासने मन्त्रों का संहिताकरण कर लेने के बाद ‘महाभारत’ की रचना की थी । इस महाभारत में ऐतिहासिक कृष्ण का चरित भी उन्होंने वर्णित किया था । अतः वे जब पुराणों की रचना करते है तब वेदोक्त ‘विष्णु देवता’ और महाभारतोक्त ‘श्रीकृष्ण’ का समाहार करके एक नवीन “चतुर्भुज विष्णु” का नवसर्जन भी करते है ।
‘चतुर्भुज विष्णु’ की जो परिकल्पना पुराणों में वर्णित है, वह शङ्ख-चक्र-गदा-पद्मधारी विष्णु है, यह सर्वविदित है । परन्तु ध्यान दे कर सोचा जाय तो पुराणकाल के विष्णु के दो हाथों में जो 1.सुदर्शन चक्र एवं 2. पद्म है- वह दोनों वेदकालीन सूर्यदेवता के द्योतक प्रतीक है । तथा अन्य दो हाथों में जो 3.गदा एवं 4.खङ्ख रखे गये है, वे दोनों महाभारतकालीन श्रीकृष्ण के प्रत्यायक है । महाभारत के भीष्मपर्व में (श्रीमद्भगवद्गीता में) अवतारवाद का शङ्ख फूंकते हुए श्रीकृष्ण ने कहा है कि-
परित्राणाय साधूनाम् विनाशाय च दुष्कृताम् ।
धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे ।।
इस से साधुपरित्राण और दुष्टों के विनाश के लिए विष्णु के हाथ में गदा स्थापित की गई है, तथा “संभवामि युगे युगे” का वादा देने के लिए एक अन्य हाथ में शङ्ख रखा गया है । इस तरह से, व्यासने वेदकालीन विष्णु(सूर्य) और महाभारतकालीन श्रीकृष्ण को एकत्र मिला कर ‘चतुर्भुज विष्णु’ की अपूर्व कल्पना का निर्माण किया है ।। अर्थात् पुराणों में भी, व्यास के द्वारा सृष्टिविद्या की केन्द्रभूत वेदोक्त सूर्योपासना नवीन स्वरूप में प्रवाहित की गई है ।
(4)
व्यासजी के हाथों से वेदोक्त पुराकथाओं का उपबृंहण और नवसर्जन होने के साथ साथ अन्य वैदिक देवतासृष्टि का कैसे क्रमिक विसर्जन भी हुआ है यह भी रसप्रद ज्ञातव्य विषय है । परन्तु वैदिक देवताओं का विसर्जन देखने से पहेले, व्यासने वेदों में वर्णित इन्द्र देव की प्रधानता एवं सर्वोपरिता का जो स्थानान्तरण किया है वह भी द्रष्टव्य है – ऋग्वेद में 33 या उससे भी अधिक देवताओं की स्तुति की गई है । परन्तु सब से अधिक 250 सूक्तों में जिसकी स्तुति की गई है वह देवता है इन्द्र । गृत्समद् ऋषि के ‘स जनास इन्द्रः’ (2-12) सूक्त को देखने से मालुम होता है कि देवों में सर्वोपरि देव ‘इन्द्र’ ही है । तथा इस इन्द्र के सहायक-देवों में विष्णु (उपेन्द्र) एवं मरुद्गण आते है । परन्तु पुराणकार व्यास के हाथों से यह इन्द्र एवं विष्णु का प्रधान-गौणभाव स्थानान्तरित हो जाता है । जैसा कि – श्रीमद्भागवत महापुराण के अष्टमस्कन्ध को देखने से मालुम होता है कि इन्द्रादि देवों ने जब बृहस्पति की अनुपस्थिति में विश्वरूप का सहारा लिया तो उसने देवों को ‘नारायणकवच’ का उपदेश दिया । तदनन्तर शङ्खचक्रगदाधर नारायण प्रकट हो कर वृत्रासुर को मारने के लिए दधीचि के गात्रों ले आने की सलाह देते है । जिससे ‘वज्र’ बनवा कर इन्द्रने वृत्रासुर कि दो भुजायें काट ली । तब वृत्र ऐरावत हस्ती सहित इन्द्र को निगल जाता है । परन्तु मायावी इन्द्र ‘नारायण-कवच’ की रक्षा से सुरक्षित रहा, और वृत्र का उदर फाड कर बहार नीकल जाता है । तब फिर से भीषण युद्ध होता है । यहाँ पर वृत्रासुर मरने से पहेले जो कहता है, वह ध्यातव्य है-
नन्वेष वज्रस्तव शक्र तेजसा हरेर्दधीचेस्तपसा च तेजितः ।
तेनैव शत्रुं जहि विष्णुयन्त्रितो, यतो हरिर्विजयः श्रीर्गुणास्ततः ।। (भा.पु. 6-11-20)
वृत्र- “हे इन्द्र ! तेरे इस वज्र में श्रीहरि का तेज है, और दधीचि का तप है, और तुम विष्णु से संचालित है, अतः तुम मुझे मार सकते हो । जहाँ श्रीहरि होते है वहीं पर विजय, श्री और सभी गुण होते है ।” इन्द्रने वृत्रासुर का वध तो किया, परन्तु अब ब्रह्म-हत्या का पाप इन्द्र को सताता है । इन्द्र भाग कर मानस सरोवर की एक कमलनाल में प्रविष्ट हो जाता है । वहाँ पर हजारों वर्षो तक कमल-विहारिणी लक्ष्मी ने ( अर्थात् विष्णुपत्नीने ) इन्द्र का रक्षण किया । इस तरह वृत्रासुरवध-प्रसङ्ग में भी व्यासजी के द्वारा बार बार इन्द्र कि रक्षा विष्णु के अधीन है यह बताया गया है ।।
(5)
दितिने अपने ‘हिरण्याक्ष’ एवं ‘हिरण्यकशिपु’ नामक दो पुत्रों की हत्या हो जाने के बाद कश्यप की सेवा करके ‘इन्द्रहन्ता’ एवं ‘अमृत्यु’ पुत्र का वरदान माँगा । कश्यपने अदिति के पुत्र इन्द्र की भी रक्षा का विचार मन में रखते हुए, दिति को ‘पुंसवन वैष्णवी-व्रत’ का उपदेश दिया ।
अब इन्द्र इस वैष्णवव्रत अमोघ फल-प्रदाता है, ऐसा जान कर छद्म वेष से दिति का दास बन के रहता है । संवत्सर पर्यन्त चलनेवाले इस व्रत में कदाचित् क्षति होने के इन्तजार में इन्द्र बैठा था । एकदा दिति ने उच्छिष्ट मूँह रखा था, तब शयन किया । इन्द्र उसी समय दिति के उदर में जा कर गर्भ को सात टुकडों में काट देता है । परन्तु गर्भस्थ शिशु वैषणव-व्रत के कारण सुरक्षित थे, वे मरे नहीं । और रोने लगे । इन्द्र ने “मा रोदीः ।” कह कर फिर प्रत्येक टूकडों को सात-सात करके उनपचास (49) टूकडें कर दिये । फिर भी वे नहीं मरे, तब इन्द्र ने उसको अपने बान्धव के रूप में स्वीकार कर लिया ।
यहाँ कश्यप ने दिति को जो वरदान दिया था, उसके शब्द ध्यातव्य है-
पुत्रस्ते भविता भद्रे इन्द्रहाડदेवबान्धवाः ।
संवत्सरं व्रतमिदं यद्यञ्जो धारयिष्यसि ।।
इस श्लोक पर श्रीधर ने मर्मोद्घाटन करते हुए लिखा है कि- वैष्णवं व्रतं तावदुपद्देक्ष्यामि तेनैव अस्याः शुद्धचित्ताया इन्द्रं प्रति क्रोधो निवर्तिष्यते, पुत्रस्त्वमर्त्यो भविष्यति, दीर्घकालत्वे च व्रतस्य कथंचिद् वैगुण्ये सतीन्द्रस्य वधोડपि न भविष्यतीति ।।
दिति के (मरुद्) पुत्र भी अमर्त्य बनेंगे, तथा व्रत में वैगुण्य पैदा होने पर इन्द्र का भी वध नहीं होगा ।। - इस तरह से मरुद्गण की उत्पत्तिकथा सूनानें में भी व्यास ने वैदिकदेवता इन्द्र की रक्षा वैष्णवव्रत पर आधृत है यह सूक्ष्म बात प्रदर्शित की है ।
(6)
भागवत के षष्ठ स्कन्ध में जहाँ जहाँ वैदिक देवों की विष्णु-आश्रितता प्रदर्शित है, ( जैसे कि- दधीचि की हड्डी से बने वज्र में विष्णु का तेज, नारायण कवच की रक्षा, कमल-विहारिणी लक्ष्मी का शरण और पुंसवन वैष्णव-व्रत ) वहाँ विष्णु की परोक्ष साहाय्य वर्णित है । तथा वेदवर्णित इन्द्र का सर्वोपरित्व अब छीन लिया गया है, और वह विष्णु पर स्थानान्तरित होता जा रहा है ।
अब अष्टम स्कन्ध में इन्द्र की विष्णु-आश्रितता में और बाढ आती है । क्योंकि असुरों से परास्त होता हुआ इन्द्र अब बार-बार विष्णु की प्रत्यक्ष साहाय्य पर जीने लगा है- ऐसा वर्णन व्यासने प्रस्तुत किया है -
एकबार असुरों ने स्वर्गलोक पर आक्रमण किया, तब देवों के प्राण नीकल गये, वे गिर पडे । इन्द्र-वरुणादि निस्तेज हो कर भगवान् अजित की शरण में गयें । उसने इनको समुद्रमंथन के लिए प्रोत्साहित किये । भगवान् विष्णु ने मन्दराचल को उठा कर समुद्र में रखा और स्वयं कच्छप रूप धारण करके मन्दराचल की आधारशिला बने । वासुकिनाग में अपनी शक्ति का संचार भी किया । और अन्त में अमृतकुंभ नीकलने पर ‘मोहिनी’ रूप धारण करके देवोंको अमृत-पान करवाया । यहाँ विष्णु की प्रत्यक्ष साहाय्य से देवों को अमरत्व प्राप्त हुआ ऐसा वर्णन है । अब इन्द्र-विष्णु का वेदोक्त प्रधान-गौणभाव बदल जाता है । विष्णु की सर्वोपरिता एवं प्राधान्य दोनों उद्घाटित होते जाते है ।।
* * *
वञ्चित हुए असुरों ने स्वर्ग में फिर से आक्रमण किया । बलि ने विश्वजयी यज्ञ किया । तब इन्द्रादि देवगण स्वर्ग से भ्रष्ट होने की भीति से आतंकित था । तब अदितिने पयोव्रत का पालन किया और विष्णु अवतार स्वरूप वामन का प्राकट्य होता है । वेदोक्त विष्णु की ‘त्रिविक्रम’ होने की कथा का उपबृंहण करके व्यासने वामन के विराट होने की नयी पुराकथा हमारे सामने प्रस्तुत की । इन्द्रादि देवों को फिर से विष्णु की प्रत्यक्ष साहाय्य से ही त्रिविष्टप वापस मिला । पुराणों में अब विष्णु सर्वोपरि एवं उपकारक देव की भूमिका में है, और वेदोक्त इन्द्रादि देव गौणत्व की भूमिका पर उतर आते है, और ‘उपकार्य’ की कोटि में चले जाते है ।।
(7)
व्यासने विष्णु की सर्वोपरिता प्रस्थापित करने के बाद इन्द्रादि वैदिक देवातासृष्टि का तिरोधान भी करने का उपक्रम श्रीमद्भागवत के दशम स्कन्ध में रखा है । पहले (बिन्दु क्रमांक 3 में) कहा गया है कि व्यासने वेदोक्त विष्णु और महाभारत-कालीन श्रीकृष्ण का समाहार करके पुराणों में ‘चतुर्भुज विष्णु’ का नवसर्जन- नवकल्पन- कर लिया है । अतः अब दशम स्कन्ध में श्रीकृष्ण जब अपने पिता नन्दजी से प्रस्ताव रखते है इन्द्रमख(यज्ञ) बंध रखा जाय, और उसके स्थान पर गोवर्धन पर्वत की पूजा की जाय, तब यह बात अत्यंत स्पष्ट हो जाती है कि पुराणकारों ने वेदोक्त इन्द्र देवता की सर्वोपरिता छीन कर चतुर्भुज विष्णु को दी है, तथा इन्द्रादि वैदिक देवों की वासुदेवाश्रितता बतानी शुरू कर दी है ।
दशम स्कन्ध में वर्णित इन्द्रमखभंग प्रसंग में श्रीकृष्ण के मुख में रखे गये शब्दों को देखा जाय तो—
इन्द्राय मन्युं जनयन् पितरं प्राह केशवः ।
कर्मणा जायते जन्तुः कर्मणैव विलीयते।।
सुखं दुःखं भयं क्षेम कर्मणैवाभिपद्यते ।। 10-24-12,13
रजसा चोदिता मेघा वर्षयन्त्यम्बूनि सर्वतः ।
प्रजास्तैरेव सिद्ध्यन्ति, महेन्द्रः किं करिष्यति ।। 10-24-23
कर्म के सिद्धान्त को एवं सत्त्व-रजसादि के सांख्योक्त सिद्धान्त को पुरस्कृत करके श्रीकृष्ण ने, इन्द्र की “वृष्टि के देवता” के रूप में जो प्रतिष्ठा थी वह छीन ली है । इन्द्रमखभंग प्रसंग इसका प्रतीक है । व्यास ने श्री कृष्णचरित के द्वारा वैदिक देवतासृष्टि का तिरोधान कर दिया ।
तथा दूसरी ओर से, कलियनाग दमन का प्रसंग चित्रण करके इन्द्रविषयक एक वेदोक्त पुराकथा का स्थानान्तरण भी कर दिया है । वेदों में कहा गया है हि इन्द्र ने ‘अहि’ (एक सर्प) को मार कर पानी को बहाया । विष्णु के अवतार स्वरूप श्रीकृष्ण ने भी यमुना के जल में प्रविष्ट हो कर कालियनाग का दमन किया । और यमुनाजल को विषमुक्त किया । अब वेदोक्त इन्द्र देव श्रीविष्णु(एवं श्रीकृष्ण) के सामने सर्वथा निस्तेज हो गये है ।।
(8)
इन्द्र-अहि की वेदोक्त पुराकथा का स्थानान्तरण (Displacement) करके श्रीकृष्ण-कालिदमन की पुराकथा का नवसर्जन व्यासने किया है—ऐसा जब कहते है तब इसी पुराकथा से सम्बद्ध एक दूसरे पहलु की भी बात करनी चाहिए—
महाकवि कालिदासने ‘रघुवंश’ (6-49) में कहा है कि-
त्रातेन तार्क्ष्यात् किल कालियेन
मणिं विसृष्टं यमुनौकसा यः ।
वक्षःस्थल-व्यापिरुचं दधानः
सकौस्तुभं ह्रेपयतीव कृष्णम् ।।
इस श्लोक में, कालिदास के समय में प्रचलित पुराकथा का निर्देश है – यहाँ ऐसा कहा गया है कि कालियनाग को श्रीकृष्ण ने गरुड के त्रास से मुक्त किया, इस समय कालियनाग ने अपने मस्तक से उतार कर श्री कृष्ण को कौस्तुभ मणि दिया था ।
परन्तु कालिदास के समय में प्रचलित उपर्युक्त पुराकथा पुराणकार व्यास के हाथ में सर्वथा बदल दी गई है, श्रीद्भागवत में तो कहा गया है कि कौस्तुभ मणि की प्राप्ति तो समुद्रमंथन के समय हुई थी । चतुर्भुज विष्णु के वक्षःस्थल पर कौस्तुभमणि शोभायमान हो रहा है । पुराणकाल में प्रचलित हुई ऐसी नवीन मिथक का कारण यही हो सकता है कि विष्णु के हाथ में रहा सुदर्शनचक्र जैसे ‘सूर्य देवता है’ ईस बात का द्योतक बन जाता है, उसी तरह से यह कौस्तुभ मणि भी विष्णु के ‘सूर्य’ होने का प्रतीक है ।
(9)
महाभारतोक्त अवतारवाद के आधार पर जब श्रीमद्भागवत पुराण में चतुर्भुज विष्णु के अवतार के रूप में वासुदेव श्रीकृष्ण को प्रस्थापित किया जाता है, तब वेदोक्त सूर्यात्मा स्वरूप विष्णु का श्रीकृष्ण के साथ पूरा अभेद भी प्रस्थापित किया जाता है । तद्यथा- 1. श्रीकृष्ण गायों से परिवेष्टित है, गोपाल है—ऐसा कहने का तात्पर्य यही है कि अनेकार्थक ‘गो’ शब्द का एक अर्थ सूर्यकिरण भी है । अतः श्रीकृष्ण का गो-परिवेष्टित होना सूर्य का प्रत्यायक भी बनता है । 2.सूर्यकिरण में सात रंगो का समाहार है, इस सत्य को ध्यान में रखते हुए, पुराणकार ने श्रीकृष्ण को भी मयूरपिच्छधारी बनाया है । 3.सूर्यरश्मि का रंग पीत होता है, और दूसरी ओर श्रीकृष्ण भी पीताम्बरधारी है ऐसा देख कर यह बात भी समझ में आती है कि पुराणकार व्यास वासुदेव श्रीकृष्ण का वेदोक्त सूर्यात्मा स्वरूप विष्णु के साथ अभेद प्रस्थापित करना चाहते है ।
श्रीकृष्ण सूर्यात्मा स्वरूप विष्णु ही है- इस बात का साद्यन्त निर्वहण करने के लिए पुराणकार व्यासने श्रीकृष्ण के देहोत्सर्ग की भूमि भी भारत के पश्चिमभाग में समुद्रतटस्थित प्रभासपाटण-तीर्थ बताई है । इस तीर्थ स्थान से ही सूर्य कि अन्तिम किरण समुद्रमे जाती है ऐसा स्कन्दपुराण में कहा गया है । इस भागवत के आरंभ में (द्वितीयाध्याय में) ही जो कहा था कि “वासुदेवपरा वेदाः” वेद याने वैदिक देवतासृष्टि वासुदेव श्रीकृष्णाश्रित है—ऐसा बताना श्रीमद्भागवत पुराण ही रचना का एक प्रयोजन है । वह विचार सुचारु रूप से सिद्ध किया गया है ।
(10)
सृष्टिविद्या के सन्दर्भ में पौराणिकी दृष्टि की यदि विचारणा की जाय तो वाक्यपदीयकार भर्तृहरि का स्मरण करना उपयुक्त रहेगा । व्याकरण की प्रशंसा करते हुए उन्होंने कहा है कि—
यत्तत् पुण्यतमं ज्योतिस्तस्य मार्गोsयमाञ्जसः । (वा. 1 /12 )
इस कारिका की स्वोपज्ञ टीका में भर्तृहरिने लिखा है कि– त्रीणि ज्योतिंषी, त्रयः प्रकाशाः । अर्थात् इस ब्रह्माण्ड में तीन ज्योतियाँ है, जिसके तीन तरह के प्रकाश है । तद्यथा 1.सूर्य 2.आत्मा और 3.शब्दब्रह्म ।। इन तीनों ज्योतिओं में तारतम्य भी है । इस ब्रह्माण्ड में यदि किसी भी तरह की जीवसृष्टि का प्रादुर्भाव करना है तो सब से पहले सूर्यरूप ज्योति की जरूरत है । लेकिन ब्रह्माण्ड में आत्मत्त्व रूप ज्योति/ चैतन्य स्वरूप ज्योति नहीं होगी तो सृष्टि के विस्तार की कोई गुंजायश नहीं है । अतः यह आत्मतत्त्व को पुण्यतर ज्योति कही जायेगी । और शब्दब्रह्मरूप तीसरी ज्योति न होने पर मनुष्यसृष्टि पशुसृष्टि में परिवर्तित हो जाती है । अतः शब्द रूप ज्योति को पुण्यतम ज्योति कही है ।।
इन त्रिविध ज्योतिओं में से वैयाकरणों ने शब्दब्रह्म रुप तीसरी ज्योति की उपासना की है । जो वेदान्ती दार्शनिक है, वे आत्मतत्त्व रूप दूसरी ज्योति की विचारणा करते है । परन्तु पौराणिक दृष्टि से तो सूर्य-विष्णु-रूप प्रथम ज्योति ही आराध्य है, क्योंकि सृष्टिविद्या का वह मूल है । और इसी प्राथमिक ज्योति की वर्णना में ही भागवतपुराण के रचनाकार व्यास साद्यन्त रममाण है । वेदोक्त विष्णु जो सूर्यात्मक है, उसी की पुराकथाओं का उपबृंहण करते हुए व्यास, अन्य इन्द्रादि देवों की पुराकथाओं का स्थानान्तरण, रूपान्तरणादि करते हुए ‘चतुर्भुज विष्णु’ की अपूर्व कल्पना का निर्माण भी करते है । तथा वासुदेव श्रीकृष्ण के साथ विष्णु का अभेद बताते हुए सूर्यात्मक ज्योति की विचारधारा अक्षुण्ण बनाये रखते है- यह रोमांचकारी हकीकत है ।।
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः ।।
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वसन्तकुमार म. भट्ट
निदेशक, भाषासाहित्यभवन,गुजरात विश्वविद्यालय,
अहमदाबाद-380 009
bhattvasant@yahoo.co.in
(1)
यह सुविदित है कि मन्त्रसंहिताओं में अग्नि, इन्द्र, वरुण, यम, प्रजापति, मरुदादि बहुविध देवताओं की स्तुतियाँ प्रस्तुत है । इन सभी देवताओं के द्वारा ही इस सृष्टि का आविर्भाव हुआ है, और उसका सञ्चालन भी इन के द्वारा होता है । प्रस्तुत आलेख में वैदिक-देवतासृष्टि का पुराणकाल में कैसे क्रमशः तिरोधान होता जाता है, यह बताने की कोशिश की है । विशेष रूपसे श्रीमद्भागवत पुराण को लेकर उस में इन्द्र देवता का वेदोक्त प्रधानभाव कैसे गौणत्व को प्राप्त करके, अन्ततोगत्वा सम्पूर्ण तिरोहित हो जाता है- इस की सोदाहरण चर्चा करनी अपेक्षित है ।
हम जानते है कि वेदसाहित्य में इन्द्रदेवता का प्राधान्य सर्वोपरि है, ओर इस देवता का वृत्रासुर के साथ बार बार युद्ध होता है । और इन्द्र की विजय होती है । इस युद्ध में कदाचित् इन्द्र को मरुद्गण की या विष्णु की साहाय्य भी मिलती है । वैदिक पुराकथाओं में यह बात भी कही जाती है कि वैदिक देवगण आदितः अजर एवं अमर नहीं थे । लेकिन कालान्तर में उन्होंने तप या सोमपान से अमरत्व प्राप्त किया था । तत्पश्चाद् उपनिषत्काल में इन्हीं इन्द्रादि देवों का सर्वोपरित्व या स्वामित्व अमान्य भी किया गया है । केनोनिषद् में सर्वोपरि सत्ता के रूप में ‘ब्रह्मन्’ तत्त्व को प्रस्थापित किया गया है ।।
इन वेदोक्त पुराकथाओं (Myths) का विविध पुराणों में, उपबृंहण करने के साथ साथ स्थानान्तरण, रूपान्तरणादि करते करते, वेदोक्त सृष्टिविद्या के मूलभूत तत्त्वों का संरक्षण करते हुए बादरायण व्यास ने अपनी निजी पौराणिक दृष्टि से एक अद्वितीय पुराणसाहित्य का निर्माण किया है ।।
श्रीमद्भागवत महापुराण के आरम्भ में ही व्यासने प्रस्तुत पुराण रचना का प्रयोजन उद्घोषित करते हुए लिखा है कि –
वासुदेवे भगवति भक्तियोगः प्रयोजितः ।
जनयत्याशु वैराग्यं ज्ञानं च यद् अहैतुकम् ।। 1-2-7
वासुदेवपरा वेदा, वासुदेवपरा मखाः ।
वासुदेवपरा योगा, वासुदेवपराः क्रियाः ।। 1-2-28
वासुदेवपरं ज्ञानं वासुदेवपरं तपः ।
वासुदेवपरो धर्मो वासुदेवपरा गतिः ।। 1-2-29
इन श्लोकों से मालुम होता है कि श्रीमद्भगवतपुराण में भगवान् वासुदेव के प्रति जो भक्तियोग होना चाहिए उसका निरूपण केन्द्रीभूत विषय है । और इस भक्तियोग को उद्भासित करने के लिए वेदवर्णित देवतासृष्टि को भी वासुदेवाश्रित चित्रित की गई है ।
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भगवान् विष्णु के अवतार स्वरूप वासुदेव श्रीकृष्ण पर आश्रित वैदिक देवतासृष्टि का चित्र देखने से पहेले, हम ऋग्वेद स्थित विष्णु-देवता विषयक पुराकथा का संक्षेप में अभ्यास कर लेंगे । ऋग्वेद में द्युस्थानीय देवताओं में – सविता, पूषन्, अर्यमन्, आदित्य, उषस् आदि का समावेश होता है, जिसमें विष्णु का भी समावेश है । यहाँ विष्णुसूक्तों की संख्या चार-पाँच से अधिक नहीं है । इनमें से दीर्घतमस् ऋषि के जो सूक्त है, उसमें विष्णु के लिए उरुक्रम, उरुगाय, त्रिविक्रम, युवा, बृहच्छरीर, अकुमार जैसे विशेषणों का प्रयोग किया गया है । दूसरी और सप्तम मण्डल में वसिष्ठ ऋषिने विष्णु के लिए ‘शिपिविष्ट’ तथा ‘निषिक्तपा’ – इन दो विशेषणों का ध्यानास्पद प्रयोग किया है । यद्यपि यह बात एकदम स्पष्ट है कि ऋग्वेद में वर्णित विष्णुदेवता द्युस्थानीय है और वह सूर्यदेवता ही है । परन्तु पुराणकार व्यासजीने विष्णु के लिए प्रयुक्त पूर्वोक्त विशेषणों का श्रीमद्भागवत-महापुराण में बडे रोचक स्वरूप में उपबृंहण किया गया है ।
‘विष्णु’ शब्द का निर्वचन करते हुए आचार्य यास्क ने लिखा है कि- यद् विषितो भवति, तद् विष्णुर्भवति । विष्णुर्विषतेर्वा, व्याप्नोतेर्वा, तस्यैषा (ऋक्) भवति । (निरुक्त, अ-12) इस पर दुर्गने कहा है कि – विषितो व्याप्तोડयमेव सूर्यो रश्मिभिः भवति तदा विष्णुः भवति । अर्थात् व्यापनशील सूर्य के लिए ‘विष्णु’ शब्द का प्रयोग होना यथार्थ है।
वेदों में इस विष्णु को ‘त्रिविक्रम’ कहा है । इस वेदोक्त पुराकथा का उपबृंहण करके वामन आख्यान की भागवतपुराण में रचना की गई है ।
इसी तरह से ‘विष्णु’ , जो कि सविता देव का ही पर्याय है, उसके लिए वसिष्ठने “शिपिविष्ट” शब्द का प्रयोग किया है । यह विशेषण सूर्यरश्मिओं को ध्यान में रखते हुए प्रयुक्त हुआ है । सूर्य अपनी किरणों रूपी शिपि से पृथिवी में प्रवेशता है, और बीजों को अंकुरित करता है । और यदि ‘विष्णु’ (पृथिवी में) गर्भाधान करनेवाला हो तो, वसिष्ठ की दृष्टि में वह विष्णु ‘निषिक्तपा’ (ऋ 7-36-4) भी होना चाहिए । अर्थात् गर्भाधान करनेवाले विष्णु ही गर्भ के (निषिक्त रेतस् के) संरक्षक भी बने ।। इन दो विशेषणों द्वारा जो वेदोक्त पुराकल्पन (Myth) प्रस्तुत हुई थी, उसका उपबृंहण करते हुए व्यासजीने षष्ठस्कन्ध में मरुद्गण की उत्पत्ति वर्णित की है, और दशम स्कन्ध में वसुदेव-देवकी के सात गर्भों की हत्या करनेवाले कंस का संहार करनेवाले श्रीकृष्ण को विष्णु के अवतार कहे है । वेदोक्त “निषिक्तपा” शब्द का चारितार्थ्य बताने के लिए ही व्यासने देवकी के अष्टमगर्भ के रूप में श्रीकृष्ण का जन्म वर्णित किया है ।।
(3)
वैदिक पुराकथाओं का उपबृंहण करने के साथ साथ व्यासने ‘विष्णु’ विषयक एक नवीन पुराकल्पन का भी सर्जन कर लिया है । भारतीय परम्परागत मान्यता के अनुसार व्यासने मन्त्रों का संहिताकरण कर लेने के बाद ‘महाभारत’ की रचना की थी । इस महाभारत में ऐतिहासिक कृष्ण का चरित भी उन्होंने वर्णित किया था । अतः वे जब पुराणों की रचना करते है तब वेदोक्त ‘विष्णु देवता’ और महाभारतोक्त ‘श्रीकृष्ण’ का समाहार करके एक नवीन “चतुर्भुज विष्णु” का नवसर्जन भी करते है ।
‘चतुर्भुज विष्णु’ की जो परिकल्पना पुराणों में वर्णित है, वह शङ्ख-चक्र-गदा-पद्मधारी विष्णु है, यह सर्वविदित है । परन्तु ध्यान दे कर सोचा जाय तो पुराणकाल के विष्णु के दो हाथों में जो 1.सुदर्शन चक्र एवं 2. पद्म है- वह दोनों वेदकालीन सूर्यदेवता के द्योतक प्रतीक है । तथा अन्य दो हाथों में जो 3.गदा एवं 4.खङ्ख रखे गये है, वे दोनों महाभारतकालीन श्रीकृष्ण के प्रत्यायक है । महाभारत के भीष्मपर्व में (श्रीमद्भगवद्गीता में) अवतारवाद का शङ्ख फूंकते हुए श्रीकृष्ण ने कहा है कि-
परित्राणाय साधूनाम् विनाशाय च दुष्कृताम् ।
धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे ।।
इस से साधुपरित्राण और दुष्टों के विनाश के लिए विष्णु के हाथ में गदा स्थापित की गई है, तथा “संभवामि युगे युगे” का वादा देने के लिए एक अन्य हाथ में शङ्ख रखा गया है । इस तरह से, व्यासने वेदकालीन विष्णु(सूर्य) और महाभारतकालीन श्रीकृष्ण को एकत्र मिला कर ‘चतुर्भुज विष्णु’ की अपूर्व कल्पना का निर्माण किया है ।। अर्थात् पुराणों में भी, व्यास के द्वारा सृष्टिविद्या की केन्द्रभूत वेदोक्त सूर्योपासना नवीन स्वरूप में प्रवाहित की गई है ।
(4)
व्यासजी के हाथों से वेदोक्त पुराकथाओं का उपबृंहण और नवसर्जन होने के साथ साथ अन्य वैदिक देवतासृष्टि का कैसे क्रमिक विसर्जन भी हुआ है यह भी रसप्रद ज्ञातव्य विषय है । परन्तु वैदिक देवताओं का विसर्जन देखने से पहेले, व्यासने वेदों में वर्णित इन्द्र देव की प्रधानता एवं सर्वोपरिता का जो स्थानान्तरण किया है वह भी द्रष्टव्य है – ऋग्वेद में 33 या उससे भी अधिक देवताओं की स्तुति की गई है । परन्तु सब से अधिक 250 सूक्तों में जिसकी स्तुति की गई है वह देवता है इन्द्र । गृत्समद् ऋषि के ‘स जनास इन्द्रः’ (2-12) सूक्त को देखने से मालुम होता है कि देवों में सर्वोपरि देव ‘इन्द्र’ ही है । तथा इस इन्द्र के सहायक-देवों में विष्णु (उपेन्द्र) एवं मरुद्गण आते है । परन्तु पुराणकार व्यास के हाथों से यह इन्द्र एवं विष्णु का प्रधान-गौणभाव स्थानान्तरित हो जाता है । जैसा कि – श्रीमद्भागवत महापुराण के अष्टमस्कन्ध को देखने से मालुम होता है कि इन्द्रादि देवों ने जब बृहस्पति की अनुपस्थिति में विश्वरूप का सहारा लिया तो उसने देवों को ‘नारायणकवच’ का उपदेश दिया । तदनन्तर शङ्खचक्रगदाधर नारायण प्रकट हो कर वृत्रासुर को मारने के लिए दधीचि के गात्रों ले आने की सलाह देते है । जिससे ‘वज्र’ बनवा कर इन्द्रने वृत्रासुर कि दो भुजायें काट ली । तब वृत्र ऐरावत हस्ती सहित इन्द्र को निगल जाता है । परन्तु मायावी इन्द्र ‘नारायण-कवच’ की रक्षा से सुरक्षित रहा, और वृत्र का उदर फाड कर बहार नीकल जाता है । तब फिर से भीषण युद्ध होता है । यहाँ पर वृत्रासुर मरने से पहेले जो कहता है, वह ध्यातव्य है-
नन्वेष वज्रस्तव शक्र तेजसा हरेर्दधीचेस्तपसा च तेजितः ।
तेनैव शत्रुं जहि विष्णुयन्त्रितो, यतो हरिर्विजयः श्रीर्गुणास्ततः ।। (भा.पु. 6-11-20)
वृत्र- “हे इन्द्र ! तेरे इस वज्र में श्रीहरि का तेज है, और दधीचि का तप है, और तुम विष्णु से संचालित है, अतः तुम मुझे मार सकते हो । जहाँ श्रीहरि होते है वहीं पर विजय, श्री और सभी गुण होते है ।” इन्द्रने वृत्रासुर का वध तो किया, परन्तु अब ब्रह्म-हत्या का पाप इन्द्र को सताता है । इन्द्र भाग कर मानस सरोवर की एक कमलनाल में प्रविष्ट हो जाता है । वहाँ पर हजारों वर्षो तक कमल-विहारिणी लक्ष्मी ने ( अर्थात् विष्णुपत्नीने ) इन्द्र का रक्षण किया । इस तरह वृत्रासुरवध-प्रसङ्ग में भी व्यासजी के द्वारा बार बार इन्द्र कि रक्षा विष्णु के अधीन है यह बताया गया है ।।
(5)
दितिने अपने ‘हिरण्याक्ष’ एवं ‘हिरण्यकशिपु’ नामक दो पुत्रों की हत्या हो जाने के बाद कश्यप की सेवा करके ‘इन्द्रहन्ता’ एवं ‘अमृत्यु’ पुत्र का वरदान माँगा । कश्यपने अदिति के पुत्र इन्द्र की भी रक्षा का विचार मन में रखते हुए, दिति को ‘पुंसवन वैष्णवी-व्रत’ का उपदेश दिया ।
अब इन्द्र इस वैष्णवव्रत अमोघ फल-प्रदाता है, ऐसा जान कर छद्म वेष से दिति का दास बन के रहता है । संवत्सर पर्यन्त चलनेवाले इस व्रत में कदाचित् क्षति होने के इन्तजार में इन्द्र बैठा था । एकदा दिति ने उच्छिष्ट मूँह रखा था, तब शयन किया । इन्द्र उसी समय दिति के उदर में जा कर गर्भ को सात टुकडों में काट देता है । परन्तु गर्भस्थ शिशु वैषणव-व्रत के कारण सुरक्षित थे, वे मरे नहीं । और रोने लगे । इन्द्र ने “मा रोदीः ।” कह कर फिर प्रत्येक टूकडों को सात-सात करके उनपचास (49) टूकडें कर दिये । फिर भी वे नहीं मरे, तब इन्द्र ने उसको अपने बान्धव के रूप में स्वीकार कर लिया ।
यहाँ कश्यप ने दिति को जो वरदान दिया था, उसके शब्द ध्यातव्य है-
पुत्रस्ते भविता भद्रे इन्द्रहाડदेवबान्धवाः ।
संवत्सरं व्रतमिदं यद्यञ्जो धारयिष्यसि ।।
इस श्लोक पर श्रीधर ने मर्मोद्घाटन करते हुए लिखा है कि- वैष्णवं व्रतं तावदुपद्देक्ष्यामि तेनैव अस्याः शुद्धचित्ताया इन्द्रं प्रति क्रोधो निवर्तिष्यते, पुत्रस्त्वमर्त्यो भविष्यति, दीर्घकालत्वे च व्रतस्य कथंचिद् वैगुण्ये सतीन्द्रस्य वधोડपि न भविष्यतीति ।।
दिति के (मरुद्) पुत्र भी अमर्त्य बनेंगे, तथा व्रत में वैगुण्य पैदा होने पर इन्द्र का भी वध नहीं होगा ।। - इस तरह से मरुद्गण की उत्पत्तिकथा सूनानें में भी व्यास ने वैदिकदेवता इन्द्र की रक्षा वैष्णवव्रत पर आधृत है यह सूक्ष्म बात प्रदर्शित की है ।
(6)
भागवत के षष्ठ स्कन्ध में जहाँ जहाँ वैदिक देवों की विष्णु-आश्रितता प्रदर्शित है, ( जैसे कि- दधीचि की हड्डी से बने वज्र में विष्णु का तेज, नारायण कवच की रक्षा, कमल-विहारिणी लक्ष्मी का शरण और पुंसवन वैष्णव-व्रत ) वहाँ विष्णु की परोक्ष साहाय्य वर्णित है । तथा वेदवर्णित इन्द्र का सर्वोपरित्व अब छीन लिया गया है, और वह विष्णु पर स्थानान्तरित होता जा रहा है ।
अब अष्टम स्कन्ध में इन्द्र की विष्णु-आश्रितता में और बाढ आती है । क्योंकि असुरों से परास्त होता हुआ इन्द्र अब बार-बार विष्णु की प्रत्यक्ष साहाय्य पर जीने लगा है- ऐसा वर्णन व्यासने प्रस्तुत किया है -
एकबार असुरों ने स्वर्गलोक पर आक्रमण किया, तब देवों के प्राण नीकल गये, वे गिर पडे । इन्द्र-वरुणादि निस्तेज हो कर भगवान् अजित की शरण में गयें । उसने इनको समुद्रमंथन के लिए प्रोत्साहित किये । भगवान् विष्णु ने मन्दराचल को उठा कर समुद्र में रखा और स्वयं कच्छप रूप धारण करके मन्दराचल की आधारशिला बने । वासुकिनाग में अपनी शक्ति का संचार भी किया । और अन्त में अमृतकुंभ नीकलने पर ‘मोहिनी’ रूप धारण करके देवोंको अमृत-पान करवाया । यहाँ विष्णु की प्रत्यक्ष साहाय्य से देवों को अमरत्व प्राप्त हुआ ऐसा वर्णन है । अब इन्द्र-विष्णु का वेदोक्त प्रधान-गौणभाव बदल जाता है । विष्णु की सर्वोपरिता एवं प्राधान्य दोनों उद्घाटित होते जाते है ।।
* * *
वञ्चित हुए असुरों ने स्वर्ग में फिर से आक्रमण किया । बलि ने विश्वजयी यज्ञ किया । तब इन्द्रादि देवगण स्वर्ग से भ्रष्ट होने की भीति से आतंकित था । तब अदितिने पयोव्रत का पालन किया और विष्णु अवतार स्वरूप वामन का प्राकट्य होता है । वेदोक्त विष्णु की ‘त्रिविक्रम’ होने की कथा का उपबृंहण करके व्यासने वामन के विराट होने की नयी पुराकथा हमारे सामने प्रस्तुत की । इन्द्रादि देवों को फिर से विष्णु की प्रत्यक्ष साहाय्य से ही त्रिविष्टप वापस मिला । पुराणों में अब विष्णु सर्वोपरि एवं उपकारक देव की भूमिका में है, और वेदोक्त इन्द्रादि देव गौणत्व की भूमिका पर उतर आते है, और ‘उपकार्य’ की कोटि में चले जाते है ।।
(7)
व्यासने विष्णु की सर्वोपरिता प्रस्थापित करने के बाद इन्द्रादि वैदिक देवातासृष्टि का तिरोधान भी करने का उपक्रम श्रीमद्भागवत के दशम स्कन्ध में रखा है । पहले (बिन्दु क्रमांक 3 में) कहा गया है कि व्यासने वेदोक्त विष्णु और महाभारत-कालीन श्रीकृष्ण का समाहार करके पुराणों में ‘चतुर्भुज विष्णु’ का नवसर्जन- नवकल्पन- कर लिया है । अतः अब दशम स्कन्ध में श्रीकृष्ण जब अपने पिता नन्दजी से प्रस्ताव रखते है इन्द्रमख(यज्ञ) बंध रखा जाय, और उसके स्थान पर गोवर्धन पर्वत की पूजा की जाय, तब यह बात अत्यंत स्पष्ट हो जाती है कि पुराणकारों ने वेदोक्त इन्द्र देवता की सर्वोपरिता छीन कर चतुर्भुज विष्णु को दी है, तथा इन्द्रादि वैदिक देवों की वासुदेवाश्रितता बतानी शुरू कर दी है ।
दशम स्कन्ध में वर्णित इन्द्रमखभंग प्रसंग में श्रीकृष्ण के मुख में रखे गये शब्दों को देखा जाय तो—
इन्द्राय मन्युं जनयन् पितरं प्राह केशवः ।
कर्मणा जायते जन्तुः कर्मणैव विलीयते।।
सुखं दुःखं भयं क्षेम कर्मणैवाभिपद्यते ।। 10-24-12,13
रजसा चोदिता मेघा वर्षयन्त्यम्बूनि सर्वतः ।
प्रजास्तैरेव सिद्ध्यन्ति, महेन्द्रः किं करिष्यति ।। 10-24-23
कर्म के सिद्धान्त को एवं सत्त्व-रजसादि के सांख्योक्त सिद्धान्त को पुरस्कृत करके श्रीकृष्ण ने, इन्द्र की “वृष्टि के देवता” के रूप में जो प्रतिष्ठा थी वह छीन ली है । इन्द्रमखभंग प्रसंग इसका प्रतीक है । व्यास ने श्री कृष्णचरित के द्वारा वैदिक देवतासृष्टि का तिरोधान कर दिया ।
तथा दूसरी ओर से, कलियनाग दमन का प्रसंग चित्रण करके इन्द्रविषयक एक वेदोक्त पुराकथा का स्थानान्तरण भी कर दिया है । वेदों में कहा गया है हि इन्द्र ने ‘अहि’ (एक सर्प) को मार कर पानी को बहाया । विष्णु के अवतार स्वरूप श्रीकृष्ण ने भी यमुना के जल में प्रविष्ट हो कर कालियनाग का दमन किया । और यमुनाजल को विषमुक्त किया । अब वेदोक्त इन्द्र देव श्रीविष्णु(एवं श्रीकृष्ण) के सामने सर्वथा निस्तेज हो गये है ।।
(8)
इन्द्र-अहि की वेदोक्त पुराकथा का स्थानान्तरण (Displacement) करके श्रीकृष्ण-कालिदमन की पुराकथा का नवसर्जन व्यासने किया है—ऐसा जब कहते है तब इसी पुराकथा से सम्बद्ध एक दूसरे पहलु की भी बात करनी चाहिए—
महाकवि कालिदासने ‘रघुवंश’ (6-49) में कहा है कि-
त्रातेन तार्क्ष्यात् किल कालियेन
मणिं विसृष्टं यमुनौकसा यः ।
वक्षःस्थल-व्यापिरुचं दधानः
सकौस्तुभं ह्रेपयतीव कृष्णम् ।।
इस श्लोक में, कालिदास के समय में प्रचलित पुराकथा का निर्देश है – यहाँ ऐसा कहा गया है कि कालियनाग को श्रीकृष्ण ने गरुड के त्रास से मुक्त किया, इस समय कालियनाग ने अपने मस्तक से उतार कर श्री कृष्ण को कौस्तुभ मणि दिया था ।
परन्तु कालिदास के समय में प्रचलित उपर्युक्त पुराकथा पुराणकार व्यास के हाथ में सर्वथा बदल दी गई है, श्रीद्भागवत में तो कहा गया है कि कौस्तुभ मणि की प्राप्ति तो समुद्रमंथन के समय हुई थी । चतुर्भुज विष्णु के वक्षःस्थल पर कौस्तुभमणि शोभायमान हो रहा है । पुराणकाल में प्रचलित हुई ऐसी नवीन मिथक का कारण यही हो सकता है कि विष्णु के हाथ में रहा सुदर्शनचक्र जैसे ‘सूर्य देवता है’ ईस बात का द्योतक बन जाता है, उसी तरह से यह कौस्तुभ मणि भी विष्णु के ‘सूर्य’ होने का प्रतीक है ।
(9)
महाभारतोक्त अवतारवाद के आधार पर जब श्रीमद्भागवत पुराण में चतुर्भुज विष्णु के अवतार के रूप में वासुदेव श्रीकृष्ण को प्रस्थापित किया जाता है, तब वेदोक्त सूर्यात्मा स्वरूप विष्णु का श्रीकृष्ण के साथ पूरा अभेद भी प्रस्थापित किया जाता है । तद्यथा- 1. श्रीकृष्ण गायों से परिवेष्टित है, गोपाल है—ऐसा कहने का तात्पर्य यही है कि अनेकार्थक ‘गो’ शब्द का एक अर्थ सूर्यकिरण भी है । अतः श्रीकृष्ण का गो-परिवेष्टित होना सूर्य का प्रत्यायक भी बनता है । 2.सूर्यकिरण में सात रंगो का समाहार है, इस सत्य को ध्यान में रखते हुए, पुराणकार ने श्रीकृष्ण को भी मयूरपिच्छधारी बनाया है । 3.सूर्यरश्मि का रंग पीत होता है, और दूसरी ओर श्रीकृष्ण भी पीताम्बरधारी है ऐसा देख कर यह बात भी समझ में आती है कि पुराणकार व्यास वासुदेव श्रीकृष्ण का वेदोक्त सूर्यात्मा स्वरूप विष्णु के साथ अभेद प्रस्थापित करना चाहते है ।
श्रीकृष्ण सूर्यात्मा स्वरूप विष्णु ही है- इस बात का साद्यन्त निर्वहण करने के लिए पुराणकार व्यासने श्रीकृष्ण के देहोत्सर्ग की भूमि भी भारत के पश्चिमभाग में समुद्रतटस्थित प्रभासपाटण-तीर्थ बताई है । इस तीर्थ स्थान से ही सूर्य कि अन्तिम किरण समुद्रमे जाती है ऐसा स्कन्दपुराण में कहा गया है । इस भागवत के आरंभ में (द्वितीयाध्याय में) ही जो कहा था कि “वासुदेवपरा वेदाः” वेद याने वैदिक देवतासृष्टि वासुदेव श्रीकृष्णाश्रित है—ऐसा बताना श्रीमद्भागवत पुराण ही रचना का एक प्रयोजन है । वह विचार सुचारु रूप से सिद्ध किया गया है ।
(10)
सृष्टिविद्या के सन्दर्भ में पौराणिकी दृष्टि की यदि विचारणा की जाय तो वाक्यपदीयकार भर्तृहरि का स्मरण करना उपयुक्त रहेगा । व्याकरण की प्रशंसा करते हुए उन्होंने कहा है कि—
यत्तत् पुण्यतमं ज्योतिस्तस्य मार्गोsयमाञ्जसः । (वा. 1 /12 )
इस कारिका की स्वोपज्ञ टीका में भर्तृहरिने लिखा है कि– त्रीणि ज्योतिंषी, त्रयः प्रकाशाः । अर्थात् इस ब्रह्माण्ड में तीन ज्योतियाँ है, जिसके तीन तरह के प्रकाश है । तद्यथा 1.सूर्य 2.आत्मा और 3.शब्दब्रह्म ।। इन तीनों ज्योतिओं में तारतम्य भी है । इस ब्रह्माण्ड में यदि किसी भी तरह की जीवसृष्टि का प्रादुर्भाव करना है तो सब से पहले सूर्यरूप ज्योति की जरूरत है । लेकिन ब्रह्माण्ड में आत्मत्त्व रूप ज्योति/ चैतन्य स्वरूप ज्योति नहीं होगी तो सृष्टि के विस्तार की कोई गुंजायश नहीं है । अतः यह आत्मतत्त्व को पुण्यतर ज्योति कही जायेगी । और शब्दब्रह्मरूप तीसरी ज्योति न होने पर मनुष्यसृष्टि पशुसृष्टि में परिवर्तित हो जाती है । अतः शब्द रूप ज्योति को पुण्यतम ज्योति कही है ।।
इन त्रिविध ज्योतिओं में से वैयाकरणों ने शब्दब्रह्म रुप तीसरी ज्योति की उपासना की है । जो वेदान्ती दार्शनिक है, वे आत्मतत्त्व रूप दूसरी ज्योति की विचारणा करते है । परन्तु पौराणिक दृष्टि से तो सूर्य-विष्णु-रूप प्रथम ज्योति ही आराध्य है, क्योंकि सृष्टिविद्या का वह मूल है । और इसी प्राथमिक ज्योति की वर्णना में ही भागवतपुराण के रचनाकार व्यास साद्यन्त रममाण है । वेदोक्त विष्णु जो सूर्यात्मक है, उसी की पुराकथाओं का उपबृंहण करते हुए व्यास, अन्य इन्द्रादि देवों की पुराकथाओं का स्थानान्तरण, रूपान्तरणादि करते हुए ‘चतुर्भुज विष्णु’ की अपूर्व कल्पना का निर्माण भी करते है । तथा वासुदेव श्रीकृष्ण के साथ विष्णु का अभेद बताते हुए सूर्यात्मक ज्योति की विचारधारा अक्षुण्ण बनाये रखते है- यह रोमांचकारी हकीकत है ।।
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः ।।
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मंगलवार, 15 दिसंबर 2009
हिन्दु धर्म में अहिंसा - एक अवलोकन
हिन्दु-धर्म में अहिंसा – एक अवलोकन
वसन्तकुमार म. भट्ट
निदेशक, भाषासाहित्यभवन, गुजरात विश्वविद्यालय,
अहमदावाद – 380009
www.vasantbhatt@blogspot.com
E-mail : bhattvasant@yahoo.co.in
हिन्दु-धर्म का इतिहास 5000 वर्षों से भी अधिक पुराना है । अतः हिन्दुधर्म में अहिंसा के विचार को लेकर कोई चिन्तन प्रस्तुत करना एक साहस ही सिद्ध हो सकता है । फिर भी, कुछ मुख्य एवं विशेष सीमा चिह्नरूप सन्दर्भों को लेकर, ब्राह्मण-संस्कृति के विस्तृत फलक पर विकसित हुये अहिंसा के विचार को परिमित शब्दों में कहने का प्रयास किया जाता हैः—
- 1 –
ब्राह्मण-संस्कृति में ऋग्वेद के मन्त्रों में वैसे तो प्राधान्येन विविध देवताओं की स्तुतियाँ आयी हुई है । लेकिन इन्द्र, अग्नि आदि देवों की स्तुतिओं के साथ साथ
“ पुमान् पुमांसम् परिपातु विश्वतः ” ( एक पुरुष दूसरे पुरुष का सभी तरह से रक्षण करे ), और “ वसुधैव कुटुम्बकम् ” के विचार भी वेदमन्त्रों में प्रस्तुत हुए है । एवमेव, ऐसे ही सर्वात्मभाव को बढावा देने के लिये, अर्थात् सब जीव एक है - इस विचार से “ यह मामकीन है और दूसरा व्यक्ति परकीय है” ऐसे भेदभाव को हटाने के लिये, वेदों में यह भी कहा गया है कि “ यत्र भवति विश्वम् एक-नीडम् । ” ( जहाँ सारा विश्व चीडियों का एक घोंसला बनके रहे ) । धार्मिक कट्टरता के कारण होनेवाली हिंसा पर लगाम डालने के लिये ऋग्वेद में “ एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति ” ( एक ही सत्य को बुद्धिमानों ने अनेक तरह से कहा है ) ऐसा भी स्पष्ट शब्दों में कहा गया है । इसका सूचितार्थ यही है कि ऋग्वेद में भले ही अहिंसा जैसे शब्द का सीधा प्रयोग नहीं दिखाई देता है, परन्तु किसी भी मनुष्य या पशु की हिंसा करने का तो नहीं कहा गया है - यह निश्चित है ।।
कालान्तर में जब यजुर्वेद की रचना हुई तब विविध प्रकार के यज्ञ-यागादि की स्पष्ट संकल्पनायें आविर्भूत हुई । जिसमें अनेक नित्य एवं नैमित्तिक यज्ञों का निरूपण हुआ और उसी परंपरा में अश्वमेध यागादि का विधान हुआ । जिससे पशु-बलि का कुरिवाज चल पडा । आदमी का कमजोर दिमाग पशुबलि से विरत तो हुआ नहीं, बल्कि नरमेध-याग की पराकाष्ठा तक पहुँचा । और वित्तैषणा, पुत्रैषणा एवं लोकैषणा से पीडित समाज ने यज्ञीय हिंसा हिंसा नहीं कहलाती, तथा यज्ञ के लिये मारे गये प्राणी को तो स्वर्ग ही मिलता है – ऐसा कपटी वाक्य भी प्रचार में रख दिया । ऋग्वेद एवं उपनिषदों के बीच में जो ब्राह्मण-ग्रन्थ लिखे गये, तथा बाद में जो पूर्वमीमांसा दर्शन विकसित हुआ उसमें ऐसी मान्यता ने स्थान लिया था । परन्तु ऋग्वेद की तरह उपनिषदों ने भी सर्वात्मभाव की ही बात पुकार के साथ कही थी और बहुविध उक्तिओं में उसे दोहराई थी । जीवात्मा और ब्रह्माण्ड की कोई भी हस्ती परस्पर से भिन्न नहीं है, सर्वत्र अभेद ही है, ऐसा कहनेवाले उपनिषदों का अद्वैतवाद तो शब्दान्तर से अहिंसा के विचार का ही सर्वथा दृढीकरण करनेवाला था – यह कहने की जरूरत नहीं है ।।
- 2 -
फिर भी, कुछ कालावधि तक प्रवर्तित ब्राह्मण-संस्कृति की यज्ञक्रियाओं में जो पशु-हिंसा हो रही थी उसको रोकने के लिये, भगवान् बुद्ध ने करुणा का उपदेश दिया और भगवान् महावीर ने अहिंसा का उपदेश दिया । ब्राह्मण-संस्कृति में सुधार लाने का श्रेयः निःशङ्क रूप से श्रमण-संस्कृति को जाता है । और, चूँकि ब्राह्मण-संस्कृति में एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति – का विचार पूर्वप्रस्थापित था ही, बुद्ध और महावीर की वाणी का स्वीकार करने में ब्राह्मण-संस्कृति को ज्यादा कठिनाई नहीं हुई ।
परन्तु महाभारत में भगवद्गीता के नाम से जो श्रीकृष्ण एवं अर्जुन का संवाद निरूपित हुआ है उस में, राष्ट्रधर्म के उद्देश को लक्षित करके युद्ध की अनिवार्यता को स्पष्ट रूप से स्वीकारा भी गया है । अर्जुन ने जब घोर हिंसा की सम्भावना देखी तो उसने युद्ध नहीं करने का और संन्यास लेने का ही सोचना शूरु किया । परन्तु युगपुरुष श्रीकृष्ण ने कहा की इन आततायी ( आतंकवादीओं ) कौरवों को तुं नहीं मारेगा तो, आज जो हाल एक द्रौपदी का हुआ है वही हाल समाज की अन्य स्त्रीओं का भी होगा । अधर्म का फैलावा होने पर समाज और राष्ट्र की सुरक्षा पर खतरा पैदा हो सकता है । अतः श्रीकृष्ण की दृष्टि में धर्मयुद्ध तो अनिवार्य है ही । वह कहते हैः- क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ, नैतत् त्वयि उपपद्यते । अर्थात् हे अर्जुन ! तुम नपुँसकता को धारण न करो, यह तुम्हें शोभा नहीं देता है । इस तरह भगवद्गीता में राष्ट्रधर्म प्रेरित हिंसा को मान्यता दी गई है ।।
परन्तु उसी भगवद्गीता में, वैदिक यज्ञों की निन्दा भी की गई है और यज्ञ की विभावना ही बदल दी गई है – यह भी नितान्त सत्य है । अब निर्दोष पशु के बलि को किसी भी रूप में मान्यता नहीं थी । युगपुरुष श्रीकृष्ण की नयी सोच में स्वार्पण एवं कृतज्ञता बुद्धि से किया हुआ कर्म ही यज्ञ था । एवं लोकसङ्ग्रह की मंगलकारिणी बुद्धि से और अनासक्तिपूर्वक किया हुआ कर्म यज्ञ था । सीता या द्रौपदी की तरह समाज की अन्य स्त्रियाँ भी संरक्षणीय है – यह सोचना एक तरह का लोकसङ्ग्रह ही था । ऐसे लोकसङ्ग्रह के उद्देश्य से किया हुआ कोई भी युद्ध हिंसक नहीं माना गया है । क्योंकि आततायीओं को नहीं मार कर जो हिंसा को टाली जाती है, उससे कहीं अधिक हिंसा उन लोगों को जीन्दा छोडने से होती है । अतः युगपुरुष श्रीकृष्ण की यह सोच साम्प्रत भारत में अतीव ध्यानार्ह एवं प्रस्तुत है ।।
- 3 -
भगवद्गीता में न केवल यज्ञ की विभावना ही बदली गई है, परन्तु उसमें सम्भवामि युगे युगे – जैसे शब्दों से जो अवतारवाद का शंख फूंका गया है, उसने भी हिन्दुस्तान में धार्मिक सहिष्णुता को बलिष्ठ बनायी है । यज्ञीय पशु-हिंसा की निन्दा करनेवाले बुद्ध को भी ब्राह्मण-संस्कृति ने, केशव धृतबुद्धशरीर....जय जगदीश हरे – ( गीतगोविन्द के ) इन शब्दों से भगवान् विष्णु के दश अवतारों में स्थान दिया है । कवि जयदेव के इन शब्दों को पुराणकारों ने भी सम्मान के साथ दृढीभूत कर दिया । एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति – तो वेदों में कहा ही गया था, इस लिये बुद्ध के करुणापूर्ण वचन ग्रहण करने में या महावीर के दयाप्रेरित जीव-अहिंसा के विचार को अपनाने में ब्राह्मण-संस्कृति को कोई बाधा ही नहीं थी ।
साथ में, अहिंसा के विचार पर तात्त्विक विचार करते हुये योगमहर्षि पतञ्जलि को अहिंसा में क्या बल है यह भी अनुभूत हो गया । उन्हों ने लिख दिया कि – अहिंसाप्रतिष्ठायाम् सर्व-प्राणिनाम् वैरत्यागः ( भवति ) ।। जो आदमी ने सम्पूर्णतया अहिंसा सिद्ध करली है उसकी ओर अन्य सभी प्राणी भी वैर का त्याग करके रहते है ।
इस तरह से, हिन्दुधर्म में वेदकाल से अन्य शब्दों में अभिव्यक्त हुआ अहिंसा का विचार, कुछ कालावधि में प्रकट शब्दों में बद्धमूल हो गया ।।
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धार्मिक ग्रन्थों के सन्दर्भों के अलावा संस्कृत-साहित्य में यदि दृष्टिपात् किया जाय तो भी हिन्दुधर्मियों में अहिंसा की भावना जिस रूप में प्रवहमान थी उसका अन्दाजा मिल जायेगा । सब से पहेले कविकुलगुरु कालिदास के द्वारा अभिज्ञानशाकुन्तल नाटक में मानव और प्रकृति का जो सम्बन्ध चित्रित किया गया है उसे ही देखना उपयुक्त रहेगा । कवि ने कहा है कि नायिका शकुन्तला को शरीर-सुशोभन करना पसंद था, परन्तु आश्रम के हरेक पौधे पर इनके मन में इतना स्नेह था कि वह एक पर्ण-पुष्प भी तोडती नहीं थी । वह अपनी सहेलियों से कहती है कि – अस्ति मम एतेषु सोदरस्नेहः । अर्थात् शकुन्तला को सभी वनस्पति के उपर सहोदर जैसा स्नेह था । और वन-उपवन में विचरण करनेवाले मृगों पर भी अपार दयाभाव था । जिसके कारण वह घास खाते समय मृगों के मुँह में लगे कण्टक के घाव को मिटाने के लिये उनके मुँह पर इङ्गुदीफल का तैल लगा देती थी । यह वह प्रकृति के सब सदस्य है जिसने शकुन्तला को जन्म से ले कर सुरक्षित रखी थी । माता मेनका ने तो शकुन्तला को जन्म दे कर ही जंगल में अनाथ छोड दी थी, परन्तु शकुन्तों ( पक्षिओं ) ने उसे पहेले दिन पाला था, इसी लिये वह शकुन्तला कहलाई थी । यहाँ महाकवि ने मानव और प्रकृति का अभिन्न सम्बन्ध दिखाया है । जो सारे विश्व भर के साहित्य में बेजोड है । अन्यत्र ( युरोपिय देशों में ) तो पृथिवी के केन्द्र में मानव है, और पूरी प्रकृति मानव के उपभोग के लिये है – ऐसी मान्यता प्रवर्तित की गई है । लेकिन भारतीय नायिका – शकुन्तला अपने सुशोभन के लिये भी एक पर्ण भी तोडना पसंद नहीं करती है, और वन के मृगों तक की देखभाल रखती है, क्योंकि वह प्रकृति को अपना अङ्ग ही समझती है । ऐसी माता शकुन्तला का पुत्र आगे चल कर एक बडा चक्रवर्ती राजा बनता है । इस पुत्र का नाम हैः- भरत । अर्थात् सब का भरण-पोषण करनेवाला । और इस भरत के नाम से यह देश भारत कहलाया । ( जो सब का भरण करनेवाला है, जो किसीका विनाश करना नहीं चाहता है । )
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इस प्रसंग में संस्कृत साहित्य का एक अप्रकट और अज्ञात चिन्तन भी बताना अत्यन्त आवश्यक है । इस अमर साहित्य में, आदिकवि वाल्मीकि के समय से ही एक शब्द बार बार प्रयुक्त होता रहा हैः- अनुक्रोश । जिसका अर्थ होता है – परदुःखदुःखिता । = दूसरे के दुःख को देख कर स्वयं दुःखी हो जाना । इस शब्द से व्यक्त होनेवाला जो अर्थ है वह करुणा और दया के बीच का है । करुणा और दया बडे महनीय मानव-धर्म है, परन्तु इस धर्म की ओर ले जानेवाला जो मानवीय तत्त्व है वह है – अनुक्रोशत्व । संस्कृत-साहित्य में बार बार उल्लिखित हुआ यह अनुक्रोशत्व ही अहिंसा का बीजभूत तत्त्व है । रावण ने सीताजी को, अपहरण करके ले जाने के बाद, उसको वशीभूत करने के अनेक बार प्रयास किया । परन्तु वह कभी सफल नहीं हुआ था । यहाँ प्रश्न होता है कि – ऐसी स्थिति में रावण ने सीताजी को क्यूं नहीं मार डाला ? तब वाल्मीकि कहते है कि रावण हंमेशा यही सोचता था कि शस्त्राघात करने पर उसको कितनी वेदना होगी ? – यह थी अनुक्रोश-बुद्धि, जिसके कारण रावण ने सीता को अन्त तक जीवित रखी थी । दूसरी ओर कुन्दमाला नामक नाटक में कवि कहते है कि लव और कुश जब आश्रम में कोई शरारत करते थे तो सीता उन दोनों को “ निरनुक्रोशपिता के पुत्र ” कहे कर उन को पुकारती थी । यहाँ लव-कुश के लिये सीताजी ने जो संज्ञा का प्रयोग किया है वह बडी मार्मिक है । इस में सीताजी की एक शिकायत छीपी हुई हैः— एक सगर्भा स्त्री को घर से नीकाल देते समय किसी भी पुरुष को सोचना चाहिये कि उसे क्या पीडा भुगतनी होगी । कोई भी सामान्य पुरुष जिस पीडा को समझ सकता है वह पुरुषोत्तम राम नहीं समझ सके । जब राम में इस प्रकार का अनुक्रोशत्व ही नहीं है ऐसा सीता को अनुभूत होता है तब वह राम के लिये निरनुक्रोश शब्द का प्रयोग कर रही है । ( यद्यपि यहाँ एक स्पष्टता करनी अत्यंत आवश्यक भी है कि राम यदि पुरुषोत्तम थे उन्होंने ऐसा क्यूं किया । राम ने सीता के प्रति निरतिशय स्नेहभाव होते हुये भी लोकाराधन के व्रत को अपना सर्वोच्च धर्म माना था, उस लिये वह वज्र से कठोर हो कर सीता के प्रति निरनुक्रोश बन सके थे । यह कोई अन्य पामर मनुष्य के वश की बात नहीं थी ।। - यह बात भी कुन्दमाला नाटक लिखनेवाले दिङ्नाग कवि को अनजान नहीं थी । )
संस्कृतकविओं का समुदाय इस अनुक्रोशत्व को एक मानवीय तत्त्व के रूप में प्रस्थापित करते रहे है । महाकवि कालिदास का यक्ष भी मेघदूत के अन्त में बादल से कहता है कि हे मेघ, तुम मुझ पर अनुक्रोश-बुद्धि से देखो और मुझे साहाय्य करो । मेरा सन्देश मेरी प्रियतमा के पास ले जाओ । यदि तुम भी अपनी प्रिया से वियुक्त हो गया होतो तुम कितने दुःखी रहोंगे – यह सोच कर तुम मेरी मदद करो । इसी को अनुक्रोशत्व कहते है । एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति को गीरते हुए देख कर ही तुरंत उसको उठाने के लिये दौड जाता है – यह अनुक्रोश है । जो एक मानव-सहज संवेदना है, और यही सच्चा मानवीय तत्त्व है ।
कालिदास की तरह, नाट्यकार भास ने भी इस अनुक्रोशत्व नामक गुण की अनेक स्थानों पर प्रशंसा की है । अविमारक नामक नाटक में कुरंगी नाम की राजकुमारी पर मदोन्मत्त हस्ती का आक्रमण होने जा रहा था और सभी नगरजन तितर-भीतर हो गये थे, तब केवल एक अज्ञात युवक ने तुरंत वहाँ आकर हस्ती को मार भगाया, और राजकुमारी को जीवनदान दिया । यहाँ कवि भास ने कुरंगी की माता से कहलाया है कि यह युवक भले ही अज्ञात-कुल हो, परन्तु उस युवक ने निश्चित ही अपने आपको ( ईश्वर के अपार ) कारुण्य के ऋण से मुक्त करवा लिया है । संस्कृतसाहित्य के कविलोग यह मानते है कि ईश्वर की अपार करुणा के बिना हमें न सूरज की रोशनी मिल सकती है, आकाश से न जल की वृष्टि होती, न श्वास लेने को प्राणवायु मिलती । हम सब पर ईश्वर की करुणा का अनहद ऋण है और इस ऋण से मुक्त होने के लिये हमें सभी प्राणिओं के प्रति अनुक्रोश रखना चाहिये ।।
संस्कृत कविओं की सोच है कि ईश्वर द्वारा हम पर प्रदर्शित की गई करुणा को ध्यान में लेते हुये हमें भी अन्य जीवों के प्रति अनुक्रोश-बुद्धि रखते हुये जीवन जीना चाहिये । क्योंकि, यदि हमारा जीवन ही किसी की करुणा पर निर्भर है । तो अनुक्रोशत्व का पालन करना हमारा धर्म बन जाता है । इस अनुक्रोश में से ही दया का उदय होता है । भूत मात्र पर जब दया पैदा होती है तो अहिंसा अपने आप हमारे आचार का अभिन्न अङ्ग बन जायेगी ।।
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वसन्तकुमार म. भट्ट
निदेशक, भाषासाहित्यभवन, गुजरात विश्वविद्यालय,
अहमदावाद – 380009
www.vasantbhatt@blogspot.com
E-mail : bhattvasant@yahoo.co.in
हिन्दु-धर्म का इतिहास 5000 वर्षों से भी अधिक पुराना है । अतः हिन्दुधर्म में अहिंसा के विचार को लेकर कोई चिन्तन प्रस्तुत करना एक साहस ही सिद्ध हो सकता है । फिर भी, कुछ मुख्य एवं विशेष सीमा चिह्नरूप सन्दर्भों को लेकर, ब्राह्मण-संस्कृति के विस्तृत फलक पर विकसित हुये अहिंसा के विचार को परिमित शब्दों में कहने का प्रयास किया जाता हैः—
- 1 –
ब्राह्मण-संस्कृति में ऋग्वेद के मन्त्रों में वैसे तो प्राधान्येन विविध देवताओं की स्तुतियाँ आयी हुई है । लेकिन इन्द्र, अग्नि आदि देवों की स्तुतिओं के साथ साथ
“ पुमान् पुमांसम् परिपातु विश्वतः ” ( एक पुरुष दूसरे पुरुष का सभी तरह से रक्षण करे ), और “ वसुधैव कुटुम्बकम् ” के विचार भी वेदमन्त्रों में प्रस्तुत हुए है । एवमेव, ऐसे ही सर्वात्मभाव को बढावा देने के लिये, अर्थात् सब जीव एक है - इस विचार से “ यह मामकीन है और दूसरा व्यक्ति परकीय है” ऐसे भेदभाव को हटाने के लिये, वेदों में यह भी कहा गया है कि “ यत्र भवति विश्वम् एक-नीडम् । ” ( जहाँ सारा विश्व चीडियों का एक घोंसला बनके रहे ) । धार्मिक कट्टरता के कारण होनेवाली हिंसा पर लगाम डालने के लिये ऋग्वेद में “ एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति ” ( एक ही सत्य को बुद्धिमानों ने अनेक तरह से कहा है ) ऐसा भी स्पष्ट शब्दों में कहा गया है । इसका सूचितार्थ यही है कि ऋग्वेद में भले ही अहिंसा जैसे शब्द का सीधा प्रयोग नहीं दिखाई देता है, परन्तु किसी भी मनुष्य या पशु की हिंसा करने का तो नहीं कहा गया है - यह निश्चित है ।।
कालान्तर में जब यजुर्वेद की रचना हुई तब विविध प्रकार के यज्ञ-यागादि की स्पष्ट संकल्पनायें आविर्भूत हुई । जिसमें अनेक नित्य एवं नैमित्तिक यज्ञों का निरूपण हुआ और उसी परंपरा में अश्वमेध यागादि का विधान हुआ । जिससे पशु-बलि का कुरिवाज चल पडा । आदमी का कमजोर दिमाग पशुबलि से विरत तो हुआ नहीं, बल्कि नरमेध-याग की पराकाष्ठा तक पहुँचा । और वित्तैषणा, पुत्रैषणा एवं लोकैषणा से पीडित समाज ने यज्ञीय हिंसा हिंसा नहीं कहलाती, तथा यज्ञ के लिये मारे गये प्राणी को तो स्वर्ग ही मिलता है – ऐसा कपटी वाक्य भी प्रचार में रख दिया । ऋग्वेद एवं उपनिषदों के बीच में जो ब्राह्मण-ग्रन्थ लिखे गये, तथा बाद में जो पूर्वमीमांसा दर्शन विकसित हुआ उसमें ऐसी मान्यता ने स्थान लिया था । परन्तु ऋग्वेद की तरह उपनिषदों ने भी सर्वात्मभाव की ही बात पुकार के साथ कही थी और बहुविध उक्तिओं में उसे दोहराई थी । जीवात्मा और ब्रह्माण्ड की कोई भी हस्ती परस्पर से भिन्न नहीं है, सर्वत्र अभेद ही है, ऐसा कहनेवाले उपनिषदों का अद्वैतवाद तो शब्दान्तर से अहिंसा के विचार का ही सर्वथा दृढीकरण करनेवाला था – यह कहने की जरूरत नहीं है ।।
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फिर भी, कुछ कालावधि तक प्रवर्तित ब्राह्मण-संस्कृति की यज्ञक्रियाओं में जो पशु-हिंसा हो रही थी उसको रोकने के लिये, भगवान् बुद्ध ने करुणा का उपदेश दिया और भगवान् महावीर ने अहिंसा का उपदेश दिया । ब्राह्मण-संस्कृति में सुधार लाने का श्रेयः निःशङ्क रूप से श्रमण-संस्कृति को जाता है । और, चूँकि ब्राह्मण-संस्कृति में एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति – का विचार पूर्वप्रस्थापित था ही, बुद्ध और महावीर की वाणी का स्वीकार करने में ब्राह्मण-संस्कृति को ज्यादा कठिनाई नहीं हुई ।
परन्तु महाभारत में भगवद्गीता के नाम से जो श्रीकृष्ण एवं अर्जुन का संवाद निरूपित हुआ है उस में, राष्ट्रधर्म के उद्देश को लक्षित करके युद्ध की अनिवार्यता को स्पष्ट रूप से स्वीकारा भी गया है । अर्जुन ने जब घोर हिंसा की सम्भावना देखी तो उसने युद्ध नहीं करने का और संन्यास लेने का ही सोचना शूरु किया । परन्तु युगपुरुष श्रीकृष्ण ने कहा की इन आततायी ( आतंकवादीओं ) कौरवों को तुं नहीं मारेगा तो, आज जो हाल एक द्रौपदी का हुआ है वही हाल समाज की अन्य स्त्रीओं का भी होगा । अधर्म का फैलावा होने पर समाज और राष्ट्र की सुरक्षा पर खतरा पैदा हो सकता है । अतः श्रीकृष्ण की दृष्टि में धर्मयुद्ध तो अनिवार्य है ही । वह कहते हैः- क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ, नैतत् त्वयि उपपद्यते । अर्थात् हे अर्जुन ! तुम नपुँसकता को धारण न करो, यह तुम्हें शोभा नहीं देता है । इस तरह भगवद्गीता में राष्ट्रधर्म प्रेरित हिंसा को मान्यता दी गई है ।।
परन्तु उसी भगवद्गीता में, वैदिक यज्ञों की निन्दा भी की गई है और यज्ञ की विभावना ही बदल दी गई है – यह भी नितान्त सत्य है । अब निर्दोष पशु के बलि को किसी भी रूप में मान्यता नहीं थी । युगपुरुष श्रीकृष्ण की नयी सोच में स्वार्पण एवं कृतज्ञता बुद्धि से किया हुआ कर्म ही यज्ञ था । एवं लोकसङ्ग्रह की मंगलकारिणी बुद्धि से और अनासक्तिपूर्वक किया हुआ कर्म यज्ञ था । सीता या द्रौपदी की तरह समाज की अन्य स्त्रियाँ भी संरक्षणीय है – यह सोचना एक तरह का लोकसङ्ग्रह ही था । ऐसे लोकसङ्ग्रह के उद्देश्य से किया हुआ कोई भी युद्ध हिंसक नहीं माना गया है । क्योंकि आततायीओं को नहीं मार कर जो हिंसा को टाली जाती है, उससे कहीं अधिक हिंसा उन लोगों को जीन्दा छोडने से होती है । अतः युगपुरुष श्रीकृष्ण की यह सोच साम्प्रत भारत में अतीव ध्यानार्ह एवं प्रस्तुत है ।।
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भगवद्गीता में न केवल यज्ञ की विभावना ही बदली गई है, परन्तु उसमें सम्भवामि युगे युगे – जैसे शब्दों से जो अवतारवाद का शंख फूंका गया है, उसने भी हिन्दुस्तान में धार्मिक सहिष्णुता को बलिष्ठ बनायी है । यज्ञीय पशु-हिंसा की निन्दा करनेवाले बुद्ध को भी ब्राह्मण-संस्कृति ने, केशव धृतबुद्धशरीर....जय जगदीश हरे – ( गीतगोविन्द के ) इन शब्दों से भगवान् विष्णु के दश अवतारों में स्थान दिया है । कवि जयदेव के इन शब्दों को पुराणकारों ने भी सम्मान के साथ दृढीभूत कर दिया । एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति – तो वेदों में कहा ही गया था, इस लिये बुद्ध के करुणापूर्ण वचन ग्रहण करने में या महावीर के दयाप्रेरित जीव-अहिंसा के विचार को अपनाने में ब्राह्मण-संस्कृति को कोई बाधा ही नहीं थी ।
साथ में, अहिंसा के विचार पर तात्त्विक विचार करते हुये योगमहर्षि पतञ्जलि को अहिंसा में क्या बल है यह भी अनुभूत हो गया । उन्हों ने लिख दिया कि – अहिंसाप्रतिष्ठायाम् सर्व-प्राणिनाम् वैरत्यागः ( भवति ) ।। जो आदमी ने सम्पूर्णतया अहिंसा सिद्ध करली है उसकी ओर अन्य सभी प्राणी भी वैर का त्याग करके रहते है ।
इस तरह से, हिन्दुधर्म में वेदकाल से अन्य शब्दों में अभिव्यक्त हुआ अहिंसा का विचार, कुछ कालावधि में प्रकट शब्दों में बद्धमूल हो गया ।।
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धार्मिक ग्रन्थों के सन्दर्भों के अलावा संस्कृत-साहित्य में यदि दृष्टिपात् किया जाय तो भी हिन्दुधर्मियों में अहिंसा की भावना जिस रूप में प्रवहमान थी उसका अन्दाजा मिल जायेगा । सब से पहेले कविकुलगुरु कालिदास के द्वारा अभिज्ञानशाकुन्तल नाटक में मानव और प्रकृति का जो सम्बन्ध चित्रित किया गया है उसे ही देखना उपयुक्त रहेगा । कवि ने कहा है कि नायिका शकुन्तला को शरीर-सुशोभन करना पसंद था, परन्तु आश्रम के हरेक पौधे पर इनके मन में इतना स्नेह था कि वह एक पर्ण-पुष्प भी तोडती नहीं थी । वह अपनी सहेलियों से कहती है कि – अस्ति मम एतेषु सोदरस्नेहः । अर्थात् शकुन्तला को सभी वनस्पति के उपर सहोदर जैसा स्नेह था । और वन-उपवन में विचरण करनेवाले मृगों पर भी अपार दयाभाव था । जिसके कारण वह घास खाते समय मृगों के मुँह में लगे कण्टक के घाव को मिटाने के लिये उनके मुँह पर इङ्गुदीफल का तैल लगा देती थी । यह वह प्रकृति के सब सदस्य है जिसने शकुन्तला को जन्म से ले कर सुरक्षित रखी थी । माता मेनका ने तो शकुन्तला को जन्म दे कर ही जंगल में अनाथ छोड दी थी, परन्तु शकुन्तों ( पक्षिओं ) ने उसे पहेले दिन पाला था, इसी लिये वह शकुन्तला कहलाई थी । यहाँ महाकवि ने मानव और प्रकृति का अभिन्न सम्बन्ध दिखाया है । जो सारे विश्व भर के साहित्य में बेजोड है । अन्यत्र ( युरोपिय देशों में ) तो पृथिवी के केन्द्र में मानव है, और पूरी प्रकृति मानव के उपभोग के लिये है – ऐसी मान्यता प्रवर्तित की गई है । लेकिन भारतीय नायिका – शकुन्तला अपने सुशोभन के लिये भी एक पर्ण भी तोडना पसंद नहीं करती है, और वन के मृगों तक की देखभाल रखती है, क्योंकि वह प्रकृति को अपना अङ्ग ही समझती है । ऐसी माता शकुन्तला का पुत्र आगे चल कर एक बडा चक्रवर्ती राजा बनता है । इस पुत्र का नाम हैः- भरत । अर्थात् सब का भरण-पोषण करनेवाला । और इस भरत के नाम से यह देश भारत कहलाया । ( जो सब का भरण करनेवाला है, जो किसीका विनाश करना नहीं चाहता है । )
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इस प्रसंग में संस्कृत साहित्य का एक अप्रकट और अज्ञात चिन्तन भी बताना अत्यन्त आवश्यक है । इस अमर साहित्य में, आदिकवि वाल्मीकि के समय से ही एक शब्द बार बार प्रयुक्त होता रहा हैः- अनुक्रोश । जिसका अर्थ होता है – परदुःखदुःखिता । = दूसरे के दुःख को देख कर स्वयं दुःखी हो जाना । इस शब्द से व्यक्त होनेवाला जो अर्थ है वह करुणा और दया के बीच का है । करुणा और दया बडे महनीय मानव-धर्म है, परन्तु इस धर्म की ओर ले जानेवाला जो मानवीय तत्त्व है वह है – अनुक्रोशत्व । संस्कृत-साहित्य में बार बार उल्लिखित हुआ यह अनुक्रोशत्व ही अहिंसा का बीजभूत तत्त्व है । रावण ने सीताजी को, अपहरण करके ले जाने के बाद, उसको वशीभूत करने के अनेक बार प्रयास किया । परन्तु वह कभी सफल नहीं हुआ था । यहाँ प्रश्न होता है कि – ऐसी स्थिति में रावण ने सीताजी को क्यूं नहीं मार डाला ? तब वाल्मीकि कहते है कि रावण हंमेशा यही सोचता था कि शस्त्राघात करने पर उसको कितनी वेदना होगी ? – यह थी अनुक्रोश-बुद्धि, जिसके कारण रावण ने सीता को अन्त तक जीवित रखी थी । दूसरी ओर कुन्दमाला नामक नाटक में कवि कहते है कि लव और कुश जब आश्रम में कोई शरारत करते थे तो सीता उन दोनों को “ निरनुक्रोशपिता के पुत्र ” कहे कर उन को पुकारती थी । यहाँ लव-कुश के लिये सीताजी ने जो संज्ञा का प्रयोग किया है वह बडी मार्मिक है । इस में सीताजी की एक शिकायत छीपी हुई हैः— एक सगर्भा स्त्री को घर से नीकाल देते समय किसी भी पुरुष को सोचना चाहिये कि उसे क्या पीडा भुगतनी होगी । कोई भी सामान्य पुरुष जिस पीडा को समझ सकता है वह पुरुषोत्तम राम नहीं समझ सके । जब राम में इस प्रकार का अनुक्रोशत्व ही नहीं है ऐसा सीता को अनुभूत होता है तब वह राम के लिये निरनुक्रोश शब्द का प्रयोग कर रही है । ( यद्यपि यहाँ एक स्पष्टता करनी अत्यंत आवश्यक भी है कि राम यदि पुरुषोत्तम थे उन्होंने ऐसा क्यूं किया । राम ने सीता के प्रति निरतिशय स्नेहभाव होते हुये भी लोकाराधन के व्रत को अपना सर्वोच्च धर्म माना था, उस लिये वह वज्र से कठोर हो कर सीता के प्रति निरनुक्रोश बन सके थे । यह कोई अन्य पामर मनुष्य के वश की बात नहीं थी ।। - यह बात भी कुन्दमाला नाटक लिखनेवाले दिङ्नाग कवि को अनजान नहीं थी । )
संस्कृतकविओं का समुदाय इस अनुक्रोशत्व को एक मानवीय तत्त्व के रूप में प्रस्थापित करते रहे है । महाकवि कालिदास का यक्ष भी मेघदूत के अन्त में बादल से कहता है कि हे मेघ, तुम मुझ पर अनुक्रोश-बुद्धि से देखो और मुझे साहाय्य करो । मेरा सन्देश मेरी प्रियतमा के पास ले जाओ । यदि तुम भी अपनी प्रिया से वियुक्त हो गया होतो तुम कितने दुःखी रहोंगे – यह सोच कर तुम मेरी मदद करो । इसी को अनुक्रोशत्व कहते है । एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति को गीरते हुए देख कर ही तुरंत उसको उठाने के लिये दौड जाता है – यह अनुक्रोश है । जो एक मानव-सहज संवेदना है, और यही सच्चा मानवीय तत्त्व है ।
कालिदास की तरह, नाट्यकार भास ने भी इस अनुक्रोशत्व नामक गुण की अनेक स्थानों पर प्रशंसा की है । अविमारक नामक नाटक में कुरंगी नाम की राजकुमारी पर मदोन्मत्त हस्ती का आक्रमण होने जा रहा था और सभी नगरजन तितर-भीतर हो गये थे, तब केवल एक अज्ञात युवक ने तुरंत वहाँ आकर हस्ती को मार भगाया, और राजकुमारी को जीवनदान दिया । यहाँ कवि भास ने कुरंगी की माता से कहलाया है कि यह युवक भले ही अज्ञात-कुल हो, परन्तु उस युवक ने निश्चित ही अपने आपको ( ईश्वर के अपार ) कारुण्य के ऋण से मुक्त करवा लिया है । संस्कृतसाहित्य के कविलोग यह मानते है कि ईश्वर की अपार करुणा के बिना हमें न सूरज की रोशनी मिल सकती है, आकाश से न जल की वृष्टि होती, न श्वास लेने को प्राणवायु मिलती । हम सब पर ईश्वर की करुणा का अनहद ऋण है और इस ऋण से मुक्त होने के लिये हमें सभी प्राणिओं के प्रति अनुक्रोश रखना चाहिये ।।
संस्कृत कविओं की सोच है कि ईश्वर द्वारा हम पर प्रदर्शित की गई करुणा को ध्यान में लेते हुये हमें भी अन्य जीवों के प्रति अनुक्रोश-बुद्धि रखते हुये जीवन जीना चाहिये । क्योंकि, यदि हमारा जीवन ही किसी की करुणा पर निर्भर है । तो अनुक्रोशत्व का पालन करना हमारा धर्म बन जाता है । इस अनुक्रोश में से ही दया का उदय होता है । भूत मात्र पर जब दया पैदा होती है तो अहिंसा अपने आप हमारे आचार का अभिन्न अङ्ग बन जायेगी ।।
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